रंगीला


चाचा नेहरू के जन्मदिन की उस दिन हमें बहुत ख़ुशी थी | ऐसा नहीं था कि हम चाचा नेहरू के कार्यो से बहुत प्रभावित थे, बल्कि उस समय तो हम ठीक से जानते भी नहीं थे कि नेहरूजी का देश के लिए क्या योगदान हैं | हम तो खुश इसलिए थे कि बाल दिवस के उपलक्ष में उस दिन हमें स्कूल की और से बाल-फिल्म दिखाने जाने का कार्यक्रम था | इसके पहले हम केवल एक बार ही सिनेमाघर गए थे और पापा मम्मी के साथ ‘बोल राधा बोल’ फिल्म देखकर आये थे | उम्र छोटी होने के कारण फिल्म तो हमें कुछ ज्यादा समझ नहीं आई थी पर बड़ा सा हाल, बड़ा पर्दा, आरामदायक कुर्सियां और लोगो की भीड़, हमारे लिए वो अनुभव खासा रोमांचक था | वही आनंद फिर से दोहराने का मौका मिलने के कारण हम बहुत खुश थे |

स्कूल वालो ने ठीक सुबह नौ बजे टेम्पू में बैठाकर हम सब बच्चो को स्कूल से ‘निर्मल-सागर’ सिनेमाघर पहुँचा दिया | १२ बजे से थियेटर के नियमित शो प्रारम्भ होते थे इसलिए सुबह ९ से १२ का स्लॉट बच्चो को बाल-फिल्म दिखाने के लिये दिया गया था | उस समय निर्मलसागर सिनेमा शहर की शान हुआ करता था | परदे, साउंड की क्वालिटी अन्य सिनमाघरो से बेहतर थी, कुर्सियां बहुत आरामदायक थी, हॉल के बाहर लॉबी में लाल मखमली गद्दे सोफे लगे हुए थे जिसके आसपास दीवारों पर चमकदार शीशे भी थे | ऐसा लगता था कि सिनेमाघर नहीं किसी महल में आ गए हो | सिनेमाघर के इतना आकर्षक और भव्य होने के बावज़ूद जो चीज़ हम बच्चो के लिए सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बनी हुई  थी वो थे वह उस समय प्रदर्शित होने जा रही फिल्म ‘रंगीला’ के पोस्टर | अलग अलग साइज के ४-५ पोस्टर में आमिर खान, जैकी श्रॉफ के साथ उर्मिला मातोंडकर की तस्वीर थी | अगर आज का समय होता तो बच्चे उस पोस्टर के साथ सेल्फी क्लीक करके फेसबुक पर पोस्ट करते, पर उस समय तो हम चोरीछिपी नज़रो से उन पोस्टर्स को बस निहारे जा रहे थे | हम बच्चो के बीच कुछ बच्चे बहुत ज्ञानवान भी थे, जिन्हे उस फिल्म में क्या खास था और वो फिल्म इतनी चर्चा में क्यों हैं, सब पता था | बस ऐसे ज्ञानवान एक बेक बेंचर्स बच्चे ने अपने ज्ञान का पिटारा खोलकर हमें बता दिया कि इस फिल्म में हीरोइन का लुक बहुत बोल्ड एंड हॉट हैं। इसके बाद तो अब उन पोस्टर्स को हम और भी कोतुहल से देखने लग गए थे |

खैर उर्मिला मातोंडकर की पोस्टर्स में उपस्थिति को नज़रअंदाज करते हुए थोड़ी देर बाद हम वो बाल-फिल्म देखने लग गए | फिल्म विको-वज्रदंती के विज्ञापन से प्रारम्भ हुई और हम बच्चो ने खूब तालियाँ बजाई | वो बाल-फिल्म कुछ खास तो नहीं थी पर सब बच्चो को बहुत मज़ा रहा था | वैसे भी उस उम्र में कहाँ कोई फिल्म की कहानी, अभिनय और गुणवत्ता का आकलन करता हैं, हम बच्चो के लिए तो फिल्म में थोड़ा एक्शन हो, कॉमेडी हो, बस हो गया काम | फिल्म के बीच में थोड़ी देर का इंटरवल दिया गया और कुछ बच्चे वाशरूम का प्रयोग करने बाहर जाने लगे | हमें उस समय बाथरूम जाने की कोई जरूरत नहीं महसूस हुई तो हम अपनी कुर्सी पर ही बैठे रहे | इंटरवल का समय पास करने के लिए फिर से विको वज्रदंती के विज्ञापन लगा दिए गए और हम उसे भी चाव से देखने लगे | विको-वज्रदंती के विज्ञापन के बाद कुछ ऐसी घटना हुई जो अगर ना होती तो उस घटना के कोई पच्चीस बरस बाद हम ये कहानी नहीं लिखते, पर इस कहानी की शुरुआत इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकती थी |

