शहर


इस शहर की गलियों में गफलत हैं बहुत,
आवाज़े हे कम पर शोर हे बहुत

हवाए भी रखती हे यहाँ आग का असर
खुशबूये हैं कम जिनमे पर धुआं हे बहुत

तनहा मायूस लगती हर सूरत संजीदा यहाँ
ख्वाहिशे घुटी हैं जिसमे, हसरते सहमी हैं बहुत

डर गुस्से का हर किस्सा होता निगाहों से बयाँ यहाँ
कुछ आँखे रोई हैं बहुत, कुछ गुर्रायी हैं बहुत

मतलबपरस्त हो चूका इमां हर इन्सां का
खुदाई दिखती कम पर खुदगर्जी बिकती हे बहुत

कितनी बेरहम हे दुआये खुदा के दलालों की भी
हमदर्दी हैं गुम जिसमे पर नफरते महकती हैं बहुत

कुछ कारण हैं कि लिख रहे हे ऐसी गजल गाली खाने को
वरना महफ़िल में तारीफे हमने भी बटोरी हैं बहुत

ये किस शहर में आ गए ‘ठाकुर’ तुम अपनी तकदीर तराशने को
पत्थरो कि हैं हुकूमत हर जगह यहाँ और फूलो कि ज़िल्लत हैं बहुत