खुशी


खुश हो तो खुशी दिखना चाहिए
दिल से निकलकर चेहरे से टपकना चाहिए

हँसने के हर मौके को लपकना चाहिए
ठहाके की आवाज़ मंज़र में ठहरना चाहिए

कोई जादूगर नहीं जो मन की बात समझ ले
अहसास को अल्फ़ाज़ में बयां करना चाहिए

आये कोई मिलने तो उसे ये लगना चाहिये
ये आदमी हैं दिलचस्प इससे मिलते रहना चाहिए

वक़्त तो बदलेगा उसे बदलना चाहिए
ये मुस्कान आपके हौठो पर हमेशा ठहरना चाहिए

और कोई मक़सद नही मेरा कुछ लिखने का
बस आपका और हमारा याराना यूँही चलना चाहिए

खुदा खैर रखना सबकी


खुदा खैर रखना सबकी
कि रुत चल रही हैं ग़म की

शिकवे-शिकायत हम बाद में देख लेंगे
अभी तो जरूरत हैं बस तेरे रहम की

खतावार मैं हूँ तो सजा भी हो सिर्फ मेरी
ना काटे कोई क़ैद मेरे करम की

आरजू हैं अमन कायम रहे मुल्क में
मुस्कुराती रहे हर कली मेरे चमन की

एक तू ही तो हैं हर दीन-दुखी का सहारा
तू हैं तो क्या जरूरत किसी दूजे सनम की

खुदा खैर रखना सबकी
कि रुत चल रही हैं ग़म की

— अंकित सोलंकी , उज्जैन (मप्र) (मौलिक एवं स्वलिखित)

मौत


छा गया अंधेरा बुझ गयी ज्योत
वक़्त की उंगलिया थामे लो आ गयी मौत

जुए का खेल था ये ज़िन्दगी का कारवा
जीते तो जीते चले गए और हारे तो लो आ गयी मौत

बड़ी चालाकी से चल रहे थे हम तो हर एक चाल यारा
पर चाल चली जब उसने तो लो आ गयी मौत

दाँव पर लगी थी साँसे हाशिये पर थे होश
पर होठो से ये कहते ना बनी कि लो आ गयी मौत

बचपन से बुढ़ापा तो हैं एक गोल चौराहा
एक उमर का चक्कर था और आ गयी मौत

किराये की काया को अपना मत समझ लेना “ठाकुर”
रूह को आज़ाद करने एक दिन तो आएगी मौत