थियेटर में काम करने वाले कर्मचारी को निर्देश थे कि वो इंटरवल में फिल्म के ट्रेलर दिखाए और उसने अपने निर्देशानुसार उस बाल-फिल्म के इंटरवल में भी आने वाली नई फिल्म रंगीला का ट्रेलर लगा दिया | याइ रे – याइ रे के गीत पर थिरकती हुई उर्मिला मातोंडकर के डांस स्टेप से जब वो ट्रेलर शुरू हुआ तो हमारी आखे पलके झपकाना भूल चूकी थी | लगभग पाँच मिनट के उस ट्रेलर में हमें उस हरामी बेक बेंचर की बताई सभी बाते सही मालूम हुई पर वो हमारा बैकबेंचर दोस्त दुर्भाग्य से बाथरूम करने बाहर गया था और इस ट्रेलर के आनंद से वंचित रह गया | ट्रेलर के बीच में तालियों-सीटियों की भी बहुत आवाजे आ रही थी और हमें समझ आ गया कि हमारे स्कूल के बच्चे अब बड़े हो चुके हैं | हमने भी मौके का मज़ा लेते हुए ट्रेलर ख़तम होने पर खूब तालियाँ बजाई पर फिर हमें याद आया की हमारे पीछे तो स्कूल के सबसे खड़ूस सर बैठे हुए हैं |  ये बात याद आते ही हमने उन सर की और देखा कि कही वो हमें देख तो नहीं रहे हैं | पर स्वभाव के विपरीत वो सर भी आज मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे | उस बेक बेंचर दोस्त के आने पर हमने वो ट्रेलर वाली बात उसे बताई और उसे इतना दुःख हुआ जैसे उसने लॉटरी मिस कर दी हो | उस दोस्त को जो भी हाल हो, पर हमने मन ही मन अपनी दोनों किडनियों को धन्यवाद किया कि ऐसे अहम् मौके पर उन्होंने बाथरूम पर कमाल का नियंत्रण बनाये रखा |

निर्मल सागर से निर्मल आनंद की प्राप्ति के बाद हम घर तो आ गए पर अब हमारा मन दो काम के लिए बहुत तड़प रहा था । पहला वो विको वज्रदंती के विज्ञापन में हमने अखरोट तोड़ते हुए देखा था और जीवन मे पहली बार हमें पता चला था कि अखरोट नामक कोई ड्राई फ्रूट होता हैं । अब हमारा मन अखरोट खाना चाहता था । दूसरा रंगीला का ट्रेलर देखने के बाद अब हमें ये फ़िल्म टॉकीज़ में देखना थी । पर ये दोनों ही चाहते असंभव थी, घर की हालत ऐसी थी कि काजू बादाम ही कभी कभार खाने को मिलते थे तो ऐसे में हम कैसे पापा मम्मी को कहते कि हमे अखरोट खाना है । और दूसरी अगर हम पापा-मम्मी को कहते कि हमे रंगीला फ़िल्म देखना हैं तो पापा के जूते और मम्मी की झाड़ू के द्वारा हमारी आरती उतरना तय था । ऐसे में हम अपना मन मसोस कर रह गए ।

उस समय हमारा घर अंकपात रोड पर एक गुआड़ी में हुआ करता था । गुआड़ी मालवी में चॉलनुमा घरो को कहते हैं जहा बीच में गाय-भैस के बांधने की भी व्यवस्था हो । उस गुआड़ी में भी बीच मे आंगन था जहाँ हमारे मकान मालिक की गाय-भैसे बंधती थी और आंगन के चारो और कमरे बने हुए थे जिनमें 5 परिवार किराये से रहते थे । हर परिवार को 2 कमरे किराये से दिए गए थे । आंगन के एक कोने में कुआ था और वही पर सबके लिए कॉमन लेट्रिन-बाथरूम की व्यवस्था थी । आजकल के वातानुकूलित अटेच लेट-बाथ बैडरूम, किचन एंड ड्रॉइंग रूम वाले घरो के सामने वो बहुत असुविधाजनक व्यवस्था थी पर उस समय साधन कम थे और संतोष ज्यादा था । सारे परिवार उस गुआड़ी में तमाम असुविधा के बावजूद बहुत सुख, संतोष और आनंद से रह रहे थे ।

 वैसे संतोष से याद आया कि उस गुआड़ी में एक संतोस भैया रहते थे जो हमसे पांच साल बड़े थे । वो उसी साल वहाँ रहने आये थे और अकेले ही रहते थे । उनकी बोर्ड की परीक्षा थी तो उस साल उनके पापा ने गांव से उन्हें शहर पढ़ने भेजा था । अपना खाना वो खुद ही बनाते थे । इन संतोस भैया से हमारी बहुत पटती थी । हम दोनों को क्रिकेट का बहुत शौक था, हम वहाँ गुआड़ी के आंगन में साथ मे बहुत क्रिकेट खेलते थे । बहुत बार हम मकान मालिक के घर टीवी में साथ मे क्रिकेट मैच देखते और क्रिकेट ज्ञान पर बहुत बाते भी करते । हम दोनों को ही सनी देओल बहुत पसंद था । उन्होंने तो सनी देओल की बहुत सारी पिक्चरें थियेटर में भी देखी थी तो वो कई सारी फिल्मों की कहानियां और डायलॉग हमे सुनाते । ‘बलवंत रॉय के कुत्ते’ और ‘ढाई किलो के हाथ’ उनका तकिया कलाम था जो वो अक्सर किसी भी बातचीत में बोला करते थे । संतोस भैया के रिश्तेदार की उस समय एक वाचनालय कम लाइब्रेरी भी हुआ करती थी, जहाँ से वो चम्पक-चंदा मामा-चाचा चौधरी जैसी किताबे लेकर आ जाते थे जो हमे भी मुफ्त में पढ़ने को मिल जाती थी । इन संतोस भैया के पास एक सायकल भी थी जिससे वो कभी कभी हमारी मम्मी और वहाँ रह रहे दूसरे परिवारों के बाजार के छोटे-मोटे काम भी कर देते थे । अपनी साईकल भी कभी किसी को जरूरत होती तो दे देते थे । इस मदद के बदले में कभी कभी उनको रात का खाना किसी परिवार की और से मिल जाता था । हर शनिवार को वो गेबी-हनुमान के मंदिर जाते थे और कभी कभी हमारी मम्मी हमे भी उनके साथ मंदिर भेज देती थी । वो हमको सायकिल पर बैठाकर गोपाल मंदिर, ढाबा रोड घुमाते हुए मंदिर ले जाते । उनके साथ घूमने का एक अलग ही आनंद था ।

