विजयादशमी


जल जाता हैं रावण रह जाती हैं राख
सबको समझाती एक ही बात
कि रावण को मारता नही हैं राम
रावण को मारता हैं उसका अभिमान

पुरुष की भी होती हैं लक्ष्मण रेखा
पुरुष के लिए भी होती हैं मान मर्यादा
जिसने भी इस रेखा को लांघा
उसका विनाश सारे संसार ने देखा

गृहस्थ सी गरिमा और साधु सा सदाचार
यही होते हैं पुरुष के श्रृंगार
और सत्य की रक्षा, अन्याय का दमन
यही हैं वास्तविक पुरुषार्थ की पहचान

राम रावण हैं दो विचार
एक दूषित तो दूसरा निर्विकार
जीवन में उतारो राम सा व्यवहार
इसीलिए तो हैं विजयादशमी का त्यौहार

—- अंकित सोलंकी, उज्जैन (मप्र)
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