मकोडिया आम


आगर रोड जब उज्जैन के चामुंडा माता चौराहे से होते हुए आगे बढ़ती हैं तो उज्जैन शहर की सीमा से बाहर होने के पहले एक क्षेत्र से होकर गुजरती हैं, जिसे मकोडिया-आम कहते हैं । मुझे बचपन मे लगता था ये नाम किसी मुगल शासक ने रखा हैं, जैसे दीवाने-खास, दीवाने-आम होते हैं वैसे ही मकोडिया-आम भी होता होगा । पर वहाँ रह रहे पुराने लोगो ने बताया कि ये नाम वहाँ लगे आम के पेड़ों की वजह से था । कभी वहाँ आम के पेड़ हुआ करते थे और उन आम के पेड़ों पर बहुत से मकोड़े रहते थे । अब आम तो शहर में बहुत सारे थे पर मकोड़े वाले आम हर जगह नही थे, तो इस क्षेत्र का नाम ही मकोडिया-आम हो गया। जिन लोगो को मकोड़े नही पता, उन्हें बता दू कि मकोड़े चीटियों के बड़े भैया होते हैं , जो एक बार शरीर से चिपक जाए तो बड़े से बड़े पहलवान को भी नानी याद दिला देते हैं । क्या पता कितने लोगों को वहां आम खाने की चाहत में मकोड़े काटे होंगे । कभी वहां रेलवे लाइन भी था, क्या पता जब रेल उज्जैन के आउटर पर किसी कारण से खड़ी होती होगी तो लोग उतरकर वहां खट्टे-मीठे आम खा लेते होंगे ।

कालांतर में वहाँ से रेलवे लाइन समाप्त कर दी गई और धीरे धीरे आम के पेड़ भी गुम हो गए और अब वहाँ कुछ हैं तो आगर रोड और उसके किनारे पर बसी कालोनी इंदिरा नगर, मोहन नगर, संजय नगर और गायत्री नगर । मकोडिया-आम नाम भी अब आम नही रहा और धीरे धीरे समाप्त हो रहा हैं। प्रकृति भी समाप्त हुई और अब उसके संकेतक भी भुलाये जा रहे हैं । कुछ ऐसे ही हाल सभी शहरों में पिपलिनाका, इमली चौराहा, नीम चौक और जामुन वाली गली का भी हो रहा हैं । जब पेड़ ही नही रहा तो उसका नाम भी क्यो रहे । और जब पेड़ की ही नही चली तो मकोड़े की तो बिसात ही क्या । जिहवा के स्वाद के लिए मुर्गे की हड्डियों को भी चूस-चूसकर खाने वाले मानव के मकोड़ा किस काम का, ना हड्डी हैं ना मांस, मरने दो साले को । कितने सालो से मैने कोई मकोड़ा नही देखा, गौरैया चिड़िया नही देखी, तितली कभी कभी दिख जाती हैं, कबूतर रिफ्यूजी केम्प की तरह किसी पुरानी बिल्डिंग या रेलवे स्टेशन पर रह रहे हैं । गायो के शहरों में घुसने और सडको पर घूमने पर आपत्ति होती हैं, यहां पूरा के पूरा शहर जंगलो में घुस गया, किसी ने उफ्फ तक नही की । हँसी आती हैं, जब शहर में कही वन क्षेत्र लिखा हुआ दिखाई देता हैं । अब मकोडिया-आम जैसे भी कोई नाम नही होंगे । नाम रखे जाएंगे तो टाउनशिप, पेरेडाइस, आवेन्यू, कॉरिडोर या शॉपिंग मॉल के नाम पर । हर किसी को घर देने का सपना जो सरकार ने पाल रखा हैं । और सरकार मकोड़ो की क्यों सुने, उन्होंने थोड़ी ना सरकार को वोट दिया हैं । अगर मकोड़े भी वोट देते तो वो अपने लिए एक आम का पेड़ मांग लेते, पर संविधान ने उन्हें ये हक़ दिया ही नही । वैसे भी जंगल की सरकार तो सिर्फ बच्चों की कविताओं में ही होती हैं और प्रकृति के नियम जैसे शब्द सिर्फ डिस्कवरी चेनल पर सुनाई देते हैं । मानवीय विकास के रथ के पहिये प्रकृति के पेट को कुचलते हुए तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं और मकोडिया-आम प्रकृति की चित्कार हैं ।

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