वैसे संतोस भैया हमको एक दूसरे कारण से भी बहुत पसंद करते थे । उस समय उस गुआड़ी के सामने एक संतोस दीदी भी रहती थी जो हमे बचपन मे ट्यूशन पढ़ाती थी । वो संतोस दीदी को बॉलीवुड गानों का बहुत शौक था और उनके घर पर बड़ा सा स्पीकर बक्सा था, जिस पर वो तेज़ आवाज़ में गाने चलाती थी । उनके गानों की आवाज़ गुआड़ी के आंगन में साफ सुनाई देती थी । इन संतोस दीदी को बार-बार कैसेट में गाने भरवाने होते थे और हमने इस काम के लिए उनकी पहचान संतोस भैया से करवा दी थी । संतोस भैया उनके गानों को नई सड़क स्थित झंकार म्यूज़िक पॉइंट से भरवा लाते थे । एक बार हमने संतोस भैया के कमरे में एक लेटर देखा था जो उन्होंने संतोस दीदी के लिए लिखा था । पत्र में पहली पंक्ति कुछ ऐसी लिखी थी – ‘कल आंगन में खेलते समय तुम्हारे स्पीकर पर “बस एक सनम चाहिए आशिकी के लिए” गीत सुना । तुम्हारे गानो का चयन बहुत अच्छा हैं ।जाने क्यों ये गीत सुनते समय तुम्हारी याद आ गई ।’ लेटर में ये पंक्ति ही पढ़ी थी कि संतोस भैया ने वो लेटर हमारे हाथ से ले लिया । हम छोटे जरूर थे पर इतना समझ चुके थे कि संतोस भैया की कैसेट संतोस दीदी पर उलझ चुकी थी ।

एक दिन हम सुबह सुबह संतोस भैया के रूम में पहुचे तो वो “दैनिक अवंतिका” अखबार पढ़ रहे थे । दैनिक अवंतिका उज्जैन शहर का एक लोकल अखबार था जो उस समय शुरू ही हुआ था । इस अखबार की खासियत ये थी कि इसमें लोकल खबरे सारी मिल जाती थी और एक पूरा पन्ना केवल थियेटर में लगी फिल्मो के विज्ञापन का होता था । संतोस भैया अक्सर ये पेपर लाइब्रेरी से पढ़ने के लिए लाते थे । उस दिन हमने भी वो अखबार पूरा पढ़ा । अखबार में जब हमने रंगीला का पोस्टर देखा तो हमे अपनी फिल्म देखने की इच्छा याद आ गई । पोस्टर के नीचे लिखा था – “दर्शको की अपार भीड़, रोज़ाना 4 खेल 12-3-6-9, निर्मलसागर में अंतिम 5 दिन” । हमारे पास अब रंगीला देखने के लिए सिर्फ 5 दिन ही बचे थे । उसी समय हमारे दिमाग मे ये आईडिया आया कि क्यों ना संतोस भैया के साथ रंगीला देखकर आया जाए । संतोस भैया की इमेज हमारी मम्मी के सामने बहुत अच्छी बनी थी तो उम्मीद थी कि मम्मी भी परमिशन दे देगी ।

संतोस भैया के साथ रंगीला देखने जाने के प्लान को साकार करते हुए हमने संतोस भैया को पूछा कि चलो भैय्या कोई पिक्चर देखकर आते है । संतोस भैया को भी ये प्लान पसंद आया और उन्होंने पूछा कि कौन सी फ़िल्म देखना हैं । हमने कहा निर्मल सागर में चलते है, पास में भी है और टाल्कीस भी बहुत अच्छा हैं | हमने कहा नही पर संतोष भैया समझ गए कि हमको रंगीला फ़िल्म देखना हैं । उन्होंने बात को ना खींचते हुए निर्मल सागर में फ़िल्म देखने पर सहमति दे दी । पर अब हम दौनो के सामने 2 मुश्किलें थी । पहली संतोस भैया के पास फ़िल्म देखने के लिए एक्स्ट्रा पैसे नही थे । दूसरी हमको फ़िल्म देखने के लिए मम्मी से पैसे और परमिशन दौनो लेना था । पहली समस्या का समाधान हमने संतोस भैया को सुझाया कि वो संतोस दीदी ने कैसेट भरवाने के लिए जो पैसे दिए हैं उससे फ़िल्म देख आते हैं और संतोस दीदी को बोल देते हैं कि वो दुकानदार कही बाहर गया हुआ है तो कैसेट थोडे दिन बाद मिलेगी । 4-5 दिन में संतोस भैया के पापा आने वाले थे तो तब उनके पास पैसे भी आ जाते तो उसके बाद कैसेट भरवा कर दे देगें ।संतोस भैया ने ये सुझाव मान लिया और इस तरह उनकी टिकिट का इन्तज़ाम संतोस दीदी के दिये हुए पैसों से हो गया ।

