केके


कृष्णकुमार कुन्नथ उर्फ़ केके को सबसे पहले हमने सुना एल्बम “पल” में | पल-चल जैसे नर्सरी राइम वाले शब्दों पर बना गीत “ये हैं प्यार के पल” आज भी स्कूल कॉलेज की यादो का एंथम बना हुआ हैं | ठहराव केके की गायकी का मूल तत्व हैं, इस गीत में भी वो पल या चल को बड़े इत्मीनान से बोलकर थोड़ा रुकते हैं और यही वो पल हैं जहा वो गीत का सारा भाव समझा देते हैं और आगे का गीत हम बस स्कूल कॉलेज की यादो के गलियारे में बैठकर मंत्रमुग्ध होकर सुनते ही रह जाते हैं | इसी तरह का एक गीत था – “यारो दोस्ती बड़ी ही हसीन हैं” | दोस्ती के भाव को दीपक की बाती जैसी लय में जितनी खूबसूरती और कोमलता से केके ने गाया हैं वो शायद की किसी और गीत में सुनने को मिले |


केके को किसी फिल्म के गीत में शायद पहली बार हमने सुना फिल्म हम दिल दे चुके सनम के गीत “तड़प-तड़प के इस दिल से आह निकलती रही” में | अपने पहले ही प्रयास में केके ने वो मुकाम हासिल किया जिससे ऊपर जाना उनके लिए भी आज तक मुमकिन नहीं हुआ | इससे पहले और इसके बाद में भी जितने दर्द भरे गीत बने, सभी में गायक सुर-ताल और लय के साथ बड़े-बड़े आलाप लेते हुए गाता था, जबकि वास्तविकता में ये मुमकिन ही नहीं हैं | जब कोई दुःख में हो तो सुरो पर संतुलन कैसे बना सकता हैं | केके ने इस गीत को चीखते-चिल्लाते हुए लहजे में गला फाड़कर गाया | जैसे कोई अपनी किस्मत पर रो रहा हो, ईश्वर से शिकायत कर रहा हो – “जिस्म मुझे देकर मिट्टी का, शीशे सा दिल क्यों बनाया” | पहली बार ये गीत केवल बेसुरे के चीखने-चिल्लाने से ज्यादा कुछ नहीं लगेगा पर जब ये गीत इत्मीनान से पूरा सुनेगे तो देखेंगे गीत में केके ने वाकई में कमाल ही कर दिया था (खासकर “लूट गए” इस शब्द में तो केके ने ऐसा सुर दिया हैं कि कोई सड़क पर लौटते हुए कराह रहा हैं – “लूट गए” )| यकीन ही नहीं होता हैं “दोस्ती बड़ी ही हसीं हैं” जैसा कोमल गीत और “तड़प-तड़प” जैसा कठोर गीत एक ही गायक ने गाये हैं | आप इस गीत को अगर फिल्म में देखेंगे तो पाएंगे कि केके की आवाज़ में जितना दर्द था उतना सलमान खान भी अपने अभिनय से पैदा नहीं कर पाए हैं | अपने पहले ही प्रयास में केके समकालीन गायको से कही आगे निकल गए |


एक और गीत था – “मैंने दिल से कहा ढूंढ लाना ख़ुशी” | नीरस और एकाकी जीवन से उपजे रंज की भावनाओ पर आधारित ये गीत केके ने बड़े इत्मीनान और ठहराव से गाया हैं | दर्द का ये स्वरुप केवल केके ही दिखा सकते थे कि जीवन में कोई बड़ा दुःख नहीं पर फिर भी कोई दुखी हैं और इस दुःख को बड़े फिलॉसॉफिकल तरीके से बता रहा हैं – “जश्न ये रास ना आया, मज़ा तो बस गम में आया हैं” | इस गीत को केके ने बहुत सहज अंदाज में गाया हैं, जैसे कोई हमारे सामने बैठा हैं और अपना हाल बता रहा हैं, और हम उसकी नीरस जीवन की बातो को बड़े चाव से सुन रहे हैं | केके की सहजता, आवाज़ का टेक्सचर, गीत के बोल और इरफ़ान का अभिनय इस गीत के मुख्य आकर्षण हैं | “आवारापन-बंजारापन” भी इसी अंदाज का गीत हैं, जो सुनने पर दिल में हुक सी उठाता हैं, इस गीत में आवारापन-बंजारापन शब्द ही केके ने इतने जादुई और रहस्मयी अंदाज में बोले हैं कि आगे का गीत ना भी सुने तो ये शब्द आपके ह्रदय में गूंजते रहेंगे | फिल्म “रहना हैं तेरे दिल में ” केके ने गाया हैं – “सच कह रहा हैं दीवाना” | प्रेम में नाकाम प्रेमी के भावो से भरा ये गीत जितना दर्द में डूबा हैं, उतना ही मधुर और कर्णप्रिय भी |


केके ने माधुर्य भरे गीत भी बहुत गाये हैं | “क्यों आजकल नींद कम, ख्वाब ज्यादा हैं” गीत में वो अपनी जादुई आवाज़ से प्रेम के उत्साह को दिखाते हैं तो “सज़दे किये हैं मैंने” गीत में प्रेम की खुशी और ईश्वर के प्रति गरेटिटूयड की भावना दिखाते हैं | ” दिल इबादत” और “ज़रा सा दिल में दे जगह तू” जैसे गीत प्रेम की मिठास को हमारे कानो में ही नहीं बल्कि ह्रदय-आत्मा में घोल देते हैं | ये भी केके की आवाज़ का जादू हैं कि खुदा, दिल जैसे दर्जनों बार उपयोग किये गए घिसे-पीटे शब्दों से भरा गीत “खुदा जाने” सुपरहिट हो जाता हैं | फिल्म “बचना ऐ हसीनो” के इस गीत में केके “खुदा जाने” में ऐसा स्वर लेते हैं कि आवाज़ आसमान के पार खुदा तक पहुचानी हो और उसके तुरंत ही बाद “कि बन गया हूँ मैं तेरा” इस अंदाज में गाते हैं कि आवाज़ सिर्फ दो प्रेमियों के बीच सिमटी रहे | शब्दों में भावनाओ का ऐसा उतार-चढ़ाव देकर सुनने वाले के ह्रदय में चाशनी घोलना ही केके के गायन का मुख्य जादू हैं, आज भी हम “पल”, “आवारापन-बंजारापन”, “खुदा-जाने” जैसे शब्दों को सुनते ही इन गीतों में जैसे खो जाते हैं |


दो गीत और हैं जिनके बिना हमारी चर्चा अधूरी रहेगी | बजरंगी भाईजान फिल्म में एक गीत हैं – “तू जो मिला तो सब कुछ है हासिल” और इक़बाल फिल्म का गीत “आशाएं” | मुन्नी और बजरंगी के रिश्ते पर आधारित गीत “आशियाना मेरा साथ तेरे हैं ना” जैसी भावपूर्ण पंक्ति से आरम्भ होता हैं और “जैसे तू धड़कन मैं दिल” के अंजाम तक पहुँचता हैं | ये गीत नहीं बल्कि पूरी फिल्म की कहानी हैं, मुन्नी और बजरंगी के मासूम रिश्ते को केके भी उतनी ही कोमलता और संवेदना से नाम देते हैं – “जैसे तू धड़कन मैं दिल” | इक़बाल फिल्म का गीत “आशाये” में केके उम्मीद और हौसलों का ज्वालामुखी पैदा कर देते हैं | जीवन में जब भी आप आप को निराश और हारा हुए पाए, ये गीत जरूर सुने, इस गीत में केके की आवाज़ नसों में उम्मीदों का हीमोग्लोबिन पैदा करने की काबिलियत रखती हैं |


सात सुर होते हैं संगीत में, पर केके आठवे सुर के भी महारथी हैं | किसी भी गीत की आत्मा पर, भाव पर केके की पकड़ वैसी ही हैं जैसी मधुमक्खी की पकड़ शहद पर | और ये शहद जब सुनने वाले के कानो में पड़ता हैं तो अजब सा मिठास भरा जादू घोल देता हैं | तरल आवाज़ के मालिक केके का कंठ किसी भी सांचे में ढल जाता हैं, दर्द में वो तड़प जाता है तो ख़ुशी में चहक जाता हैं | किसी दिन शायद केके कोई भजन गाये तो वो भी उपासना का महाकाव्य बन जायेगा | फिल्म ओम शांति ओम में केके का एक गीत हैं – “आँखों में तेरी अज़ब सी अदाए हैं” | आवाज़ में केके की भी अज़ब सा जादू हैं, दिल को बना दे जो पतंग वो केके के गीत हैं | और हम इन गीतों के संसार में ही आँखे मूंदकर बस खोये रहना चाहते हैं |

— अंकित सोलंकी, उज्जैन (मप्र)

शराब इतनी जरूरी तो नही !


गम में गला गीला हो जरुरी तो नहीं
ख़ुशी में हाथ में प्याला हो जरुरी तो नहीं !

शराब आदत ख़राब हैं, ये जीवन ख़राब ही करेगी
पर ये आदत ही जीने की जरूरत हो जरुरी तो नहीं !

चार दोस्त मिल जाये तो चाय पर भी बात हो सकती हैं
यूँ नशे में बहककर लड़खड़ाना जरुरी तो नहीं !

अरे वो मर्द ही क्या जो होशोहवास में मन की बात न कह सके
दिल हल्का करने के लिए जहर की जरूरत हो जरुरी तो नहीं !

हँसी तो ओकेसनली बोलने वालो पर आती हैं
कोई ओकेज़न हर दूसरे दिन हो जरुरी तो नहीं !

सरकार का काम हैं कमाना, कमाती रहेगी
पर उनकी कमाई के लिए खुद को क़त्ल करना जरुरी तो नहीं !

जरा पूछो उस बेसहारा बच्चें से जिसका बाप कहता था
शराब पीने से लिवर ख़राब ही हो जरुरी तो नहीं !

जरा पूछो उस दुखियारी माँ से जिसके बेटा कहता था
दो पेग लगाकर गाड़ी ना चला सको जरूरी तो नही !

जरा पूछो उस गरीब मज़दूर के परिवार से जो कहता था
देसी दारू पीकर मौत ही हो जाये जरूरी तो नही !

अरे नशा करना ही हैं तो इश्क़-इबादत-मेहनत का करो
यू अनमोल जीवन को मौत को सौपना जरूरी तो नही !

