राधा


राधा

प्रेम शब्द पहले बना होगा या राधा पहले आई होगी इस संसार मे ?

ये प्रश्न वैसा ही हैं जैसे अंडा पहले आया कि मुर्गी ?

असल मे प्रेम करना तो इस संसार को राधा ने ही सिखलाया ।अगर कभी संसार के महान प्रेमियो की कभी सूची बनाये जाए तो राधा का नाम उसमे सबसे ऊपर होगा । पत्नी हो तो सीता जैसी और प्रेमिका हो तो राधा जैसी । सतयुग में सीता ने प्रेम में आत्म सम्मान को अक्षुण्ण बनाये रखा तो त्रेतायुग में राधा ने समर्पण को प्रेम का स्थायी भाव बना दिया !

राधा का प्रेम अंतर्मन से स्फुटित होता हैं और आत्मा की गहराईयों तक पहुचता हैं । राधा के प्रेम में श्रीकृष्ण के लिए ना कोई अपेक्षा हैं और ना ही वो कृष्ण पर कोई उपकार करती हैं। अगर कुछ हैं तो वो हैं बाँसुरी की धुन और यमुना का किनारा, जिस पर आकर्षित होने से राधा ने खुद को कभी नही रोका । असल मे प्रेम ऐसा ही होता हैं, आप अचानक ही किसी के प्रति आकर्षण को महसूस करते है, इस आकर्षण की कोई वजह नही होती, कभी यह आकर्षण एकदम से होता हैं तो कभी धीरे-धीरे । अगर आपने इस आकर्षण में खुद को बंधने से या बहने से रोक लिया तब भी मन मे वो प्रेम तो रहता ही है, आप उसे स्वीकार करे या ना करे ।

पर राधा की महानता इसमे नही हैं कि उन्होंने इस आकर्षण में खुद को बहने से नही रोका । राधा की महानता इसमे हैं कि उन्होंने इस आकर्षण में बहने के लिए कृष्ण को बाध्य नही किया । अपना सर्वस्व समर्पित किया पर कृष्ण से तिनके भर की भी अपेक्षा नही की । राधा ने सुनिश्चित किया कि ये संसार इस बात को समझे कि प्रेम की नियति मिलन नही होती बल्कि विलय होती है । और ये विलय शारीरिक नही बल्कि आत्मिक होता हैं । इसीलिए तो श्री कृष्ण के जीवनकाल मे महज कुछ वर्षो के लिए आई राधा उनकी आत्मा से ऐसे जुड़ गई कि आज कृष्ण बोलना अधूरा लगता हैं और राधेकृष्ण बोलना सम्पूर्ण ।

क़भी-कभी सोचता हूँ कि प्रेम में जीवन कितना अच्छा होता हैं । यमुना के किनारे पर श्री कृष्ण बासुरी बजाते, गाय चराते और रोज राधा से मिलते, दोनो घंटो बाते करते और फिर शाम को अपने घर चले जाते । जीवन कितना सरल और आनंददायक था, युही श्री कृष्ण मथुरा गये फिर महाभारत की मगजमारी की, जीवन को कठिन और कष्टदायक बनाया । पर श्री कृष्ण तो कर्मयोगी थे, प्रेमयोगी तो केवल राधा ही थी दोनो में से । कृष्ण को तो जाना ही था, पता नही क्या कहा होगा उन्होंने राधा से आखिरी मुलाकात में, कैसे समझाया होगा और आश्चर्य ये कि राधा समझ भी गयी । राधा ने विदा कर दिया अपने प्राण से भी प्यारे कृष्ण को कर्मपथ पर । कहाँ मिलते हैं ऐसे निश्छल प्रेमी और कहा मिलती हैं प्रेम की ऐसी मिसाल। साथ जीने-मरने वाली कई प्रेम कहानिया मिल जाएगी पर ऐसी कहानी तो दुर्लभ ही होगी जहाँ प्रेमी आपसी सहमति से एक दूसरे से दूर जा रहे हैं और फिर जीवन मे कभी नही मिलते हैं, ना प्रेमी के मन मे कोई अपराध भाव है और ना प्रेमिका के मन मे कोई द्वेष भाव, हैं तो केवल एक दूसरे के प्रति असीमित प्रेम ।

राधा ही प्रेम का पर्याय है। देखा जाए तो कृष्ण को गीता ज्ञान भी राधा के कारण ही हुआ । जो व्यक्ति राधा जैसी निश्छल प्रेमिका के प्रेम-मोह को यमुना के तट पर त्याग कर कर्म के कुरुक्षेत्र में खुद को झौक दे, उसके लिए अर्जुन के मन से दुष्ट कौरवो के मोह का त्याग करवाना कौन सा बडा काम था।असल गीता ज्ञान तो कृष्ण को गोकुल छोड़ने पर ही हो गया था ।

कृष्ण कर्म योगी थे और राधा प्रेम योगी । राधा कृष्ण की जोड़ी तो प्रेम और कर्म का अद्भुत संगम हैं। ये मिलन तो हुआ ही इसलिए कि ये संसार समझ सके कि मन में राधा यानी प्रेम को रखो और जीवन मे कृष्ण यानी कर्म को रखो, यही मानव होने का धर्म है और यही मानव जीवन की सार्थकता ।

और अंत मे – अगर कुरुक्षेत्र में श्री कृष्ण के स्थान पर राधा गीता ज्ञान देती तो क्या कहती ?
कृष्ण कहते हैं आत्मा अजर है, अमर हैं !
राधा होती तो कहती प्रेम ही शाश्वत हैं, सत्य हैं !

कृष्ण कहते कर्म किये जा, फल की इच्छा मत रख ।
राधा कहती प्रेम किये जा पर प्रेम में कोई अपेक्षा मत रख !

कृष्ण कहते कि जब जब धरती पर अधर्म बढ़ा हैं, मैं धरती पर अवतरित होता हु धर्म की स्थापना के लिए !
राधा कहती कि जब जब धरती पर घृणा बढी है, मैं धरती पर अवतरित होती हूँ, प्रेम की स्थापना के लिए !

काश कि गीता ज्ञान राधा ने भी दिया होता !

– अंकित सोलंकी (उज्जैन, मप्र)

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