संतोस भैया से बात करके हम घर आ गए और हमको अब मम्मी से अपनी टिकिट के पैसे और परमिशन दोनों लेना था । घर आकर हमने मम्मी को कहा कि वो संतोस भैया एक बहुत अच्छी बच्चों की पिक्चर देखने जा रहे हैं और हमको भी उनके साथ जाना हैं । मम्मी ने टिपिकल माँ-बाप का रोल निभाते हुए उसी समय फ़िल्म देखने जाने के लिए मना कर दिया। हम जानते थे ये इतना आसानी से नहीं होगा इसलिए थोड़ी देर बाद हमने मम्मी से फिर से पूछा और ये भी कह दिया कि फ़िल्म बहुत अच्छी है और उसमें कुछ कम्प्यूटर का भी प्रयोग दिखाया हैं। उस समय पेरेंट्स अपने बच्चों को अंग्रेजी भाषा और कम्प्यूटर सिखाने को लेकर पागल थे इसलिए हमने ये झूठ  बोला । इस बार मम्मी ने उतना सख्त रवैया नही रखा पर हमको टरकाने के लिए बोल दिया कि पापा से पुछूगी । शाम को मम्मी ने पापा से पूछा पर पापा ने भी सख्त रवैया अपनाते हुए मना कर दिए । अगले दिन हमने मम्मी के सामने जिद पकड़ ली कि हमको फ़िल्म देखने जाना ही हैं । इस बार हमने मम्मी को कहा कि ये फ़िल्म हमको देखना है, हमारी क्लास के दोस्त सब अपने मम्मी पापा के साथ देख आये और इस फ़िल्म के बारे में बाते करते हैं, केवल हम ही हैं जिसने नही देखी और हमको ऐसी बातचीत में चुपचाप खड़े रहना पड़ता हैं । सब बच्चों के मम्मी पापा उनको घुमाते है, बाहर खाना खिलाते हैं, फ़िल्म भी दिखाते हैं, केवल हम ही है जो कही नही जाते । हमकों पता हैं हमारी हालत ऐसी नही कि इतने शौक पूरे करे पर एक फ़िल्म तो दिखा ही सकते है । हमारी इस बात पर मम्मी इमोशनल हो गई और उन्होंने कहा कि फिल्म देखने चले जाना, मैं पापा से बात कर लूंगी। हम मम्मी की बात से खुश हो गए। हालांकि पापा कोई हां अभी बाकी थी।

रात को मम्मी ने पापा से हमारे फिल्म देखने वाली बात फिर से छेड़ी । पापा ने हर बार की तरह फिर से मना कर दिया। पर इस बार मम्मी ने पापा से बात हमारी मम्मी बन कर नहीं बल्कि पापा की धर्मपत्नी बनकर की। मम्मी ने कहा कि बेटा पहली बार कुछ कह रहा है इसलिए इसकी बात मान लेते हैं । वैसे भी वह कहां कोई जिद करता है, पढ़ाई भी अच्छी करता है, स्कूल भी जाता है, अच्छे नंबर भी ले कर आता है और हमारी हर बात मानता भी हैं । इसलिए उसकी यह इच्छा हमें पूरी करनी चाहिए। पर पापा फिर भी राजी नहीं हुए। अब मम्मी पूरी तरह पत्नी वाले फॉर्म में आ चुकी थी। उन्होंने पापा से अबकी बार जोर देकर कहा कि बेटा एक बार कोई जिद कर रहा है तो उसे पूरी करनी चाहिए वैसे भी हम कहां उसे कुछ करने देते हैं। इसके साथ ही मम्मी ने अपना पत्नी-पुराण शुरू करते हुए कहा कि मेरी कोई इच्छा पूरी नहीं करते कोई बात नहीं पर बच्चे की इच्छा तो पूरी करो | पुरे सात साल में मुझे केवल एक बार ही फिल्म दिखाने लेकर गए हो, वो भी पांच साल पहले “प्यार झुकता नहीं”, उसके बाद से कभी कोई पिक्चर दिखाने के लिए झुके ही नहीं |  मेरा क्या हैं, मैं तो मन मार लेती हूँ, कुछ नहीं कहती पर इन बच्चो के तो कोई शौक पूरे करो, अच्छे स्कूल जाता हैं, अच्छे लोगो के बच्चो के साथ पढ़ता हैं, वहा उसको कैसा लगता होगा | पापा अब समझ चुके थे कि अगर उन्होंने अब इस मेटर को और खींचा तो उनके अपराध अतीत के परतो से निकल-निकल कर सामने आएंगे और चार-पांच दिन तक वो घर में सुकून से सांस भी नहीं ले पाएंगे | इसलिए उन्होंने चतुर पति की तरह हमको फिल्म देखने के लिए परमिशन दी और अपना मानसिक स्वास्थ्य बेहतर बनाये रखा |

तो इस तरह से संतोस भैया के साथ फिल्म देखने जाने की जुगाड़ बैठाने, उनके टिकिट के पैसो का इंतज़ाम करना और मम्मी-पापा से परमिशन लेना जैसी तमाम बाधाओ को पार करते हुए हम अगले दिन रंगीला फिल्म देखने निकले |  जाने-अनजाने में किये गए इस काम को करते समय हमें ये ज्ञान बिलकुल नहीं था कि भारतीय परिवेश में ये जुगाड़-तुगाड़ का ज्ञान न्यूटन लॉ ऑफ मोशन से ज्यादा काम में आता हैं, और आज हमने इस ज्ञान को अर्जित करने में पहला कदम उठाया था जो कि भविष्य में बहुत काम आने वाला था |  निर्मल सागर जाते हुए हमने संतोस भैया को एक और जुगाड़ बैठाते हुए कहा कि साइकिल वो उनके पहचान के वाचनालय पर रख देते हैं ताकि पार्किंग के पैसे भी बच सके और उससे हम इंटरवल में समोसा खा सके | संतोस भैय्या हमारे सुझाव से प्रभावित हुए और इस तरह हमारे समोसे का भी इंतेज़ाम हो गया |