–अंकित सोलंकी, उज्जैन (मप्र)

रंगीला


चाचा नेहरू के जन्मदिन की उस दिन हमें बहुत ख़ुशी थी | ऐसा नहीं था कि हम चाचा नेहरू के कार्यो से बहुत प्रभावित थे, बल्कि उस समय तो हम ठीक से जानते भी नहीं थे कि नेहरूजी का देश के लिए क्या योगदान हैं | हम तो खुश इसलिए थे कि बाल दिवस के उपलक्ष में उस दिन हमें स्कूल की और से बाल-फिल्म दिखाने जाने का कार्यक्रम था | इसके पहले हम केवल एक बार ही सिनेमाघर गए थे और पापा मम्मी के साथ ‘बोल राधा बोल’ फिल्म देखकर आये थे | उम्र छोटी होने के कारण फिल्म तो हमें कुछ ज्यादा समझ नहीं आई थी पर बड़ा सा हाल, बड़ा पर्दा, आरामदायक कुर्सियां और लोगो की भीड़, हमारे लिए वो अनुभव खासा रोमांचक था | वही आनंद फिर से दोहराने का मौका मिलने के कारण हम बहुत खुश थे |

स्कूल वालो ने ठीक सुबह नौ बजे टेम्पू में बैठाकर हम सब बच्चो को स्कूल से ‘निर्मल-सागर’ सिनेमाघर पहुँचा दिया | १२ बजे से थियेटर के नियमित शो प्रारम्भ होते थे इसलिए सुबह ९ से १२ का स्लॉट बच्चो को बाल-फिल्म दिखाने के लिये दिया गया था | उस समय निर्मलसागर सिनेमा शहर की शान हुआ करता था | परदे, साउंड की क्वालिटी अन्य सिनमाघरो से बेहतर थी, कुर्सियां बहुत आरामदायक थी, हॉल के बाहर लॉबी में लाल मखमली गद्दे सोफे लगे हुए थे जिसके आसपास दीवारों पर चमकदार शीशे भी थे | ऐसा लगता था कि सिनेमाघर नहीं किसी महल में आ गए हो | सिनेमाघर के इतना आकर्षक और भव्य होने के बावज़ूद जो चीज़ हम बच्चो के लिए सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बनी हुई  थी वो थे वह उस समय प्रदर्शित होने जा रही फिल्म ‘रंगीला’ के पोस्टर | अलग अलग साइज के ४-५ पोस्टर में आमिर खान, जैकी श्रॉफ के साथ उर्मिला मातोंडकर की तस्वीर थी | अगर आज का समय होता तो बच्चे उस पोस्टर के साथ सेल्फी क्लीक करके फेसबुक पर पोस्ट करते, पर उस समय तो हम चोरीछिपी नज़रो से उन पोस्टर्स को बस निहारे जा रहे थे | हम बच्चो के बीच कुछ बच्चे बहुत ज्ञानवान भी थे, जिन्हे उस फिल्म में क्या खास था और वो फिल्म इतनी चर्चा में क्यों हैं, सब पता था | बस ऐसे ज्ञानवान एक बेक बेंचर्स बच्चे ने अपने ज्ञान का पिटारा खोलकर हमें बता दिया कि इस फिल्म में हीरोइन का लुक बहुत बोल्ड एंड हॉट हैं। इसके बाद तो अब उन पोस्टर्स को हम और भी कोतुहल से देखने लग गए थे |

खैर उर्मिला मातोंडकर की पोस्टर्स में उपस्थिति को नज़रअंदाज करते हुए थोड़ी देर बाद हम वो बाल-फिल्म देखने लग गए | फिल्म विको-वज्रदंती के विज्ञापन से प्रारम्भ हुई और हम बच्चो ने खूब तालियाँ बजाई | वो बाल-फिल्म कुछ खास तो नहीं थी पर सब बच्चो को बहुत मज़ा रहा था | वैसे भी उस उम्र में कहाँ कोई फिल्म की कहानी, अभिनय और गुणवत्ता का आकलन करता हैं, हम बच्चो के लिए तो फिल्म में थोड़ा एक्शन हो, कॉमेडी हो, बस हो गया काम | फिल्म के बीच में थोड़ी देर का इंटरवल दिया गया और कुछ बच्चे वाशरूम का प्रयोग करने बाहर जाने लगे | हमें उस समय बाथरूम जाने की कोई जरूरत नहीं महसूस हुई तो हम अपनी कुर्सी पर ही बैठे रहे | इंटरवल का समय पास करने के लिए फिर से विको वज्रदंती के विज्ञापन लगा दिए गए और हम उसे भी चाव से देखने लगे | विको-वज्रदंती के विज्ञापन के बाद कुछ ऐसी घटना हुई जो अगर ना होती तो उस घटना के कोई पच्चीस बरस बाद हम ये कहानी नहीं लिखते, पर इस कहानी की शुरुआत इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकती थी |

थियेटर में काम करने वाले कर्मचारी को निर्देश थे कि वो इंटरवल में फिल्म के ट्रेलर दिखाए और उसने अपने निर्देशानुसार उस बाल-फिल्म के इंटरवल में भी आने वाली नई फिल्म रंगीला का ट्रेलर लगा दिया | याइ रे – याइ रे के गीत पर थिरकती हुई उर्मिला मातोंडकर के डांस स्टेप से जब वो ट्रेलर शुरू हुआ तो हमारी आखे पलके झपकाना भूल चूकी थी | लगभग पाँच मिनट के उस ट्रेलर में हमें उस हरामी बेक बेंचर की बताई सभी बाते सही मालूम हुई पर वो हमारा बैकबेंचर दोस्त दुर्भाग्य से बाथरूम करने बाहर गया था और इस ट्रेलर के आनंद से वंचित रह गया | ट्रेलर के बीच में तालियों-सीटियों की भी बहुत आवाजे आ रही थी और हमें समझ आ गया कि हमारे स्कूल के बच्चे अब बड़े हो चुके हैं | हमने भी मौके का मज़ा लेते हुए ट्रेलर ख़तम होने पर खूब तालियाँ बजाई पर फिर हमें याद आया की हमारे पीछे तो स्कूल के सबसे खड़ूस सर बैठे हुए हैं |  ये बात याद आते ही हमने उन सर की और देखा कि कही वो हमें देख तो नहीं रहे हैं | पर स्वभाव के विपरीत वो सर भी आज मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे | उस बेक बेंचर दोस्त के आने पर हमने वो ट्रेलर वाली बात उसे बताई और उसे इतना दुःख हुआ जैसे उसने लॉटरी मिस कर दी हो | उस दोस्त को जो भी हाल हो, पर हमने मन ही मन अपनी दोनों किडनियों को धन्यवाद किया कि ऐसे अहम् मौके पर उन्होंने बाथरूम पर कमाल का नियंत्रण बनाये रखा |

निर्मल सागर से निर्मल आनंद की प्राप्ति के बाद हम घर तो आ गए पर अब हमारा मन दो काम के लिए बहुत तड़प रहा था । पहला वो विको वज्रदंती के विज्ञापन में हमने अखरोट तोड़ते हुए देखा था और जीवन मे पहली बार हमें पता चला था कि अखरोट नामक कोई ड्राई फ्रूट होता हैं । अब हमारा मन अखरोट खाना चाहता था । दूसरा रंगीला का ट्रेलर देखने के बाद अब हमें ये फ़िल्म टॉकीज़ में देखना थी । पर ये दोनों ही चाहते असंभव थी, घर की हालत ऐसी थी कि काजू बादाम ही कभी कभार खाने को मिलते थे तो ऐसे में हम कैसे पापा मम्मी को कहते कि हमे अखरोट खाना है । और दूसरी अगर हम पापा-मम्मी को कहते कि हमे रंगीला फ़िल्म देखना हैं तो पापा के जूते और मम्मी की झाड़ू के द्वारा हमारी आरती उतरना तय था । ऐसे में हम अपना मन मसोस कर रह गए ।

उस समय हमारा घर अंकपात रोड पर एक गुआड़ी में हुआ करता था । गुआड़ी मालवी में चॉलनुमा घरो को कहते हैं जहा बीच में गाय-भैस के बांधने की भी व्यवस्था हो । उस गुआड़ी में भी बीच मे आंगन था जहाँ हमारे मकान मालिक की गाय-भैसे बंधती थी और आंगन के चारो और कमरे बने हुए थे जिनमें 5 परिवार किराये से रहते थे । हर परिवार को 2 कमरे किराये से दिए गए थे । आंगन के एक कोने में कुआ था और वही पर सबके लिए कॉमन लेट्रिन-बाथरूम की व्यवस्था थी । आजकल के वातानुकूलित अटेच लेट-बाथ बैडरूम, किचन एंड ड्रॉइंग रूम वाले घरो के सामने वो बहुत असुविधाजनक व्यवस्था थी पर उस समय साधन कम थे और संतोष ज्यादा था । सारे परिवार उस गुआड़ी में तमाम असुविधा के बावजूद बहुत सुख, संतोष और आनंद से रह रहे थे ।

 वैसे संतोष से याद आया कि उस गुआड़ी में एक संतोस भैया रहते थे जो हमसे पांच साल बड़े थे । वो उसी साल वहाँ रहने आये थे और अकेले ही रहते थे । उनकी बोर्ड की परीक्षा थी तो उस साल उनके पापा ने गांव से उन्हें शहर पढ़ने भेजा था । अपना खाना वो खुद ही बनाते थे । इन संतोस भैया से हमारी बहुत पटती थी । हम दोनों को क्रिकेट का बहुत शौक था, हम वहाँ गुआड़ी के आंगन में साथ मे बहुत क्रिकेट खेलते थे । बहुत बार हम मकान मालिक के घर टीवी में साथ मे क्रिकेट मैच देखते और क्रिकेट ज्ञान पर बहुत बाते भी करते । हम दोनों को ही सनी देओल बहुत पसंद था । उन्होंने तो सनी देओल की बहुत सारी पिक्चरें थियेटर में भी देखी थी तो वो कई सारी फिल्मों की कहानियां और डायलॉग हमे सुनाते । ‘बलवंत रॉय के कुत्ते’ और ‘ढाई किलो के हाथ’ उनका तकिया कलाम था जो वो अक्सर किसी भी बातचीत में बोला करते थे । संतोस भैया के रिश्तेदार की उस समय एक वाचनालय कम लाइब्रेरी भी हुआ करती थी, जहाँ से वो चम्पक-चंदा मामा-चाचा चौधरी जैसी किताबे लेकर आ जाते थे जो हमे भी मुफ्त में पढ़ने को मिल जाती थी । इन संतोस भैया के पास एक सायकल भी थी जिससे वो कभी कभी हमारी मम्मी और वहाँ रह रहे दूसरे परिवारों के बाजार के छोटे-मोटे काम भी कर देते थे । अपनी साईकल भी कभी किसी को जरूरत होती तो दे देते थे । इस मदद के बदले में कभी कभी उनको रात का खाना किसी परिवार की और से मिल जाता था । हर शनिवार को वो गेबी-हनुमान के मंदिर जाते थे और कभी कभी हमारी मम्मी हमे भी उनके साथ मंदिर भेज देती थी । वो हमको सायकिल पर बैठाकर गोपाल मंदिर, ढाबा रोड घुमाते हुए मंदिर ले जाते । उनके साथ घूमने का एक अलग ही आनंद था ।

