सच कह रहा हैं दिवाना


इस दुनिया में सबसे मुश्किल कार्य है – पराजय को स्वीकार करना, पीड़ा को आत्मसात करना। नायक वो नही होता है जो हमेशा विजय ही प्राप्त करे, नायक वो होता है जो पराजय को भी स्वीकार करे, क्योकि खलनायक तो परास्त होते ही समाप्त हो जाता है। नायक वो होता हैं जो पीड़ा को भी हर्ष की तरह आत्मसात करे, भोलेनाथ की तरह सारा विष अपने अंदर रखे और फिर भी मुस्कुराये ।

इस गीत में भी नायक अपने इसी नायकत्व को प्राप्त करने की और अग्रसर हैं। नायक जिस लड़की को बेपनाह प्रेम करता है, उसे हमेशा के लिए खो रहा हैं । उसकी तमाम कोशिशों के बावजूद उसकी प्रेमिका उसे स्वीकार नही करती हैं और अब वो इस पीड़ा को स्वीकार कर चुका हैं कि उसे जीवन भर इस अधूरे प्रेम के दर्द के साथ जीना हैं । इस पर भी वज्रपात ये कि प्रेमिका जिस व्यक्ति से विवाह कर रही हैं वो नायक का चिर-प्रतिद्वंदी हैं । इस पराजय को भी नायक को स्वीकार करना हैं । और ये पराजय वैसी ही हैं जैसे भारतीयों द्वारा वर्ल्ड कप के फाइनल में पाकिस्तान के हाथों हार पचाना।

कई दिनों की उठापटक और नाटकीय घटनाक्रम की समाप्ति के पश्चात नायक अपने मित्रों के साथ थक हारकर खड़ा हैं, बीयर पी रहा है । एकाएक उसे बोध होता है कि अब सब समाप्त हो चुका हैं, कोई उम्मीद बाकी नही हैं।प्रेम में सब कुछ गंवाकर भी प्रेम को अपने मन से भुला नही पाया है और भूलने की इसी कोशिश में ये गीत गाना शुरू करता हैं । दिल मे बैचैनी हैं, दर्द हैं और गुस्सा भी हैं । ये सब कुछ आर माधवन जैसा विलक्षण कलाकार अपने अभिनय से बखूबी बयाँ करता हैं ।

“सच कह रहा है दीवाना, दिल ना किसी से लगाना
झूटे है प्यार के वादे सारे, झूठी है प्यार की कसमें
मेने हर लम्हा जिसे चाहा जिसे पूजा
उसी ने यारो दिल मेरा तोड़ा, तन्हा तन्हा छोड़ा”

गीतकार समीर और संगीतकार जयराज का भी जवाब नही, इस गीत को बहुत ही साधारण शब्दो से शुरू किया हैं । पर इस गीत के साधारण बोल ही इस गीत को सबसे असरदार बनाते हैं । ना इश्क़ को आग का दरिया कहा, ना दिल टूटने को ज्वालामुखी फटना कहा पर फिर भी चार पंक्तियों में सब कुछ बता दिया कि जिसे मेने चाहा उसी ने मेरा दिल तोड़ दिया ।

गीत का मुखड़ा जितना सरल और प्रभावी, अंतरा उतना ही असाधारण और औजस्वी ! पहला अंतरा “मौसम मौसम था सुहाना बड़ा” से शुरू होकर “उसकी कमी हैं जीवन मे” तक होता हुआ “क्यों उसे मैं चाहू” पर समाप्त होता हैं । यहाँ तारीफ गायक केके की भी करनी होगी कि वो मौसम-मौसम तो बड़े ही नर्म और मीठे स्वर से शुरू करते है, पर “उसकी कमी हैं जीवन मे” तक दिल मे सुईया चुभाना शुरू कर देते हैं, और “”क्यों उसे मैं चाहू” को अनुभूति की उस तीव्रता पर लाकर छोड़ते हैं कि उसके बाद कुछ भी कहने की आवश्यकता ही नही बचती हैं। और शायद संगीतकार भी इस बात को समझ गए थे, इसीलिए तो इसके बाद कुछ कहने के स्थान पर ल-लाय-लायला फिलर को उपयोग किया !