टॉकीज उस दिन हाउसफुल था और पूरे पंद्रह मिनट लाइन में लगकर हमको ड्रेस सर्कल क्लास का टिकिट मिला | इन पंद्रह मिनट में हम पूरे समय चोरी नज़रो से फिल्म के पोस्टर को निहारे जा रहे थे | विको वज्रदंती के विज्ञापन के बाद सीटियों और तालियो की गड़गड़ाहट से फिल्म शुरू हुई और हमारे जीवन का पहला सपना पूरा हुआ | फिल्म के बारे में जो ज्ञान हमें हमारे बेक-बेंचर दोस्त ने दिया था, फिल्म बिलकुल वैसी ही थी | फिल्म में उर्मिला मातोंडकर का लुक बहुत ग्लैमरस और बोल्ड था और उसको इतने बड़े परदे पर देखने का अनुभव बहुत ही रोमांचक था | घर पर तो कुछ ऐसा वैसा आ जाता था तो टीवी बंद हो जाती थी या इधर-उधर होना पड़ता था पर यहाँ तो दोनो आँखे खोलकर सब देखो | इतने अँधेरे में कोई हमें नहीं देख रहा और हम भी किसी को नहीं देख रहे | उस दिन फिल्म देखते हुए हमें बहुत अलग लग रहा था, कुछ अलग ही फीलिंग हो रही थी, जैसा पहले कभी नहीं हुआ | हमें नहीं पता था इसे आकर्षण कहे या कामुकता, पर वो बहुत अलग आनंद था | कोई नया खिलौना या अच्छा खाना देखकर हम खुश तो बहुत हुए पर ये नहीं लगा जो आज लग रहा था | ऐसी विचित्र परन्तु मजे वाली फीलिंग हमको आखिरी बार आइसक्रीम खाने पर आई थी, जब हमने इतनी ठंडी, मीठी और मुँह में घुलने वाली चीज़ पहली बार बार खाई थी | मुँह ठण्ड के मारे सिकुड़ा जा रहा था, दांत किटकिटा रहे थे पर फिर भी मजा आ रहा था | हमारा दिल उस पल उर्मिला मातोंडकर को देखकर जोर से धड़के जा रहा था, साँसे तेज़ हो रही थी पर फिर भी हमको अच्छा लग रहा था |

वैसे फिल्म का जुगाड़ हमने उर्मिला मातोंडकर के आकर्षण में बंधकर बैठाया था पर फिल्मे में हमें आमिर खान के रंग बिरँगे शर्ट और जैकी श्रॉफ के स्टाइलिश गॉगल भी बहुत अच्छे लगे | फिल्म में एक प्रेम कहानी थी और क्लाइमेक्स तक आते-आते हम भी आमिर खान की तरह बहुत इमोशनल हो गए थे | फिल्म के अंत में तो हमें हीरो-हीरोइन का प्यार देखकर ऑंसू भी आने लगे थे | बाहरी आकर्षण में बंधकर फिल्म देखने आये थे पर फिल्म हमें प्यार की परिभाषा भी सीखा गई | अब हम समझ सकते थे कि संतोष भैया ने वो लेटर संतोस दीदी को क्यों लिखा होगा | फिल्म देखने के बाद हमने भी निश्चय किया कि जीवन में कुछ करे या ना करे, इस तरह किसी लड़की से सच्चा प्यार जरूर करेंगे | तो इस तरह से प्रेम और आकर्षण की फीलिंग को आत्मसात करते हुए हम निर्मल सागर से जब विदा हुए तो हमारे मन में एक ही गाना गुनगुनाये जा रहा था – तनहा-तनहा यहाँ पर जीना ये कोई बात हैं |

वैसे जब हम निर्मलसागर में बैठकर प्रेम कहानी के निर्मल आनंद ले रहे थे उस समय एक ऐसी घटना हुई जिसने हमारी लाइफ में एक्शन की पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी | संतोस भैया के पापा उस दिन कुछ काम से शहर आये थे और वो वाचनालय वाले रिश्तेदार से मिलने चले गए | वाचनालय वाले रिश्तेदार ने रिश्तेदारी का प्रथम कर्तव्य निभाते हुए संतोस भईया की चुगली उनके पापा से कर दी | उन्होंने उनके पापा से कहा कि ये लड़का तो कोई पढाई नहीं कर रहा, यहाँ बस मजे कर रहा हैं | रोज मेरे वाचनालय पर आ जाता हैं और टाइम-पास करता रहता हैं, देखो ये फिल्मो के विज्ञापन वाला पेपर घंटो पढ़ा करता हैं | और कोर्स की किताबे छोड़कर ऐसी किताबे पढ़ने घर ले जाता हैं | ये बोलते हुए उन्होंने हाथो से इशारा करके ‘मनोहर कहानियाँ ‘ और ‘फिल्मफेयर’ मैगज़ीन दिखा दी | रिश्तेदार ने पापा को यह भी कहा कि आपका लड़का हर २-४ रोज में फ़िल्मी गानो की लिस्ट लेकर आता हैं और कैसेट भरवाने ले जाता हैं | और अंत में उन्होंने ये भी बता दिया कि संतोस भैया अभी सब काम छोड़कर फिल्म देखने गए हैं | अपनी और से उन्होंने पापा को समझाइश भी दे दी कि इस लड़के को तो गाँव ले जाओ, यहाँ शहर में तो ये रंगरलिया मनाने आया हैं | सांतोस भैया के पापा जरा पुराने विचारो वाले और सख्त मिजाज के थे, फिल्म देखना वो अच्छा नहीं मानते थे | रिश्तेदार की बात सुनकर वो आग-बबूला हो गए और गुआडी में चले गए, वहाँ वो आँगन में बैठकर संतोस भैया का इंतज़ार करने लगे |