वैसे संतोस भैया हमको एक दूसरे कारण से भी बहुत पसंद करते थे । उस समय उस गुआड़ी के सामने एक संतोस दीदी भी रहती थी जो हमे बचपन मे ट्यूशन पढ़ाती थी । वो संतोस दीदी को बॉलीवुड गानों का बहुत शौक था और उनके घर पर बड़ा सा स्पीकर बक्सा था, जिस पर वो तेज़ आवाज़ में गाने चलाती थी । उनके गानों की आवाज़ गुआड़ी के आंगन में साफ सुनाई देती थी । इन संतोस दीदी को बार-बार कैसेट में गाने भरवाने होते थे और हमने इस काम के लिए उनकी पहचान संतोस भैया से करवा दी थी । संतोस भैया उनके गानों को नई सड़क स्थित झंकार म्यूज़िक पॉइंट से भरवा लाते थे । एक बार हमने संतोस भैया के कमरे में एक लेटर देखा था जो उन्होंने संतोस दीदी के लिए लिखा था । पत्र में पहली पंक्ति कुछ ऐसी लिखी थी – ‘कल आंगन में खेलते समय तुम्हारे स्पीकर पर “बस एक सनम चाहिए आशिकी के लिए” गीत सुना । तुम्हारे गानो का चयन बहुत अच्छा हैं ।जाने क्यों ये गीत सुनते समय तुम्हारी याद आ गई ।’ लेटर में ये पंक्ति ही पढ़ी थी कि संतोस भैया ने वो लेटर हमारे हाथ से ले लिया । हम छोटे जरूर थे पर इतना समझ चुके थे कि संतोस भैया की कैसेट संतोस दीदी पर उलझ चुकी थी ।

एक दिन हम सुबह सुबह संतोस भैया के रूम में पहुचे तो वो “दैनिक अवंतिका” अखबार पढ़ रहे थे । दैनिक अवंतिका उज्जैन शहर का एक लोकल अखबार था जो उस समय शुरू ही हुआ था । इस अखबार की खासियत ये थी कि इसमें लोकल खबरे सारी मिल जाती थी और एक पूरा पन्ना केवल थियेटर में लगी फिल्मो के विज्ञापन का होता था । संतोस भैया अक्सर ये पेपर लाइब्रेरी से पढ़ने के लिए लाते थे । उस दिन हमने भी वो अखबार पूरा पढ़ा । अखबार में जब हमने रंगीला का पोस्टर देखा तो हमे अपनी फिल्म देखने की इच्छा याद आ गई । पोस्टर के नीचे लिखा था – “दर्शको की अपार भीड़, रोज़ाना 4 खेल 12-3-6-9, निर्मलसागर में अंतिम 5 दिन” । हमारे पास अब रंगीला देखने के लिए सिर्फ 5 दिन ही बचे थे । उसी समय हमारे दिमाग मे ये आईडिया आया कि क्यों ना संतोस भैया के साथ रंगीला देखकर आया जाए । संतोस भैया की इमेज हमारी मम्मी के सामने बहुत अच्छी बनी थी तो उम्मीद थी कि मम्मी भी परमिशन दे देगी ।

संतोस भैया के साथ रंगीला देखने जाने के प्लान को साकार करते हुए हमने संतोस भैया को पूछा कि चलो भैय्या कोई पिक्चर देखकर आते है । संतोस भैया को भी ये प्लान पसंद आया और उन्होंने पूछा कि कौन सी फ़िल्म देखना हैं । हमने कहा निर्मल सागर में चलते है, पास में भी है और टाल्कीस भी बहुत अच्छा हैं | हमने कहा नही पर संतोष भैया समझ गए कि हमको रंगीला फ़िल्म देखना हैं । उन्होंने बात को ना खींचते हुए निर्मल सागर में फ़िल्म देखने पर सहमति दे दी । पर अब हम दौनो के सामने 2 मुश्किलें थी । पहली संतोस भैया के पास फ़िल्म देखने के लिए एक्स्ट्रा पैसे नही थे । दूसरी हमको फ़िल्म देखने के लिए मम्मी से पैसे और परमिशन दौनो लेना था । पहली समस्या का समाधान हमने संतोस भैया को सुझाया कि वो संतोस दीदी ने कैसेट भरवाने के लिए जो पैसे दिए हैं उससे फ़िल्म देख आते हैं और संतोस दीदी को बोल देते हैं कि वो दुकानदार कही बाहर गया हुआ है तो कैसेट थोडे दिन बाद मिलेगी । 4-5 दिन में संतोस भैया के पापा आने वाले थे तो तब उनके पास पैसे भी आ जाते तो उसके बाद कैसेट भरवा कर दे देगें ।संतोस भैया ने ये सुझाव मान लिया और इस तरह उनकी टिकिट का इन्तज़ाम संतोस दीदी के दिये हुए पैसों से हो गया ।

संतोस भैया से बात करके हम घर आ गए और हमको अब मम्मी से अपनी टिकिट के पैसे और परमिशन दोनों लेना था । घर आकर हमने मम्मी को कहा कि वो संतोस भैया एक बहुत अच्छी बच्चों की पिक्चर देखने जा रहे हैं और हमको भी उनके साथ जाना हैं । मम्मी ने टिपिकल माँ-बाप का रोल निभाते हुए उसी समय फ़िल्म देखने जाने के लिए मना कर दिया। हम जानते थे ये इतना आसानी से नहीं होगा इसलिए थोड़ी देर बाद हमने मम्मी से फिर से पूछा और ये भी कह दिया कि फ़िल्म बहुत अच्छी है और उसमें कुछ कम्प्यूटर का भी प्रयोग दिखाया हैं। उस समय पेरेंट्स अपने बच्चों को अंग्रेजी भाषा और कम्प्यूटर सिखाने को लेकर पागल थे इसलिए हमने ये झूठ  बोला । इस बार मम्मी ने उतना सख्त रवैया नही रखा पर हमको टरकाने के लिए बोल दिया कि पापा से पुछूगी । शाम को मम्मी ने पापा से पूछा पर पापा ने भी सख्त रवैया अपनाते हुए मना कर दिए । अगले दिन हमने मम्मी के सामने जिद पकड़ ली कि हमको फ़िल्म देखने जाना ही हैं । इस बार हमने मम्मी को कहा कि ये फ़िल्म हमको देखना है, हमारी क्लास के दोस्त सब अपने मम्मी पापा के साथ देख आये और इस फ़िल्म के बारे में बाते करते हैं, केवल हम ही हैं जिसने नही देखी और हमको ऐसी बातचीत में चुपचाप खड़े रहना पड़ता हैं । सब बच्चों के मम्मी पापा उनको घुमाते है, बाहर खाना खिलाते हैं, फ़िल्म भी दिखाते हैं, केवल हम ही है जो कही नही जाते । हमकों पता हैं हमारी हालत ऐसी नही कि इतने शौक पूरे करे पर एक फ़िल्म तो दिखा ही सकते है । हमारी इस बात पर मम्मी इमोशनल हो गई और उन्होंने कहा कि फिल्म देखने चले जाना, मैं पापा से बात कर लूंगी। हम मम्मी की बात से खुश हो गए। हालांकि पापा कोई हां अभी बाकी थी।

रात को मम्मी ने पापा से हमारे फिल्म देखने वाली बात फिर से छेड़ी । पापा ने हर बार की तरह फिर से मना कर दिया। पर इस बार मम्मी ने पापा से बात हमारी मम्मी बन कर नहीं बल्कि पापा की धर्मपत्नी बनकर की। मम्मी ने कहा कि बेटा पहली बार कुछ कह रहा है इसलिए इसकी बात मान लेते हैं । वैसे भी वह कहां कोई जिद करता है, पढ़ाई भी अच्छी करता है, स्कूल भी जाता है, अच्छे नंबर भी ले कर आता है और हमारी हर बात मानता भी हैं । इसलिए उसकी यह इच्छा हमें पूरी करनी चाहिए। पर पापा फिर भी राजी नहीं हुए। अब मम्मी पूरी तरह पत्नी वाले फॉर्म में आ चुकी थी। उन्होंने पापा से अबकी बार जोर देकर कहा कि बेटा एक बार कोई जिद कर रहा है तो उसे पूरी करनी चाहिए वैसे भी हम कहां उसे कुछ करने देते हैं। इसके साथ ही मम्मी ने अपना पत्नी-पुराण शुरू करते हुए कहा कि मेरी कोई इच्छा पूरी नहीं करते कोई बात नहीं पर बच्चे की इच्छा तो पूरी करो | पुरे सात साल में मुझे केवल एक बार ही फिल्म दिखाने लेकर गए हो, वो भी पांच साल पहले “प्यार झुकता नहीं”, उसके बाद से कभी कोई पिक्चर दिखाने के लिए झुके ही नहीं |  मेरा क्या हैं, मैं तो मन मार लेती हूँ, कुछ नहीं कहती पर इन बच्चो के तो कोई शौक पूरे करो, अच्छे स्कूल जाता हैं, अच्छे लोगो के बच्चो के साथ पढ़ता हैं, वहा उसको कैसा लगता होगा | पापा अब समझ चुके थे कि अगर उन्होंने अब इस मेटर को और खींचा तो उनके अपराध अतीत के परतो से निकल-निकल कर सामने आएंगे और चार-पांच दिन तक वो घर में सुकून से सांस भी नहीं ले पाएंगे | इसलिए उन्होंने चतुर पति की तरह हमको फिल्म देखने के लिए परमिशन दी और अपना मानसिक स्वास्थ्य बेहतर बनाये रखा |

तो इस तरह से संतोस भैया के साथ फिल्म देखने जाने की जुगाड़ बैठाने, उनके टिकिट के पैसो का इंतज़ाम करना और मम्मी-पापा से परमिशन लेना जैसी तमाम बाधाओ को पार करते हुए हम अगले दिन रंगीला फिल्म देखने निकले |  जाने-अनजाने में किये गए इस काम को करते समय हमें ये ज्ञान बिलकुल नहीं था कि भारतीय परिवेश में ये जुगाड़-तुगाड़ का ज्ञान न्यूटन लॉ ऑफ मोशन से ज्यादा काम में आता हैं, और आज हमने इस ज्ञान को अर्जित करने में पहला कदम उठाया था जो कि भविष्य में बहुत काम आने वाला था |  निर्मल सागर जाते हुए हमने संतोस भैया को एक और जुगाड़ बैठाते हुए कहा कि साइकिल वो उनके पहचान के वाचनालय पर रख देते हैं ताकि पार्किंग के पैसे भी बच सके और उससे हम इंटरवल में समोसा खा सके | संतोस भैय्या हमारे सुझाव से प्रभावित हुए और इस तरह हमारे समोसे का भी इंतेज़ाम हो गया |

टॉकीज उस दिन हाउसफुल था और पूरे पंद्रह मिनट लाइन में लगकर हमको ड्रेस सर्कल क्लास का टिकिट मिला | इन पंद्रह मिनट में हम पूरे समय चोरी नज़रो से फिल्म के पोस्टर को निहारे जा रहे थे | विको वज्रदंती के विज्ञापन के बाद सीटियों और तालियो की गड़गड़ाहट से फिल्म शुरू हुई और हमारे जीवन का पहला सपना पूरा हुआ | फिल्म के बारे में जो ज्ञान हमें हमारे बेक-बेंचर दोस्त ने दिया था, फिल्म बिलकुल वैसी ही थी | फिल्म में उर्मिला मातोंडकर का लुक बहुत ग्लैमरस और बोल्ड था और उसको इतने बड़े परदे पर देखने का अनुभव बहुत ही रोमांचक था | घर पर तो कुछ ऐसा वैसा आ जाता था तो टीवी बंद हो जाती थी या इधर-उधर होना पड़ता था पर यहाँ तो दोनो आँखे खोलकर सब देखो | इतने अँधेरे में कोई हमें नहीं देख रहा और हम भी किसी को नहीं देख रहे | उस दिन फिल्म देखते हुए हमें बहुत अलग लग रहा था, कुछ अलग ही फीलिंग हो रही थी, जैसा पहले कभी नहीं हुआ | हमें नहीं पता था इसे आकर्षण कहे या कामुकता, पर वो बहुत अलग आनंद था | कोई नया खिलौना या अच्छा खाना देखकर हम खुश तो बहुत हुए पर ये नहीं लगा जो आज लग रहा था | ऐसी विचित्र परन्तु मजे वाली फीलिंग हमको आखिरी बार आइसक्रीम खाने पर आई थी, जब हमने इतनी ठंडी, मीठी और मुँह में घुलने वाली चीज़ पहली बार बार खाई थी | मुँह ठण्ड के मारे सिकुड़ा जा रहा था, दांत किटकिटा रहे थे पर फिर भी मजा आ रहा था | हमारा दिल उस पल उर्मिला मातोंडकर को देखकर जोर से धड़के जा रहा था, साँसे तेज़ हो रही थी पर फिर भी हमको अच्छा लग रहा था |