गीत का दूसरा अंतरा भी पहले की तर्ज पर ही है, पर पहले से भी ज्यादा तीव्र, उन्मादी, गुस्से और दर्द से लबरेज़ ! ऐसा लगता है जैसे पतीले में रखा दूध धीरे-धीरे गर्म होकर उफान पर आ गया हो । गायक केके अपने स्वर में दर्द की मात्रा को भी दुगुनी कर देते हैं । ये अंतरा “सुन्दर-सुंदर थी हसीना बड़ी से” शुरू होता हैं । ये अगर प्रेम गीत होता तो सुंदर सुंदर के स्थान पर फूलों सी या चाँद सी सुंदर होता पर ये तो पीड़ा गीत हैं इसलिए सिर्फ सुंदर सुंदर ही कहा गया। सुंदर सुंदर की उपमा से शुरू हुआ अंतरा “एक दिन उसे भूला दूँगा मैं” की शपथ तक पहुचता हैं और “चाहूँगा ना मैं उस पत्थर को” की तोहमत देकर रुक जाता हैं। और साहिबान यही सबसे लाजवाब पल हैं इस गीत का ! “चाहूँगा ना मैं उस पत्थर को, जा उसे बता दे” पर जाकर स्वर रुकता नही है, बल्कि भावनाओ के उस चरम पर पहुँच जाता है जहाँ गला रुंध जाता हैं, शब्द अटक जाते हैं और सिर्फ आँसू ही बोल पाते हैं, आँसू ही सुन पाते हैं। गीत के फिल्मांकन में भी इस पंक्ति पर आर माधवन के वो आँसू निकले हैं कि हिन्द महासागर में भी बाढ़ ला दे ! इस अद्भुत प्रभाव को उत्पन्न करने के लिए वाकई गायक केके, संगीतकार हैरिस जयराज, गीतकार समीर और अभिनेता आर माधवन बधाई के पात्र हैं !

हताश मानव के हाव-भाव का चित्रण करता ये गीत कई अर्थो में महत्वपूर्ण हैं। जैसे दर्द को भी जीवन मे बयाँ करना जरूरी होता है, ताकि आगे जीने की दिशा मिले । खुशी का भी एक दिन होता हैं और दर्द का भी एक दिन होता हैं। और उस दिन के बाद खुशी हो या दर्द सब कुछ भूलकर आगे बढ़ना होता है, यही जीवन है । फ़िल्म का नायक भी उस रात दर्द और पीड़ा का सोग मनाकर अगले दिन नई नौकरी के लिए विदेश निकल जाता हैं । और जाने से पहले अपनी प्रेमिका सहित सबको माफ कर देता हैं और एक भारी पर पवित्र हृदय के साथ नए जीवन की शुरुआत कर रहा होता हैं ! कभी-कभी सोचता हूं कि इस फ़िल्म के अंत मे नायिका नायक के पास ना आती तो क्या होता? कुछ नही होता जनाब, नायक कही विदेश मे सेटल हो जाता, उसे कोई और लड़की मिल जाती या नही मिलती तो कही किसी और काम मे दिल लग जाता, वैज्ञानिक बन जाता, साधु बन जाता, लेखक बन जाता, रॉकस्टार बन जाता, वेटर बन जाता, क्या पता चोर या माफिया बन जाता । ये जीवन है जनाब, आप चाहै या न चाहे, ये आपको कही ना कही तो लेकर ही जायेगा, कुछ ना कुछ तो बना ही देगा ।इसलिए आज जो भी मिला है, उसे पूरे मन से अपना लीजिये, खुशी मिली तो खुलकर हँस लीजिये, दर्द मिले तो रो लीजिये, जिम्मेदारी मिले तो जी भरकर निभा दीजिये और मनमानी मिले तो मन भरकर मौजमस्ती कीजिये । कोई भी अफसोस मत रखिये।

अब आप लोग भी बिल्कुल अफसोस मत रखिये, आर माधवन की अदाकारी, समीर की लेखनी, केके के स्वर और जयराज के संगीत के जादू में खो जाइये, इस गीत को तुरंत सुनिए, देखिए और महसूस कीजिये । क्या पता ये गीत आपको भी दर्द सहने की और पराजय स्वीकार करने की शक्ति दे।

और अंत मे – ‘चाहूँगा ना मैं उस पत्थर को’ ये इस गीत की सबसे प्रासंगिक पंक्ति हैं, पूरे गीत का सार । गली, मोहल्ले में, महफ़िल में, अकेले में, दोस्तो के बीच जाने कितने लड़के, युवा, अधेड़ अपने पुराने प्यार को याद करके इस पंक्ति को कहते हुए मिल जायेंगे । गौरतलब हैं कि चाहना भी हैं, याद भी करना है और कह रहे हैं – ” चाहूँगा ना मैं उस पत्थर को ” । अब इन्हें कौन समझाए कि चाहने की क्या बात करे , यहाँ तो पत्थर ही पूजे जाते हैं और इंसान भुला दिए जाते हैं ।

-अंकित सोलंकी (उज्जैन, मप्र)