फिल्म देखने के बाद जैसे ही हम घर पहुंचे, संतोस भैय्या के पापा बाहर आँगन में ही खड़े मिल गए | उनके हाथो में नीम के पेड़ की एक टहनी भी थी | उन्होंने संतोस भैया से पूछा कि कहाँ से आ रहे हो | संतोस भैया बोले कि वो वाचनालय गए थे कुछ किताब पढ़ने | संतोस भैय्या ने अपना जवाब खत्म भी नहीं किया था कि नीम के पेड़ की टहनी की डिजाइन उनके शरीर पर छप चुकी थी | जैसे ही संतोस भइया के पापा ने उनको मारा हम संतोस भइया के पास से भाग गए | झूठ सुनने के बाद संतोस भैया के पापा का गुस्सा सातवे आसमान पर था और वो एक के बाद एक चार बार संतोस भैया को लकड़ी से मार चुके थे और बोलते जा रहे थे कि शहर आकर झूठ बोलना भी सीख गया हैं, यहाँ मटरगश्ती के लिए भेजा हैं या पढ़ने के लिए भेजा हैं | अब संतोस भैय्या को लगातार जूते पड़ते जा रहे थे और हम आँगन में देख रहे थे कि हमारी मम्मी तो वहाँ नहीं हैं | इधर-उधर देखने पर हमने मम्मी को आँगन के कोने में बाथरूम के पास कपडे धोते हुए देखा | अच्छी बात ये थी कि मम्मी की पीठ हम लोगो की तरफ थी और उन्हें हमारी आवाज़ भी नहीं सुनाई दे रही थी | हमको डर था कि हमारी पोल भी ना खुल जाये इसलिए हम डेमेज कंट्रोल के मोड में तुरंत मम्मी की और भागे और उनसे बाते करने लगे ताकि मम्मी मुड़े नहीं और हम बच जाये | हमने मम्मी के पास जाकर उनको बातो में लगा दिया और पानी का नल भी चालू कर दिया ताकि संतोस भैया की सुताई मम्मी ना देख ले |

इस तरह से हमने बातो में लगाकर मम्मी के मोर्चे पर तो बात सम्भाल ली पर पापा के मोर्चे पर उस दिन हमारी किस्मत भी संतोष भैय्या जैसी ही थी | जब संतोस भैया के पापा अमरीश पूरी बनकर उनको कुत्ते की तरह पीट रहे थे, हमारे पापा भी किसी काम से घर आ गए | अब हमको काटो तो खून नहीं था, पापा के पास जाकर बात सँभालने का हमारे पास कोई चारा ना था, और डर अलग था कि हमारी पोल भी खुल गई तो संतोस भैया की तरह हमारी ठुकाई भी चालू हो जाएगी | हमारे पापा ने संतोस भैय्या के पापा को रोकने का प्रयास किया कि ऐसे कोई बच्चे को मारता हैं क्या |  इस पर संतोस भैया के पापा ने वाचनालय वाले रिश्तेदार की पूरी बात हमारे पापा को बता दी कि संतोस भैया वाचनालय से लाकर गन्दी किताबे पढ़ते हैं, मटरगश्ती करते हैं और आये दिन फिल्मे देखने जाते हैं | अभी भी वो टाकीज में रंगरलिया देखने गए थे और पूछने पर उन्होंने झूठ बोला कि वाचनालय में पढ़ने गए थे |  इतना बोलने के बाद संतोस भैया के पापा उनको मारते हुए कमरे के अंदर ले गए | उसके बाद बंद कमरे में संतोस भैया के साथ क्या हुआ हमको नहीं मालूम पर अब हमें अपनी चिंता सता रही थी |

उस समय हमने सोचा कि अभी पापा के सामने जाना मतलब मुसीबत को दावत देना हैं। इसलिए हम तुरंत बाहर गली में खेलने चले गए और शाम को लौटे। शाम को हम घर पहुंचे तो घर का माहौल सामान्य पाया।  मम्मी खाना बना रही थी और पापा हमारे छोटे भाई को खिला रहे थे। हमने किसी से कुछ नहीं बोला और तुरंत अपनी कोर्स की किताबे उठाकर पढ़ने बैठ गए। रात को खाना भी खाया तो सब कुछ ठीक था, ना मम्मी ने हमसे कुछ पूछा या कहा और ना पापा ने। हमने माहौल समझने के लिए पापा-मम्मी से एक-दो बार बात भी करने की कोशिश की पर उन्होंने फिल्म का कुछ नहीं पूछा और हमें वो नार्मल ही लगे।  हम समझ गए कि पापा-मम्मी को पता नहीं चला हैं कि हम बाल-फिल्म का झूठ बोलकर संतोस भैय्या के साथ रंगीला देखकर आये हैं।  पापा समझ गए होंगे कि संतोस भैय्या के पापा गाँव के हैं और पुराने ख्यालात के हैं, वो इस तरह टाल्कीस में फिल्म देखना अच्छा नहीं समझते होंगे इसलिए उनके पापा ने उनको बहुत मारा। अब हमारा डर ख़तम हो गया और हम निश्चिंत होकर रात में सोने चले गए।