वैसे फिल्म का जुगाड़ हमने उर्मिला मातोंडकर के आकर्षण में बंधकर बैठाया था पर फिल्मे में हमें आमिर खान के रंग बिरँगे शर्ट और जैकी श्रॉफ के स्टाइलिश गॉगल भी बहुत अच्छे लगे | फिल्म में एक प्रेम कहानी थी और क्लाइमेक्स तक आते-आते हम भी आमिर खान की तरह बहुत इमोशनल हो गए थे | फिल्म के अंत में तो हमें हीरो-हीरोइन का प्यार देखकर ऑंसू भी आने लगे थे | बाहरी आकर्षण में बंधकर फिल्म देखने आये थे पर फिल्म हमें प्यार की परिभाषा भी सीखा गई | अब हम समझ सकते थे कि संतोष भैया ने वो लेटर संतोस दीदी को क्यों लिखा होगा | फिल्म देखने के बाद हमने भी निश्चय किया कि जीवन में कुछ करे या ना करे, इस तरह किसी लड़की से सच्चा प्यार जरूर करेंगे | तो इस तरह से प्रेम और आकर्षण की फीलिंग को आत्मसात करते हुए हम निर्मल सागर से जब विदा हुए तो हमारे मन में एक ही गाना गुनगुनाये जा रहा था – तनहा-तनहा यहाँ पर जीना ये कोई बात हैं |

वैसे जब हम निर्मलसागर में बैठकर प्रेम कहानी के निर्मल आनंद ले रहे थे उस समय एक ऐसी घटना हुई जिसने हमारी लाइफ में एक्शन की पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी | संतोस भैया के पापा उस दिन कुछ काम से शहर आये थे और वो वाचनालय वाले रिश्तेदार से मिलने चले गए | वाचनालय वाले रिश्तेदार ने रिश्तेदारी का प्रथम कर्तव्य निभाते हुए संतोस भईया की चुगली उनके पापा से कर दी | उन्होंने उनके पापा से कहा कि ये लड़का तो कोई पढाई नहीं कर रहा, यहाँ बस मजे कर रहा हैं | रोज मेरे वाचनालय पर आ जाता हैं और टाइम-पास करता रहता हैं, देखो ये फिल्मो के विज्ञापन वाला पेपर घंटो पढ़ा करता हैं | और कोर्स की किताबे छोड़कर ऐसी किताबे पढ़ने घर ले जाता हैं | ये बोलते हुए उन्होंने हाथो से इशारा करके ‘मनोहर कहानियाँ ‘ और ‘फिल्मफेयर’ मैगज़ीन दिखा दी | रिश्तेदार ने पापा को यह भी कहा कि आपका लड़का हर २-४ रोज में फ़िल्मी गानो की लिस्ट लेकर आता हैं और कैसेट भरवाने ले जाता हैं | और अंत में उन्होंने ये भी बता दिया कि संतोस भैया अभी सब काम छोड़कर फिल्म देखने गए हैं | अपनी और से उन्होंने पापा को समझाइश भी दे दी कि इस लड़के को तो गाँव ले जाओ, यहाँ शहर में तो ये रंगरलिया मनाने आया हैं | सांतोस भैया के पापा जरा पुराने विचारो वाले और सख्त मिजाज के थे, फिल्म देखना वो अच्छा नहीं मानते थे | रिश्तेदार की बात सुनकर वो आग-बबूला हो गए और गुआडी में चले गए, वहाँ वो आँगन में बैठकर संतोस भैया का इंतज़ार करने लगे |

फिल्म देखने के बाद जैसे ही हम घर पहुंचे, संतोस भैय्या के पापा बाहर आँगन में ही खड़े मिल गए | उनके हाथो में नीम के पेड़ की एक टहनी भी थी | उन्होंने संतोस भैया से पूछा कि कहाँ से आ रहे हो | संतोस भैया बोले कि वो वाचनालय गए थे कुछ किताब पढ़ने | संतोस भैय्या ने अपना जवाब खत्म भी नहीं किया था कि नीम के पेड़ की टहनी की डिजाइन उनके शरीर पर छप चुकी थी | जैसे ही संतोस भइया के पापा ने उनको मारा हम संतोस भइया के पास से भाग गए | झूठ सुनने के बाद संतोस भैया के पापा का गुस्सा सातवे आसमान पर था और वो एक के बाद एक चार बार संतोस भैया को लकड़ी से मार चुके थे और बोलते जा रहे थे कि शहर आकर झूठ बोलना भी सीख गया हैं, यहाँ मटरगश्ती के लिए भेजा हैं या पढ़ने के लिए भेजा हैं | अब संतोस भैय्या को लगातार जूते पड़ते जा रहे थे और हम आँगन में देख रहे थे कि हमारी मम्मी तो वहाँ नहीं हैं | इधर-उधर देखने पर हमने मम्मी को आँगन के कोने में बाथरूम के पास कपडे धोते हुए देखा | अच्छी बात ये थी कि मम्मी की पीठ हम लोगो की तरफ थी और उन्हें हमारी आवाज़ भी नहीं सुनाई दे रही थी | हमको डर था कि हमारी पोल भी ना खुल जाये इसलिए हम डेमेज कंट्रोल के मोड में तुरंत मम्मी की और भागे और उनसे बाते करने लगे ताकि मम्मी मुड़े नहीं और हम बच जाये | हमने मम्मी के पास जाकर उनको बातो में लगा दिया और पानी का नल भी चालू कर दिया ताकि संतोस भैया की सुताई मम्मी ना देख ले |

इस तरह से हमने बातो में लगाकर मम्मी के मोर्चे पर तो बात सम्भाल ली पर पापा के मोर्चे पर उस दिन हमारी किस्मत भी संतोष भैय्या जैसी ही थी | जब संतोस भैया के पापा अमरीश पूरी बनकर उनको कुत्ते की तरह पीट रहे थे, हमारे पापा भी किसी काम से घर आ गए | अब हमको काटो तो खून नहीं था, पापा के पास जाकर बात सँभालने का हमारे पास कोई चारा ना था, और डर अलग था कि हमारी पोल भी खुल गई तो संतोस भैया की तरह हमारी ठुकाई भी चालू हो जाएगी | हमारे पापा ने संतोस भैय्या के पापा को रोकने का प्रयास किया कि ऐसे कोई बच्चे को मारता हैं क्या |  इस पर संतोस भैया के पापा ने वाचनालय वाले रिश्तेदार की पूरी बात हमारे पापा को बता दी कि संतोस भैया वाचनालय से लाकर गन्दी किताबे पढ़ते हैं, मटरगश्ती करते हैं और आये दिन फिल्मे देखने जाते हैं | अभी भी वो टाकीज में रंगरलिया देखने गए थे और पूछने पर उन्होंने झूठ बोला कि वाचनालय में पढ़ने गए थे |  इतना बोलने के बाद संतोस भैया के पापा उनको मारते हुए कमरे के अंदर ले गए | उसके बाद बंद कमरे में संतोस भैया के साथ क्या हुआ हमको नहीं मालूम पर अब हमें अपनी चिंता सता रही थी |

उस समय हमने सोचा कि अभी पापा के सामने जाना मतलब मुसीबत को दावत देना हैं। इसलिए हम तुरंत बाहर गली में खेलने चले गए और शाम को लौटे। शाम को हम घर पहुंचे तो घर का माहौल सामान्य पाया।  मम्मी खाना बना रही थी और पापा हमारे छोटे भाई को खिला रहे थे। हमने किसी से कुछ नहीं बोला और तुरंत अपनी कोर्स की किताबे उठाकर पढ़ने बैठ गए। रात को खाना भी खाया तो सब कुछ ठीक था, ना मम्मी ने हमसे कुछ पूछा या कहा और ना पापा ने। हमने माहौल समझने के लिए पापा-मम्मी से एक-दो बार बात भी करने की कोशिश की पर उन्होंने फिल्म का कुछ नहीं पूछा और हमें वो नार्मल ही लगे।  हम समझ गए कि पापा-मम्मी को पता नहीं चला हैं कि हम बाल-फिल्म का झूठ बोलकर संतोस भैय्या के साथ रंगीला देखकर आये हैं।  पापा समझ गए होंगे कि संतोस भैय्या के पापा गाँव के हैं और पुराने ख्यालात के हैं, वो इस तरह टाल्कीस में फिल्म देखना अच्छा नहीं समझते होंगे इसलिए उनके पापा ने उनको बहुत मारा। अब हमारा डर ख़तम हो गया और हम निश्चिंत होकर रात में सोने चले गए।

हम सोने के लिए लेट तो गए पर उस रात हमें नींद नहीं आ रही थी।  हमारी नींद तो उर्मिला मातोंडकर और उनकी रंगीला फिल्म ने चुरा ली थी।  बार-बार हमें फिल्म के दृश्य और गीत याद आ रहे थे, खासकर समंदर किनारे किया डांस और याई-रे वाला गीत तो हमारी आखो के सामने ही घूम रहा थ। उस समय हम सोच रहे थे कि काश हमारे पास ऐसा कुछ जुगाड़ होता कि हम जब चाहे तब वो फिल्म देख सकते और उसके गीत सुन सकते।  ये सोचते हुए हमने सोचा नहीं था कि आने वाले सालो में हमारी ये इच्छा मोबाइल के रूप में पूरी होने वाली थी। रंगीला के बीच-बीच में हमें संतोस भइया का भी ख्याल आ जाता था और उन पर दया और हंसी दोनो आ रही थी।  वो बेचारे हमारे चक्कर में बेकार ही पीट गए। 

रंगीला और संतोस भैय्या के ख्यालो के बीच लेटे हुए उस रात हमने मम्मी और पापा के बीच की बातचीत सुनी, जो वो लोग सोने से पहले कर रहे थे।  पापा मम्मी पर बहुत गुस्सा करते हुए पूछ रहे थे कि तुमको पता हैं संतोस इसको कौन सी फिल्म दिखाने ले गया था।  मम्मी ने बताया कि वो कोई बच्चो की पिक्चर देखने गया था।  पापा ने बोला फिर संतोस के पापा ने उसको इतना क्यों पीटा।  मम्मी तो कुछ जानती नहीं थी तो चुप रही।  थोड़ी देर बाद पापा ही बोले कि वो संतोस इसको बच्चो की पिक्चर नहीं, कोई और पिक्चर दिखाने ले गया था, वो वाचनालय वाले रिश्तेदार ने संतोस के पापा को सब बताया फिल्म के बारे में और कहा कि संतोस टाकीज में रंगरलिया देखने गया था। तुम थोड़ा ध्यान रखा करो जब बच्चे को ऐसे किसी के साथ बाहर भेजो। इस पर मम्मी ने कहा कि वो तो बोल रहा था कोई बच्चो की शिक्षाप्रद  पिक्चर हैं और उसमे कम्प्यूटर का भी प्रयोग हैं। पापा इस बात पर बहुत गुस्सा होते हुए बोले कि अरे अनपढ़ कोई कम्प्यूटर का प्रयोग नहीं रहता ऐसी पिक्चरों में, देखा नहीं कैसे पोस्टर लगे हैं इस फिल्म के पुरे शहर में, उसमे कही कम्प्यूटर दिखा क्या तुमको। इस पर मम्मी ने कहा कि मैं क्या जानु, तुम मुझे शहर घुमाने ही कब ले जाते हो।  पापा बोले शहर नहीं घूमी तो पीछे वाली गली में तो गई हो, वहाँ पर ही इस फिल्म का पोस्टर लगा हैं। अंत में पापा ने मम्मी को सख्त हिदायत दी कि बच्चा छोटा हैं, उसको उस संतोस के साथ मत खेलने देना, पता नहीं हमारे बच्चे को क्या गन्दी-गन्दी बाते सिखाता होगा वो।  पापा ने फिल्म का सारा दोष भी संतोस भैय्या पर डालते हुए कहा कि अपना बच्चा तो अभी छोटा हैं, ये संतोस ही उसको बाल फिल्म बोलकर ऐसी फिल्म दिखा लाया होगा। 

पापा-मम्मी की ऐसी बातचीत हम आँखे मूंदे सुन रहे थे और हम सोच रहे थे हमारे मम्मी-पापा हमको बहुत अंडर एस्टीमेट कर गए।  ये रंगीला देखने का सारा प्लान हमारा बनाया था और ये लोग दोष बेचारे संतोस भैय्या को दे रहे हैं।  वैसे हमारे लिए अच्छा ही था की वो हमें अभी भी छोटा बच्चा ही मानते हैं, हम अपनी मासूमियत के कारण आज बच गए। वो हमें मासूम समझ रहे थे जबकि मासूम तो मम्मी-पापा थे, एक तो गलती उनको पूरी संतोस भैया की लग रही थी, दूसरा फिल्म का नाम भी उन्हें ठीक से नहीं पता, पापा रंगीला की जगह रंगरलिया बोल रहे थे और मम्मी ने तो बाजार में फिल्म के पोस्टर भी नहीं देखे। बेचारे मम्मी-पापा दोनो दिन भर तो हमारी परवरिश और घर चलाने में लगे रहते हैं, उन्हें क्या पता बाहरी दुनिया में क्या चल रहा हैं। ‘जान बची सो लाखो पाए’ की तर्ज पर जब उस दिन हम सोये तो हमारे मन में विभिन्न प्रकार की फीलिंग थी।  संतोस भैया पर दया आ रही थी, खुद पर पछतावा हो रहा था कि मम्मी पापा से झुठ बोला, मम्मी-पापा के लिए तो प्यार और सम्मान बहुत बढ़ गया था और रंगीला के बारे में सोचकर तो हम भी नहीं जानते कि कौन सी फीलिंग आ रही थी। 

अगले दिन सुबह जब हम उठे तो हमें सबसे पहले संतोस भैय्या का ध्यान आया।  हमको लगा सबसे पहले उन बेचारे के हालचाल पूछना चाहिए। मम्मी-पापा से नज़रे बचाते हुए हम संतोस भैय्या के रूम में चले गए।  संतोस भैय्या उस समय नहाने के लिए बाथरूम गए हुए थे पर उनका रूम खुला था और वहाँ उस दिन का दैनिक अवंतिका पेपर रखा हुआ था।  हम पेपर पढ़कर उनका इंतज़ार करने लगे।  दैनिक अवंतिका में फिर से फिल्मो के विज्ञापन वाले पृष्ठ पर रंगीला का पोस्टर दिखा, आज उस पर लिखा था कि निर्मल सागर में अंतिम दो दिन। हम खुश हुए कि हमने समय के पहले ही अपना काम पूरा कर लिया।  यकीन मानिये वो ज़िन्दगी का एकमात्र प्रोजेक्ट था जो डेड लाइन से पहले ख़त्म हुआ था।  रंगीला के ही नीचे उस दिन एक और फिल्म का विज्ञापन आया था। फिल्म का पोस्टर ऐसा था कि हमारी आँखे फटी के फटी रह गई, पोस्टर के नीचे लिखा था – ‘मचलती जवानी की मदमस्त कहानी…..रंगरलिया’, मोहन टाकीज में रोजाना चार खेल ३-६-९-१२।  पोस्टर के एक कोने में “A” भी मेंशन था। इस फिल्म का नाम था ‘रंगरलिया’। हम ये विज्ञापन देखकर तुरंत पीछे की गली में गए और देखकर आये कि वहाँ कौन सा पोस्टर लगा हैं।  पीछे वाली गली में सार्वजनिक पेशाबघर पर रंगरलिया का पोस्टर ही लगा था।  रंगीला का पोस्टर तो पूरी गली में कही भी नहीं था। अब हमें समझ आया कि संतोस भैय्या के पापा बार-बार बोल रहे थे कि टाकीज में रंगरलिया देखकर आया हैं, इससे हमारे पापा को लग गया कि हम रंगीला नहीं रंगरलिया फिल्म देखकर आये हैं। अभी हम यह भी समझ चुके थे कि ये रंगरलिया कुछ अलग ही केटेगरी की फिल्म हैं इसीलिए पापा हमारे फिल्म देखने को लेकर मम्मी पर इतना नाराज़ हुए। हमारे बेक-बेंचर दोस्त ने हमको एक बार बोला भी था कि उसको निर्मल सागर में नहीं बल्कि मोहन टाकीज में पिक्चर देखने में ज्यादा मज़ा आता हैं।  अब हमें समझ आया कि उसको मोहन टाकीज में ही क्यों मज़ा आता हैं। उस पल हमें लगा कि हम अभी भी बच्चे ही हैं, दुनिया रंगरलिया तक पहुँच चुकी थी और हम अभी तक रंगीला पर ही हैं। अभी पापा ने जो भी समझ लिया उसका क्या किया जा सकता था तो हम फिर से संतोस भैय्या के रूम में आ गए और फिल्मो के विज्ञापन वाला पेज देखने लग गए। 

अब हमारी नज़रे रंगरलिया के विज्ञापन से हटने को तैयार नहीं थी। संतोस भैय्या को आने में दस मिनट लगे और इन दस मिनटों में हमने रंगरलिया फिल्म के विज्ञापन को बीस बार देखा और पढ़ा था। फिल्म के पोस्टर से वैसे हमें समझ में आ गया था कि फिल्म में क्या देखने को मिलेगा पर विज्ञापन के अंत में लिखा था ‘केवल वयस्कों के लिए’।  हमें ये वयस्क शब्द का मतलब पता नहीं था। हम इस शब्द का मतलब सोच ही रहे थे कि संतोस भैय्या रूम में आ गए।  उनके आते ही हमने उनसे पूछा कि भैया ये वयस्क का क्या मतलब होता हैं ? संतोस भैया ने पेपर में फिल्मो के विज्ञापन वाला पेज खुला देखा और उसके सामने हमें बैठा देखा तो उन्हें समझ में आ गया कि हम उनसे ये सवाल क्यों पूछ रहे हैं। वो तुरंत हमारे पास आये, गुस्से से हमारा कान मरोड़ा और रूम के बाहर करते हुए बोले कि तेरे रंगीला देखने के चक्कर में कल हमारे बाप बलवंत राय ने ढाई किलो की लकड़ी से कुत्ते की तरह पीटा, अब ये रंगरलिया देखने गए तो मुझे गाँव में जाकर गाय-भैस ही चराना पड़ेगी, चल भाग यहाँ से।  हम छोटा सा मुँह लेकर उनके रूम से बाहर तो आ गये पर सोच रहे थे कि अब ये रंगरलिया फिल्म देखने का जुगाड़ कैसे बैठाया जाये। 

इंतेज़ार, ऐतबार, तुमसे प्यार कितना करू…


साल 2006 में एक फ़िल्म आई थीं – खोसला का घोंसला । भू-माफिया के चंगुल में फसे दिल्ली के एक मध्यम वर्गीय परिवार पर आधारित ये फ़िल्म बहुत दिलचस्प थी । इस फ़िल्म में कैलाश खैर की आवाज़ में चक दे फट्टे जैसा रोचक गीत भी था । इस फ़िल्म को देखने के बाद लगा कि फ़िल्म में एक गीत को अधूरा छोड़ा गया हैं, इस गीत की पंक्तियों को कुछ दृश्यों में उपयोग किया गया हैं, पर पूरा गीत कभी नही सुनाई दिया ।

तो माजरा ये हैं कि नायक विदेश जाने के लिए प्रयासरत हैं पर उसके परिवार पर भू-माफिया द्वारा एक बड़ी समस्या खड़ी कर दी गई हैं । नायक को विदेश तो जाना हैं पर परिवार को इस हालत में नही छोड़ना हैं । नायिका को इस बात का दुख हैं कि नायक विदेश जा रहा हैं और भावनात्मक उथलपुथल के दौर से गुजर रहा नायक, नायिका के साथ रिश्ते के भविष्य को लेकर कोई ठोस जवाब नही दे पा रहा हैं । और अगर नायक विदेश चला गया तो शायद ये इस रिश्ते का अंत ही हो । नायिका के मन की इसी उधेड़बुन पर इस गीत का ताना बाना रचा गया हैं ।

डर ये लगता हैं क्या ये सपना हैं…
अब जो अपना हैं, कल वो कहाँ हैं…
डरता दिल पूछे बार बार…
इंतेज़ार, ऐतबार, तुमसे प्यार कितना करू…

इस गीत की खूबसूरती ये हैं कि ना ये प्रेम गीत हैं ना विरह गीत, ना खुशी का अहसास देता हैं और ना दर्द का । ये तो मानवीय मन के अंतर्द्वंद्व का गीत हैं । नायिका को नायक के प्रेम पर विश्वास तो हैं पर हालिया घटनाक्रम से वो भविष्य के प्रति संशकित हैं । उसके सवाल नायक से नही, खुद से हैं – इंतेज़ार, एतबार, तुमसे प्यार, कितना करू । ये निर्णय लेने वाली घड़ी का गीत हैं वो भी तब जब दिल और दिमाग का युद्ध जारी है । देखा जाए तो ये जो अंतर्द्वंद्व होता हैं ना, यही जीवित होने का अहसास हैं । पूरा जीवन ही जैसे एक क्वेश्चन-पेपर हैं और ये दुनिया एक बडा सा एग्जाम- हाल । हर किसी को ऊपरवाले ने एक निर्धारित समय दिया हैं इन प्रश्नों के उत्तर ढूंढ़ने के लिए । और इन जवाबो को तलाशने के लिए मानव हृदय खुशी और दर्द के बीच झूलते हुए जिस जीवन को जीता हैं उसी का नाम हैं अंतर्द्वंद ।