हम सोने के लिए लेट तो गए पर उस रात हमें नींद नहीं आ रही थी।  हमारी नींद तो उर्मिला मातोंडकर और उनकी रंगीला फिल्म ने चुरा ली थी।  बार-बार हमें फिल्म के दृश्य और गीत याद आ रहे थे, खासकर समंदर किनारे किया डांस और याई-रे वाला गीत तो हमारी आखो के सामने ही घूम रहा थ। उस समय हम सोच रहे थे कि काश हमारे पास ऐसा कुछ जुगाड़ होता कि हम जब चाहे तब वो फिल्म देख सकते और उसके गीत सुन सकते।  ये सोचते हुए हमने सोचा नहीं था कि आने वाले सालो में हमारी ये इच्छा मोबाइल के रूप में पूरी होने वाली थी। रंगीला के बीच-बीच में हमें संतोस भइया का भी ख्याल आ जाता था और उन पर दया और हंसी दोनो आ रही थी।  वो बेचारे हमारे चक्कर में बेकार ही पीट गए। 

रंगीला और संतोस भैय्या के ख्यालो के बीच लेटे हुए उस रात हमने मम्मी और पापा के बीच की बातचीत सुनी, जो वो लोग सोने से पहले कर रहे थे।  पापा मम्मी पर बहुत गुस्सा करते हुए पूछ रहे थे कि तुमको पता हैं संतोस इसको कौन सी फिल्म दिखाने ले गया था।  मम्मी ने बताया कि वो कोई बच्चो की पिक्चर देखने गया था।  पापा ने बोला फिर संतोस के पापा ने उसको इतना क्यों पीटा।  मम्मी तो कुछ जानती नहीं थी तो चुप रही।  थोड़ी देर बाद पापा ही बोले कि वो संतोस इसको बच्चो की पिक्चर नहीं, कोई और पिक्चर दिखाने ले गया था, वो वाचनालय वाले रिश्तेदार ने संतोस के पापा को सब बताया फिल्म के बारे में और कहा कि संतोस टाकीज में रंगरलिया देखने गया था। तुम थोड़ा ध्यान रखा करो जब बच्चे को ऐसे किसी के साथ बाहर भेजो। इस पर मम्मी ने कहा कि वो तो बोल रहा था कोई बच्चो की शिक्षाप्रद  पिक्चर हैं और उसमे कम्प्यूटर का भी प्रयोग हैं। पापा इस बात पर बहुत गुस्सा होते हुए बोले कि अरे अनपढ़ कोई कम्प्यूटर का प्रयोग नहीं रहता ऐसी पिक्चरों में, देखा नहीं कैसे पोस्टर लगे हैं इस फिल्म के पुरे शहर में, उसमे कही कम्प्यूटर दिखा क्या तुमको। इस पर मम्मी ने कहा कि मैं क्या जानु, तुम मुझे शहर घुमाने ही कब ले जाते हो।  पापा बोले शहर नहीं घूमी तो पीछे वाली गली में तो गई हो, वहाँ पर ही इस फिल्म का पोस्टर लगा हैं। अंत में पापा ने मम्मी को सख्त हिदायत दी कि बच्चा छोटा हैं, उसको उस संतोस के साथ मत खेलने देना, पता नहीं हमारे बच्चे को क्या गन्दी-गन्दी बाते सिखाता होगा वो।  पापा ने फिल्म का सारा दोष भी संतोस भैय्या पर डालते हुए कहा कि अपना बच्चा तो अभी छोटा हैं, ये संतोस ही उसको बाल फिल्म बोलकर ऐसी फिल्म दिखा लाया होगा। 

पापा-मम्मी की ऐसी बातचीत हम आँखे मूंदे सुन रहे थे और हम सोच रहे थे हमारे मम्मी-पापा हमको बहुत अंडर एस्टीमेट कर गए।  ये रंगीला देखने का सारा प्लान हमारा बनाया था और ये लोग दोष बेचारे संतोस भैय्या को दे रहे हैं।  वैसे हमारे लिए अच्छा ही था की वो हमें अभी भी छोटा बच्चा ही मानते हैं, हम अपनी मासूमियत के कारण आज बच गए। वो हमें मासूम समझ रहे थे जबकि मासूम तो मम्मी-पापा थे, एक तो गलती उनको पूरी संतोस भैया की लग रही थी, दूसरा फिल्म का नाम भी उन्हें ठीक से नहीं पता, पापा रंगीला की जगह रंगरलिया बोल रहे थे और मम्मी ने तो बाजार में फिल्म के पोस्टर भी नहीं देखे। बेचारे मम्मी-पापा दोनो दिन भर तो हमारी परवरिश और घर चलाने में लगे रहते हैं, उन्हें क्या पता बाहरी दुनिया में क्या चल रहा हैं। ‘जान बची सो लाखो पाए’ की तर्ज पर जब उस दिन हम सोये तो हमारे मन में विभिन्न प्रकार की फीलिंग थी।  संतोस भैया पर दया आ रही थी, खुद पर पछतावा हो रहा था कि मम्मी पापा से झुठ बोला, मम्मी-पापा के लिए तो प्यार और सम्मान बहुत बढ़ गया था और रंगीला के बारे में सोचकर तो हम भी नहीं जानते कि कौन सी फीलिंग आ रही थी। 