अंतर्द्वंद के इस गीत को समंदर की लहरों जैसे भावों में बहते हुए गाया हैं सौम्या राव ने, जिनकी आवाज़ चित्रा की याद दिलाती हैं । गीत का संगीत रचा था विवेक ढला ने और भाव प्रणय लिरिक्स लिखे थे जयदीप सैनी ने । गीत के बीच मे थोड़ी कव्वाली भी हैं जो माधुर्य को कम करती हैं । इतने मधुर गीत की ये पंक्ति फ़िल्म में उपयोग हुई हैं जो हूक की तरह दिल मे लगती हैं – “छोटी रातें हैं, कितनी बातें हैं….अब जो आये हो ….थामो हमे एक बार”….बाते अभी और भी है पर हमारे पास भी शब्दो की सीमा हैं, और अगर आप इसी तरह थामे रहे तो अगली बार फिर मिलते हैं किसी और गीत के साथ…

गीत की यू ट्यूब लिंक – https://m.youtube.com/watch?v=5AGibp-xpb0

आपका अपना
अंकित सिंह सोलंकी, उज्जैन (मप्र)

अभिनय की चाय


बात ज्यादा पुरानी नहीं हैं, यही कोई जनवरी का महीना था |  मैं चाय बना रहा था और टीवी पर बालीवुड के अभिनेताओ की तुलना करते हुए कोई कार्यक्रम चल रहा था | वो अभिनेताओ को १, २, ३ ऐसे क्रम में बाँट रहे थे | खैर मुझे तो किसी भी कला में नाम कमा रहे लोगो में किसी को पहले नंबर पर रखना, किसी को दुसरे नंबर पर रखना कभी भी पसंद नहीं हैं, क्योकि मैं समझता हूँ कि कला एक साधना हैं कोई प्रतियोगिता नहीं | पर टीवी पर चल रही उस बहस ने मुझे एक कमाल का तुलनात्मक अध्ययन करने को प्रेरित किया | मैंने चाय बनाते हुए अभी के समय में लोकप्रिय ५ अभिनेताओ के अभिनय पर बारीकी से सोचा और ये रोचक निष्कर्ष निकाला –

  • सलमान खान – आप उन्हें पसंद करे या ना करे, पर निस्संदेह वो अभी के समय के सबसे बड़े स्टार हैं | एक अभिनेता के तौर पर लोकप्रिय बनाने वाला हर रसायन उनके व्यक्तित्व में मौजूद हैं | उनका अभिनय चाय की खुशबु के सामान हैं | आप चाहे जितना भी पानी डाले, दूध मिलाये, शक्कर और पत्ती से उकाले पर अंत में पीने वाले का मन तो उस चाय की खुशबु से ही भर जाना हैं | और लोग उस खुशबू के इतने दीवाने हैं कि वो सोचते ही नहीं कि चाय का रंग कैसा हैं, स्वाद कैसा हैं | उन्हें तो बस खुशबू का आनंद लेना हैं और उसी में खो जाना हैं |
  • शाहरुख़ खान – शाहरुख़ खान का अभिनय चाय को आँच पर रखकर दी जाने वाली उकाली जैसा हैं | एक अभिनेता के तौर पर उनकी मौजूदगी इस बात का प्रमाण हैं कि फिल्म रूपी चाय बहुत उकलने वाली हैं | और इतना उकलने के बाद जब दर्शक इस चाय को पीता हैं तो उसे एकदम गहरे रंग की कड़क और झन्नाटेदार चाय का अहसास होता हैं | असल में शाहरुख़ के अभिनय में तीव्रता इतनी अधिक हैं कि फिल्म की दूसरी बाते बहुत पीछे छुट जाती हैं और दर्शक महसूस करते हैं तो उनके द्वारा निभाया गया किरदार | फिर चाहे वो डर/बाज़ीगर का सरफिरा आशिक हो या डीडीएलजे/कुछ कुछ होता हैं का बिंदास प्रेमी, कोच कबीर खान हो या मेजर राम…हर किरदार इतना उकाली लिया हुआ प्रतीत होता हैं कि देखने वाले को बस शाहरुख़ और शाहरुख़ ही याद रहते हैं |
  • आमिर खान – आमिर खान का अभिनय तौल-मौल कर बनायीं गयी उस चाय के जैसा हैं जिसमे सब कुछ बराबर हैं | चाय, शक्कर, दूध, पानी, अदरक और आँच – सब कुछ बराबर मात्रा में मिलाने के बाद जब इस चाय को कोई पीता हैं तो उसे संपूर्ण चाय का अहसास होता हैं | चाय का रंग, कड़कपन, मिठास, गर्माहट सब कुछ एकदम परफेक्ट लगता हैं | एक अभिनेता के तौर पर आमिर अपने आप को तो बहुत पीछे छोड़ देते हैं और कहानी में पूरी तरह रमे दिखाई देते हैं | इसीलिए तो फिल्म देखने के बाद लोगो को याद रहती हैं तो एक कहानी और उससे जुड़ा हर एक किरदार, ना कि आमिर खान | आप देख लीजिये कभी भी लगान, थ्री इडीयट, जो जीता वही सिकंदर या पीके, ये अपने आप में इतनी सम्पूर्णता वाली फिल्मे हैं कि आपको इनसे जुड़े हर एक किरदार, हर एक छोटी सी छोटी बातो से प्यार हो जाता हैं |
  • अक्षय कुमार – अक्षय कुमार का अभिनय पत्ती जैसा हैं | दूध चाहे जितना भी पड़े, पानी कितना भी मिले, शकर हो या ना हो और आँच बराबर लगे या ना लगे, रंग तो पत्ती को ही जमाना हैं | और अगर दूध, पानी और आँच भी बराबर मिल जाये तो इस चाय के क्या कहने | एक अभिनेता के तौर पर अक्षय कुमार में सब कुछ हैं, चालाकी भी तो मासूमियत भी, पौरुषता हैं तो भावुकता भी, अल्हड़ता हैं तो परिपक्वता भी | हर एक किरदार में अक्षय कुमार अपना एक अलग रंग दिखाते हैं और अपनी ऊर्जावान व्यक्तित्व से प्रभावित करते हैं | इसीलिए तो कुछ बेसिर-पैर की फिल्मो में भी अक्षय कुमार गज़ब का रंग जमाते हैं | और जब उन्हें अच्छी पटकथा और निर्देशन मिले तो वो इतना कमाल कर जाते हैं कि हर कोई यही बोलता हैं कि ये किरदार अगर अक्षय कुमार के अलावा के अलावा किसी और ने किया होता तो शायद वो मजा नहीं आता |
  • अजय देवगन – साधारण से दिखने वाले इस अभिनेता का अभिनय अदरक जैसा हैं, जिसे गली-मोहल्ले के कोने में मिट्टी से उखाड़ लिया हो और कूटकर चाय में उकाल दिया हो | और जब इस चाय को कोई पीता हैं तो चाय कि चुस्कियो के साथ गले में वो गज़ब का अहसास होता हैं कि हर कोई उस अदरक का कायल हो जाता हैं | अजय देवगन की खलिश भरी आवाज़ और समंदर से गहरी आँखे गज़ब का प्रभाव उत्पन्न करती हैं | इसीलिए तो ऐश्वर्या राय और सलमान खान की मौजूदगी से सजी रंग-रंगीली फिल्म “हम दिल दे चुके सनम” देखकर निकले दर्शको को कुछ याद नहीं रहता सिवाय अजय देवगन के भाव-प्रणय अभिनय के | गंगाज़ल देखकर निकले दर्शक अपने अन्दर भ्रष्टाचार और अराजकता के प्रति गज़ब का गुस्सा महसूस करते हैं और हाल ही में दृश्यम देखने के बाद तो अजय देवगन हमको भी रटवा कर ही मानते हैं – २ अक्तूबर को हम पणजी गये थे नित्यानंद जी के प्रवचन सुनने |

खैर मेरी चाय तो इस ख्याल के साथ ही पक चुकी थी | आप भी आनंद लीजियेगा इस चाय का और बताइयेगा कि कैसी लगी ये पेशकश |

 

25 Most famous Bollywood dialogues in IT/Software Industry


Bollywood is in our blood. We always like to correlate the situation of our life with the scene of any movie.  Someone like to act like a hero and someone love to be villain.

Here are the list of 25 famous Bollywood dialogues, I have  replaced the original words in these dialogues with some funny (or not so funny) situations in day-to-day life of IT/Software corporate world.

All hard-wired and soft-wired people, take a fun ride of these humorous responses of your life –

  1. Client/Customer is always rowdy. His requirements are as miserable as rowdy Akshay Kumar’s mind; He don’t mind to do the things that he never mentioned. bkd akshay kumar
  2. And this is how…people would like to introduce their self. Product name is enough to present their achievements in past.bkd - wednesday
  3. Here is the project manager…eagerly asking about deployment dates to his team members.bkd - gabbar-holi
  4. Investigation of some missed defects is not less interesting than this legendary scene of Sholay where Gabbar is ragging Kalia and his mates. Don’t forget to read the whole conversation 🙂bkd- gabbar and kaliya
  5. Here is the responses of QA to his team about missed defects after postmortem is done.bkd - pan singh tomar
  6. This is the story of every project. Developer and QA are like cat and mouse and their fight turn into most interesting drama of software project. Khamosh…Shatrughan Sinha can better describe this in his famous dialogue BKD - shatrughan sinha
  7. Not …drama of QA and developer is not over yet…Mr. Amitabh Bachhan and Shashi Kapoor would also like to contribute in this fight of moral and values.bkd - amitabh and shahsi in deewar
  8. How can we forget our beloved BABUJI and his SANSKARS. Please excuse QA for some time; this is the fight between two developers on integration defect and SANSKAR of BABUJI are perfect to explain this situation –bkd - ham sath sath hain
  9. Lets bring the QA back into action; He is afraid of rejection of defect.bkd - shahid kapur
  10. Here is the angry developer asking QA to not let the manager know about defects.bkd - dharmendra in shole
  11. Here is the developer get irritated by Data base administrator who always missed to deploy/execute the correct SQL scripts.bkd - sonakshi-sinha_640x480_61427872705
  12. This is the most common word of any team lead to his team for the importance of unit testing of code.bkd - shahrukh khan
  13. Vijay Dennanath Chauhan as project manager is terrifying a fresher who is joining IT industry and client call first time.bkd - amitabh-zanjeer-read
  14. Code reviews are always important…Only lover like Rajkumar of Pakeeza can explain it beautifully what the love for defect free code is …bkd - rajkumar in pakeeza
  15. Saudagar Rajkumar is not a lover but a calm boss also. What a cool manner he is discussing the appraisals with his subordinate …bkd - rajkapur in saudagar
  16. Here is USULO wala devloper who is very much obsessed with back-end technologies only and prefer to work on data base and sql scripts instead of UIbkd - dabur seth
  17. Server administration is the backbone of any project. Once he is down; no one can live happily.bkd - jay kant shikre
  18. The Philosophy of Anand Rajesh Khanna is for everyone in the IT industry. Keep the task status updated …Don’t mind about taskbkd - rajeshkhanna
  19. One last from QA and developer. Most painful situation of the developer’s life is Defect is reproducible in QA’s machine not his. So neither he can fix it nor he can close it.bkd - kuchh kuchh hota he
  20. Meanwhile…hidden expression of an engineer with no project (on bench) for HRbkd - gabbar and thakur
  21. Expression of a project manager after successful delivery of projectbkd - mogambo
  22. On the other side…desperation of project manager on failure of projectbkd - ranjhana
  23. No…we are not leaving on-site coordinator. Only Anarkali of Mugal-e-Azam can understand the pain of himbkd - akbar
  24. Here is the most owckward situation in IT industry…An issue reproduces in customer demo…not during internal testingbkd - Salman-Khan-Kick
  25. Last but not least…Reaction of a Hitler project manager on the last day of his team memberbkd - ja simran ja

Don’t forget to mention your views on this article and let us know if we missed any:)

Disclaimer – All images used in this article are copied from Google Search. Author edited and added the text in these images.

Rain, Rainbow and marriage


No matter how much we love women, we need some special skill to understand them. It’s not the thing they are complex in nature, but they are different to think-off, especially for men. Men and women, both is different creature of god, but when they get together, it’s a moment where god also watches the super drama of his own castings. I am using word drama here just because the relation of husband and wife is like rainbow of life which exhibit all colors of life in very fascinating manner. Love, romance, argument, discussion, anger, emotional, excitement, disappointment, patience, expectation, fun, tease, chase, hope…a married man taste all the emotion of life under one roof only. But I must say I am amateur to write on this topic as I am fresh entrant in the married club. Old man said that a new wedding is like rainbow after heavy rain, weather is peaceful and very exciting. As the time passes, rainbow colors came to the earth in green, white, gray, blue and black shade too. Well…Whatever be its color and impact, rain, rainbow and marriages are essential for man and his life. It fertile the earth, colored it and give meaning to its existence.

I started my word with the difference in man and woman’s thinking and I have a very interesting incident to share. It was pleasant morning of Manali when I asked my wife to get ready for tracking. On the way I found myself hungry and we have some bananas in our bucket. One fine and alone place we took halt to eat something. I opened the bucket and with the overdose of ‘ladies first’ manners, I cut and offer one banana to her. She refused with the gesture that she is not hungry and also not interested in eating something. I uncovered the banana and started eating it. She looked at me with smile and strangeness at face. I thought she didn’t like the way I am eating the banana as I was very hungry and ate complete banana in three bytes and forty second. In the curse of hunger, I cut the second banana but behaved gently with this banana. I took the first byte and again found my wife looking with the same face at me.  This time I got confused, I left the wild boyish attitude, turned gentle man and still she was making strange face. Don’t know what I thought but I offered the second byte of the banana to her. She inclined towards me and grabbed the banana byte from my hand. She got happy like a child was given Cadbury after so much waiting. We ate three bananas like this and she was happy more than the M S Dhoni when he won the world cup. I asked her that why she refused banana at first if she was also hungry. She told me that she was waited for me to ask from my banana. I couldn’t digest her fact but liked her act as she wanted to make this boring banana eating activity so romantic. (it also made me think about famous Cadbury ad where chocolate is shared with strange people…eeee…so unhygienic but touching advertisement). Well…this is not the only thing, there are a lot moment that a man can’t think and woman make them feel. May be some day, I may share few more interesting moments like this as I just entered in span of life where a man  encounter the most beautiful and colorful face of his life.  AAMIN !

After wonderful incident, I want to share one amazing fact. My mother told me that first movie she watched with my father after marriage was ‘Kranti’ (remember Manoj Kumar, Dilip Kumar and HemaMalini starrer 80’s movie). I laughed at this fact as why they choose such a movie with so negative and violent name just after their wedding. After thirty years, when I went to watch my first movie after marriage, name of the movie was ‘Ek Villain’( Again, a negative and disappointing name ) There was no Kranti happened in my parents’ life and they are very much happy with together so I am also hopeful that no one turned villain in our love story too J(don’t look at me, I am waiting for television to broad cast ‘Main Tera Hero’ movie so that we can overcome the negative effect) AAMIN !

One last thing to give finishing touch…In Manali, our hotel offered us luxury room, tasty food, comfortable stay, prompt service, apple garden to visit, beautiful window view, discotheque, games (badminton, roller scatting, computer games, table tennis) to play and books to read…but what I liked most was… free wifi connection. (Now you can understand why girls don’t prefer engineer husband 🙂 )

 

 

Alok Nath Jokes


My Contribution to Alok Nath Jokes…100% original and 101% fresh.

  1. Alok Nath has filed a case for the royalty from all the truck owners who printed this line on their truck – “BABUJEE main aa gayi”
  2. Alok nath hangs a “GHANTA” at the entrance of his house because he treats “GHAR EK MANDIR”
  3. Alok Nath tied all his family members by rope because “wo pariwar ko bandhkar rakhne me vishwas rakhte he”
  4. Alok nath always called his wife as – “Suniye Samdhanjee”
  5. Once Alok Nath was arrested for gender test of his unborn baby. He wanted to kill his “BOY-BABY” because it will not produce the opportunity of KANYADAN for him.
  6. Alok nath refuses to attend Karan Johar’s wedding because he only does “Kanyadan” in marriages.
  7. Alok Nath supports Rahul Gandhi because he believes in “PARIVAR-VAD”
  8. Once Alok Nath was walking very slow…because a song was playing on radio “babuji jara dheere chalo bijli khadi yaha bijali khadi”
  9. Salman Khan – “I am still virgin babuji.”  Alok Nath – “Bas tune hi mere sanskaro ka man rakha Prem beta”
  10. Once Alok Nath went to his daughter’s home and he was thirsty …but he drink “DARU” at her home instead of water…because “wo apni beti ke ghar ka pani bhi nahi peeta”
  11. Guess the name of daughters of Alok Nath – Pooja, Aarati, Bhakti, Bhawna, Aastha, Maryada, Tapasya…
  12. If Alok Nath was the hero of Chennai Express, his dialogue would be – “Don’t underestimate the power of FAMILY-MAN”
  13. Alok Nath makes love to his girlfriend by kissing her feet….because he believes in “CHARAN SPARSH”
  14. During his wedding, all the family members of Alok nath and his wife took the PHERE around AGNI, because he thinks “shadi do logo ka nahi, do parivaro ka milan hain”
  15. Alok Nath’s favorite song – hawan karenge…hawan karenge…
  16. Once Alok Nath was travelling in train without ticket and caught by ticket checker. He didn’t have money, so when ticket checker asked for fine, Alok Nath pull out his turban(pagdi) and put at the feet of ticket checker, and said – “ab meri izzat apke hi hatho me hain TT babu”
  17. Ek bar Mallika Sherawat ne ek movie me Alok Nath ki beti ka role kiya ….aur us movie me Alok Nath ne mallika ke kapde apne bhagwan ko bhi pahna diye.
  18. Mohnish Behal had decided to do positive role in the movies only if Alok Nath plays the role of his father.
  19. Once Ranjeet came to Alok Nath’s home with intention to rape his daughter. But Ranjeet dropped the idea because Alok Nath treat guest as god. He did AARATI of Ranjeet at the entrance and washed his feet. Later he served him dinner also.
  20. Alok Nath is the only man in India who is allowed to paste his family photographs at passport, PAN card and Aadhar card.
  21. Alok Nath has requested bank locker to put his daughter in it. Because he believes “Beti to paraya DHAN hoti hain.”
  22. Alok Nath was awarded as “MALE NIRUPA ROY” by the government of India.

 

सावन बरसे, तरसे दिल


सावन बरसे, तरसे दिल…
क्यों ना निकले घर से दिल ….

मैं ये गीत क्यों पसंद करता हूँ …क्या कहा…सोनाली बेंद्रे की वजह से…मैं इस तथ्य से इनकार नहीं करता …पर यकीन मानिये सोनाली बेंद्रे को देखने के लिए और भी बहुत सारे गीत हैं…असल में इस गीत को पसंद करने की मेरे पास एक नहीं अनेक वजह हैं | फिर चाहे वो हरिहरन और साधना सरगम की सुमधुर आवाज़े हो या आदेश श्रीवास्तव का भावपूर्ण संगीत, अक्षय खन्ना और सोनाली बेंद्रे की उम्दा अदाकारी हो या शब्दों में दो प्रेमियों की बेचैनी को बयां करते इस गीत के बोल, सब कुछ अपने आप में अद्भुत हैं | पर इस गीत को पसंद करने की जो सबसे बड़ी और अहम् वजह मेरे पास हैं, वो हैं बारिश | मुझे हिंदी गीतों में बारिश के उपयोग पर बहुत सारी शिकायते हैं, हमने बारिश को हमेशा नायिका की मांसल देह को प्रदर्शित करने के लिए प्रयोग किया हैं या प्रेम के भोंडे प्रदर्शन के लिए | पर ये गीत अपने आप को उन सबसे अलग ही श्रेणी में खड़ा करता हैं, फ़िल्मकार ने बहुत ही खूबसूरती से वर्षा के माध्यम से पहले प्रेम की अभिव्यक्ति दिखाई हैं |

इस गीत की शुरुआत होती हें जब दौ प्रेमी पत्र के माध्यम से अपने मिलने का समय और जगह निर्धारित करते हें | दोनों ही इस मुलाकात के लिए खासे उत्साहित (या यू कहे पगलाये) जान पड़ते हैं ! गीत के शुरू होते ही सोनाली बेंद्रे अपने इस उत्साह को बारिश के पानी में उछलकूद करते हुए प्रदर्शित करती हें, तो उनकी उछलकूद से उठने वाले पानी के छींटे सहज ही देखने वालो के मन पर पड़ते हैं | और पड़े भी क्यों न, पहले पत्र पड़कर खुश होती, मुस्कुराती बला की ख़ूबसूरत सोनाली बेंद्रे को दिखाना, फिर सावन की बारिश से सराबोर शहर का खुशनुमा माहौल, और फिर मुलाकात के उत्साह से बारिश में मोहतरमा की उछलकूद, दिल को मदमस्त कर देने वाले सारे रसायन जैसे एक साथ ही मौजूद हैं | इतना देखने के बाद हम आनंद की हिलोरी भर रहे होते हैं कि हमारे आनंद को दोगुना करते हरिहरन के बोल शुरू होते हैं –

सावन बरसे, तरसे दिल…
क्यों ना निकले घर से दिल ….
बरखा में भी दिल प्यासा हैं…
ये प्यार नहीं तो क्या हैं …
देखो कैसा बेक़रार हैं भरे बाज़ार में…
यार एक यार के इंतज़ार में…


सच, गीत के बोल ऐसी बारिश में दीवानों के दिल का हाल व्यक्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं, फिर चाहे वो प्रेम-दीवाने हो या मेरी तरह बारिश के दीवाने | गीत का मुखड़ा तीन चीजों पर केन्द्रित हैं – सावन, बाज़ार और यार | और गीत के फिल्मांकन में जोरदार सावन दिखाया हैं, सावन की बारिश में भीगता-सवरता शहर का बाज़ार भी दिखाया हैं, और बाज़ार के उन भीगे नजारो में फिरते दो दीवानों की बेताबी और प्यार की खुमारी के ख़ूबसूरत रंग भी दिखाए हैं |