अगले दिन सुबह जब हम उठे तो हमें सबसे पहले संतोस भैय्या का ध्यान आया।  हमको लगा सबसे पहले उन बेचारे के हालचाल पूछना चाहिए। मम्मी-पापा से नज़रे बचाते हुए हम संतोस भैय्या के रूम में चले गए।  संतोस भैय्या उस समय नहाने के लिए बाथरूम गए हुए थे पर उनका रूम खुला था और वहाँ उस दिन का दैनिक अवंतिका पेपर रखा हुआ था।  हम पेपर पढ़कर उनका इंतज़ार करने लगे।  दैनिक अवंतिका में फिर से फिल्मो के विज्ञापन वाले पृष्ठ पर रंगीला का पोस्टर दिखा, आज उस पर लिखा था कि निर्मल सागर में अंतिम दो दिन। हम खुश हुए कि हमने समय के पहले ही अपना काम पूरा कर लिया।  यकीन मानिये वो ज़िन्दगी का एकमात्र प्रोजेक्ट था जो डेड लाइन से पहले ख़त्म हुआ था।  रंगीला के ही नीचे उस दिन एक और फिल्म का विज्ञापन आया था। फिल्म का पोस्टर ऐसा था कि हमारी आँखे फटी के फटी रह गई, पोस्टर के नीचे लिखा था – ‘मचलती जवानी की मदमस्त कहानी…..रंगरलिया’, मोहन टाकीज में रोजाना चार खेल ३-६-९-१२।  पोस्टर के एक कोने में “A” भी मेंशन था। इस फिल्म का नाम था ‘रंगरलिया’। हम ये विज्ञापन देखकर तुरंत पीछे की गली में गए और देखकर आये कि वहाँ कौन सा पोस्टर लगा हैं।  पीछे वाली गली में सार्वजनिक पेशाबघर पर रंगरलिया का पोस्टर ही लगा था।  रंगीला का पोस्टर तो पूरी गली में कही भी नहीं था। अब हमें समझ आया कि संतोस भैय्या के पापा बार-बार बोल रहे थे कि टाकीज में रंगरलिया देखकर आया हैं, इससे हमारे पापा को लग गया कि हम रंगीला नहीं रंगरलिया फिल्म देखकर आये हैं। अभी हम यह भी समझ चुके थे कि ये रंगरलिया कुछ अलग ही केटेगरी की फिल्म हैं इसीलिए पापा हमारे फिल्म देखने को लेकर मम्मी पर इतना नाराज़ हुए। हमारे बेक-बेंचर दोस्त ने हमको एक बार बोला भी था कि उसको निर्मल सागर में नहीं बल्कि मोहन टाकीज में पिक्चर देखने में ज्यादा मज़ा आता हैं।  अब हमें समझ आया कि उसको मोहन टाकीज में ही क्यों मज़ा आता हैं। उस पल हमें लगा कि हम अभी भी बच्चे ही हैं, दुनिया रंगरलिया तक पहुँच चुकी थी और हम अभी तक रंगीला पर ही हैं। अभी पापा ने जो भी समझ लिया उसका क्या किया जा सकता था तो हम फिर से संतोस भैय्या के रूम में आ गए और फिल्मो के विज्ञापन वाला पेज देखने लग गए। 

अब हमारी नज़रे रंगरलिया के विज्ञापन से हटने को तैयार नहीं थी। संतोस भैय्या को आने में दस मिनट लगे और इन दस मिनटों में हमने रंगरलिया फिल्म के विज्ञापन को बीस बार देखा और पढ़ा था। फिल्म के पोस्टर से वैसे हमें समझ में आ गया था कि फिल्म में क्या देखने को मिलेगा पर विज्ञापन के अंत में लिखा था ‘केवल वयस्कों के लिए’।  हमें ये वयस्क शब्द का मतलब पता नहीं था। हम इस शब्द का मतलब सोच ही रहे थे कि संतोस भैय्या रूम में आ गए।  उनके आते ही हमने उनसे पूछा कि भैया ये वयस्क का क्या मतलब होता हैं ? संतोस भैया ने पेपर में फिल्मो के विज्ञापन वाला पेज खुला देखा और उसके सामने हमें बैठा देखा तो उन्हें समझ में आ गया कि हम उनसे ये सवाल क्यों पूछ रहे हैं। वो तुरंत हमारे पास आये, गुस्से से हमारा कान मरोड़ा और रूम के बाहर करते हुए बोले कि तेरे रंगीला देखने के चक्कर में कल हमारे बाप बलवंत राय ने ढाई किलो की लकड़ी से कुत्ते की तरह पीटा, अब ये रंगरलिया देखने गए तो मुझे गाँव में जाकर गाय-भैस ही चराना पड़ेगी, चल भाग यहाँ से।  हम छोटा सा मुँह लेकर उनके रूम से बाहर तो आ गये पर सोच रहे थे कि अब ये रंगरलिया फिल्म देखने का जुगाड़ कैसे बैठाया जाये। 

6 thoughts on “रंगीला

  1. उस समय के माहौल का एकदम सटीक चित्रण
    पढ़कर बचपन की यादें ताज़ा हो गई
    उस समय टॉकीज़ में फ़िल्म देखना बहुत बड़ी बात होटी थी

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  2. बेचारे संतोस भैया…फालतू में पिट गए !
    मुझे संतोस और संतोस दीदी की लव स्टोरी में भी काफी इंटरेस्ट आ रहा था, उस कहानी को आगे बढ़ायेगा कभी

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  3. आपकी कहानी की एक पंक्ति पढ़ी और फिर खुद को रोक ही नही पाई। पूरी कहानी ऐसा लग रहा था सामने ही चल रही हो । निर्मल सागर टॉकीज़, विको वज्रदंती विज्ञापन, मोहन टॉकीज़, कैसेट में गाने भरवाना, दैनिक अवंतिका…कई सारी चीज़ों का रेफरेंस बहुत अच्छा लगा ।
    निरंतर आपकी लेखनी में धार आ रही है।

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