जहाँ एक और सोनाली बेंद्रे बारिश में उछलकूद कर रही होती हैं, वही दूसरी और अक्षय खन्ना लाल रंग की चमकीली शर्ट पहने बारिश में बेख़ौफ़ चहलकदमी करते हुए सामने आते हैं | उनकी चाल में जिन्दादिली हैं तो लड़कपन भी, उत्साह की पराकाष्ठा हे तो बिंदासपन भी, आँखों में मासूमियत हे तो हरकतों में नटखटपन भी | बारिश की तो जैसे उन्हें कोई परवाह ही नहीं हैं वरन वो तो इसका पूरा मजा ले रहे हैं, जैसे बारिश बस उनकी ख़ुशी में शामिल होने के लिए ही बरस रही हैं | छाता लेकर चलते लोगो की भीड़ में से निकलने की जल्दबाजी हो या फूलो को देखकर मुस्कुराने का द्रश्य हो, हर द्रश्य में अक्षय खन्ना कही अपनी जोशीली चाल से तो कही अपनी भावपूर्ण आँखों से बहुत कुछ बयां करते नजर आये हैं |

खैर मुलाकात का उत्साह तो गीत के मुखड़े में हो गया, अब जायजा लीजिये मुलाकात के लिए की जाने वाली तैयारियों का, गीत के अंतरे में | नायिका जहाँ अपना सारा समय श्रंगार में बिताती हैं तो नायक तोहफा खरीदने में | दोनों एक दुसरे के ख्यालो में इस कदर डूबे हुए हैं की कुछ भी करते हुए बस एक दुसरे के बारे में ही सोच रहे हैं | नायिका नायक की पसंद के बारे में सोचकर ड्रेस निर्धारित करती हैं तो नायक नायिका की पसंद को ध्यान में रखकर तोहफा खरीदता हैं | और इस दौरान साधना सरगम अपने सुरों से सब कुछ बखूबी बयां करती हैं –

एक मोहब्बत का दीवाना ढूँढता सा फिरे…
कोई चाहत का नजराना दिलरूबा के लिए …

 इसके तुरंत बाद गीत प्रेम की पटरी को फिर बारिश के प्लेटफ़ॉर्म से जोड़ देता हैं और मेरा पसंदीदा द्रश्य आता हैं | और यही बात मुझे बहुत पसंद हे इस गीत की, हर बात को बारिश से जोड़ा गया हैं, जैसे बारिश अगर न बरसे तो लोग प्यार ही ना करे, दीवाने घर से ही ना निकले, मुलाकात ही ना करे, बस ऐसे गुमसुम घर में ही बैठे रहे| खैर, मैं अब अपने दिल के समंदर को समेटता हूँ और उस द्रश्य के बारे में बताता हु जिसका जिक्र शुरू किया था| अक्षय खन्ना उपहार खरीद कर गार्डन-गार्डन होते बाहर आते हे कि बारिश में खेलते बच्चो की फुटबाल उनके पास आती हैं| इस आनंद कि परिसीमा में उनके अन्दर का बच्चा जाग जाता हैं और वो बच्चो के साथ मस्ती करने लग जाते हैं | सच, बारिश में क्रिकेट या फूटबाल खेलने का अपना ही मजा हैं | और इस मजे में दिल की स्तिथि का शत प्रतिशत जायजा देते गीत के बोल –

छम-छम चले पागल पवन …
आये मजा भीगे बलम…
भीगे बलम, फिसले कदम…बरखा-बहार में …

इस द्रश्य में एक और मजेदार बात ये हैं कि इतने सारे बच्चे बॉल मांगते हुए अक्षय खन्ना के ऊपर चढ़ जाते हे फिर भी उनके हाथो में रखे फूल जस के तस बने रहते हैं | वैसे थोडा ध्यान से देखा जाये तो एक और बात हैं इस द्रशय में, अक्षय खन्ना पंटालून से उपहार और आरचीस से फूल खरीदते हैं | पंटालून की वो दुकान आजकल के पंटालून शो-रूम के मुकाबले काफी छोटी दिखाई पड़ती हैं, जो स्वतः ही भारत में आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण के शुरुआती दिनों की झलक दिखाते हैं |

मुलाकात के लिए श्रंगार हो गया, तोहफे खरीदना हो गया, अब बारी हैं गंतव्य तक पहुचने की | किन्तु शहर में तो हर तरफ बारिश हैं, पर साहिब-इ-आलम ये बारिश बाधक नहीं हैं वरन ये तो बस इन प्रेमियों के लिए ही बरस रही हैं | फ़िल्मकार ने बहुत ही खूबसूरती से बारिश के दिनों में आने वाली दिक्कतों से दोनों प्रेमियों की बैचैनी और मिलन के उत्साह को प्रदर्शित किया हैं | तेज़ हवा से जहाँ सोनाली बेंद्रे का छाता उड़ जाता हैं, वही अक्षय खन्ना तो पूरे भीगने का मन बनाकर ही घर से निकले हैं, हा बाल जरूर वो एक टेंकर के पानी से पहले ही धो लेते हैं | बारिश के कारण हुए जाम में सोनाली बेंद्रे की टेक्सी फस जाती हैं तो वो पैदल ही बाहर निकलकर सब्जी बेचने वाली महिलाओ के साथ चलना शुरू कर देती हैं | अक्षय खन्ना का ऑटो गड्डे में फंस जाता हैं (हालाँकि वो गड्डा फसने जैसा तो नहीं दिखाई देता हैं) तो वो तुरंत ही ऑटो वाले को पैसे देकर दूसरा साधन ढूँढना शुरू कर देते हैं | दोनों की बेसब्री और बैचनी इन द्रश्यो में देखते ही बनती हैं और उस पर हरिहरन गाते हे –

एक हसीना इधर देखो कैसी बैचैन हैं …
रास्ते पर लगे कैसे उसके दौ नैन हैं…
सच पूछिये तो मेरे यार …
दोनो के दिल बे-अख्तियार …
बे-अख्तियार…हैं पहली बार..पहली बहार में

जैसे जैसे दोनों अपने गंतव्य की और आगे बदते हैं, दोनों की यात्रा बहुत ही रोमांचक होती जाती हैं | और इस रोमांच, उत्साह और बेताबी को साज में बखूबी ढाला हैं संगीतकार ने | नायक-नायिका के दिल की धड़कने, दोनों के सफ़र का रोमांच, हरिहरन-साधना सरगम की जुगलबंदी और जुगलबंदी का भरपूर साथ देता भावविभोर संगीत, सब कुछ जैसे अपने चरम पर आ जाता हैं | सोनाली बेंद्रे साइकल रिक्शा में झुग्गी वाले बच्चो के साथ भीगने और सफ़र दोनों का मजा लेती हैं तो अक्षय खन्ना डम्फर चलाते तो कही हाथ ठेला में बैठे दिखाई देते हैं | लिफ्ट न मिलने पर निराशा का भाव हो या सड़क पार करने की हड़बड़ी, कोल्ड ड्रिंक की लौरी में लटक कर जाने का लुत्फ़ उठाना हो या बारिश में आम लोगो के साथ मजे करना, हर द्रश्य देखने वाले के मन को एक निर्मल आनंद से भिगोकर सराबोर कर देता हैं |

गीत के अंत में दोनो अपने नियत स्थान पर पहुच जाते हैं | नायक जहाँ नायिका को देखता हैं तो देखता ही रह जाता हैं, वही नायिका की बैचैन आँखे पहले तो नायक को भीड़ में बहुत ढूंडती हैं पर एक बार नज़रे मिलने पर शरमाकर झुक भी जाती हैं | द्रश्य को देखकर तय करना मुश्किल हैं की सावन की बारिश में भीगने में ज्यादा आनंद हैं या पहले प्यार की खुमारी में | वैसे आप कुछ निर्धारित करे उससे पहले मैं आपको बता दू की, इस द्रश्य की प्रष्ठभूमि में चर्च और उसके सामने चहलकदमी करती ननो (सिस्टर्स) को दिखाया हैं और वो भी ऐसे जैसे उन्हें कोई मतलब ही नहीं हैं इन दौ प्रेमियों के मिलन से | अब बस इस पर तो इतना ही कह सकते हैं –

कि जिसे मज़ा आ गया खुदा कि खातिरदारी में …
उसे क्या भीगना प्यार की खुमारी में …

वैसे एक और खास बात गीत के बारे में, गीत में फिल्माया हर एक द्रश्य से आप जुड़ाव महसूस करते हैं, हर द्रश्य जैसे अपने शहर का ही लगता हैं | गीत के बोलो में इसे सावन का महिना बताया हैं, और ठीक सावन के ही महीने की तरह कही जोरो से झमाझम बारिश दिखाई हैं, तो कही बूंदाबांदी | कही बारिश में खुश होते, मजे करते आम लोगो को दिखाया हैं, तो कही बारिश की वजह से प्रभावित हुआ जनजीवन | कई बार मैं सोचता हूँ की ये गीत बारिश का दर्शन हैं, अब देखिये ना टेक्सी से निकलकर आम लोगो के साथ सोनाली बेंद्रे का सफ़र करना बारिश में अमीर-गरीब के भेदभाव का कम होना दिखाता हैं, तो अनजान लोगो के द्वारा लिफ्ट देना मानव के सहायता करने की प्रवृत्ति को दर्शाता हैं| दूधवाले का बारिश में निकलना, लोगो के पास जरूरत की वस्तुओं को पहुचाना मनुष्य का मेहनती स्वाभाव दिखाता हैं, तो बारिश में भीगना, मजे करना मानवीय ह्रदय की मस्तमौला प्रवत्ति की और इशारा करती हैं | एक प्रेम को निभाने के चक्कर में दोनो प्रेमी कितने ही अनजान लोगो को अपना बना लेते हैं | ये ज़िन्दगी भी तो कई मायनों में ऐसी ही होती हैं, एक रिश्ता निभाने के लिए हम कितने ही बंधन जोड़ लेते हैं, एक सपना पूरा करने में कितने अरमान पूरे करते हैं, एक ज़िन्दगी जीने के लिए कितने ही जीवन को प्रभावित करते हैं, एक मंजिल को पाने के लिए कितने रास्तो से गुजर जाते हैं और उन रास्तो में कितने मुसाफिरों से मिल जाते हैं| सच ज़िन्दगी का सफ़र भी इन प्रेमियों के सफ़र की तरह ही बेताबियो से भरा और रोमांचक होता तो कितना मज़ा आता |

खैर, मैं अब अपने दर्शन-शास्त्र को विराम देता हूँ और आपसे अनुरोध करता हूँ की मेरे मशविरे पर इस गीत को जरूर देखिये , या यु कहे इस मानसून की शुरुआत ही इस गीत से कीजिये | यकीन मानिये आप मेरे अनुरोध को अहसान मानेगे …

गीत की यु-ट्यूब लिंक – http://www.youtube.com/watch?v=JmEQNr17cFQ