ख़ुशी


रुई का गद्दा बेचकर दरी खरीद ली,
ख्वाहिशो को कम किया और ख़ुशी खरीद ली !

कुछ पुरानी पतलून बेचकर चड्डी खरीद ली,
क्रिकेट को छोड़ा और कबड्डी खरीद ली !

सबने ख़रीदा सोना मेने सुई खरीद ली
सपनो को बुनने जितनी डोर खरीद ली !

मेरी एक ख्वाहिश मुझसे मेरे दोस्त ने खरीद ली,
फिर उसकी हँसी से मेने अपनी ख़ुशी खरीद ली !

इस ज़माने से सौदा कर एक ज़िन्दगी खरीद ली,
दिनों को बेचा और शामे खरीद ली !

सपनो के सिनेमा में एक सीट खरीद ली,
चुकाया पूरा बिल और पक्की रसीद ली !

रुई का गद्दा बेचकर दरी खरीद ली,
ख्वाहिशो को कम किया और ख़ुशी खरीद ली !

“तलाश”


मैं शराब नहीं पीता,
पर तेरी निगाहें नीयत ख़राब करती हैं !
मैं ख्वाब नहीं देखता,
पर तेरी सूरत नींदे ख़राब करती हैं !!

मैं कोई राज़ नहीं रखता,
पर तेरा ख्याल दिल में दबा रखा हैं !
मैं कोई कामकाज नहीं करता,
पर तेरी आशिकी में खुद को लगा रखा हैं !!

मैं होश नहीं खोता,
पर तेरी चाहत दिन में रात दिखाती हैं !
मैं रोज़ रोज़ नहीं रोता,
पर तेरी याद आँसुओं की बरसात कराती हैं !!

मैं वादों पर नहीं मरता,
पर तेरी कसम हर कसम पे भारी हैं !
मैं सौदेबाजी नहीं करता,
पर तेरे लिए खुदा से जंग जारी हैं !!

मैं मुसाफिर नहीं बनता,
पर तेरी राहों में अपनी ज़िन्दगी बितानी हैं !
मैं काफ़िर नहीं बनता,
पर तेरी मोहब्बत ही बस खुदा की निशानी हैं !!

मैं शायरी नहीं करता,
पर तेरी तारीफ सबको सुनानी हैं !
मैं तस्वीरे नहीं बनाता,
पर तेरी शकल सबको दिखानी हैं !!

मैं झूठ नहीं कहता,
पर मुझे ये बात बतानी हैं !
ये कविता जरूर सुन लो,
पर ये कविता नहीं ये कहानी हैं !!

कहानी हैं ये,
पर इस कहानी में ना कोई रानी हैं !
राजा हूँ मैं,
और रानी की तलाश जारी हैं !!

नशा


Dedicated to all my drinker friends

थोडा खुद को सजा दीजिये
कोई ना कोई नशा कीजिये

कब तक यु सेहत का मज़ा लीजिये
जख्मो को भी तो जगह दीजिये

चाहे जितनी मर्जी चंदा कीजिये
थोडा चखना और एक बोतल पर मंगा लीजिये

बेरहम ज़माने से बेखबर बनिए
बोतलों में बहकर बेशरम बनिए

फालतू की अब फिक्र छोडिये
सुरूर भरा कोई जिक्र छेडिये

आज ना गुनाहों पर पर्दा डालिए
जो बात दिल में हो बोल डालिये

बचपन की वो डायरी खोलिए
जवानी की वो शायरी बोलिए

अल्फाजो को आजाद कीजिये
ख्यालो को खुलेआम छोडिये

नशीली इन रातो में न सोच समझ दिखाइए
बस जाम पीजिये और जश्न मनाइये

गुस्ताखी


किसका भला हुआ हुआ हैं किनारों पर बैठकर,
बेमौसम बारिश की बहारो को देखकर !

कभी देखना किसी माझी से पूछकर,
कितना मजा आया उसे तुफानो से खेलकर !

करते रहिये थोड़ी गुस्ताखी जानबूझकर,
खुदा भी खौफ खाता हैं खामोश चेहरों को देखकर !

वैसे खुश कोई नहीं यहाँ अपना आज देखकर,
रोता हैं हर कोई एक दुसरे का कामकाज देखकर !

में खुश हूँ मेरे यार का बसा घर संसार देखकर,
और मेरा यार खुश हैं मुझे अब तक आजाद देखकर !

खुश होते हैं वैसे लोग यहाँ आँखों को भी सेककर,
ठहरे हुए पानी में पत्थरो को फेंककर !

वो समझे हम भी चले जायेंगे चेहरे को घूरकर,
हम ठहरे ही रहे पर उनके ही दरवाजे पर !

खायी फिर उनकी गलियों में हमने इतनी ठोकर,
बिन पिए ही चलते हैं हम आज तक लड़खड़ाकर !

कहता हैं ये जमाना हमसे थोडा सा सब्र कर,
हम कहते हैं ज़माने से मिलते हे फिर कब्र पर !

मेरा गाँव, मेरा देश


 

गाँव वीरान हैं, कसबे बेजुबान हैं
शहरों में रहने चला गया वो जो घर का जवान हैं

आता हैं घर ऐसे जैसे मेहमान हैं
बूढी आँखों को फिर भी इतने में इत्मिनान हैं !

कहने को नगर हैं, कहने को महानगर हैं
ऊँची इमारतों के नीचे पर एक लम्बी गटर हैं !

आदमी हैं कुत्ता जहाँ और औरत बिल्ली हैं
मुंबई हैं मुसीबत यारो और डरावना दिल्ली हैं !

हैं कुछ नौजवान दोस्त मेरे जो पढ़ न सके
कुछ तो अच्छा किया जो माँ-बाप संग रह सके !

आया जब भी गाँव में मैं अपनों की खोज में
था अकेला में जवान वहाँ बुढ्ढो की फ़ौज में !

कभी कटती थी फसल जिन खेतो और खलिहानों में
आज कालोनिया कट रही थी वहाँ मिटटी के मैदानों में !

कुछ रहे ना रहे मेरा गुरुर जरूर मिट जायेगा
गाँवो का गुलशन एक दिन शमशान में बदल जायेगा !

वो गाँव की गौरी बस तरानों में रहेंगी
वो पनघट वो बोली बस बातों में रहेंगी !

मैं सोचता हु उस समय भी ये आबादी क्या इसी मजे में रहेंगी
भूँख से बिलखती सोसायटी क्या मोबाइल से पेट भरेगी !

शाम होने को हैं यारो, रात भी होकर रहेंगी
सुबह का सूरज क्या सूरत लेकर आये, ये बात डराती रहेंगी !

 

Epilogue – This poem is my concern about our villages that are losing their identity on the map of shining India. Rather than facilitate villages and small towns with basic needs of life, we are destroying them on the name of development and modernization. It’s really pinching me to see the pictures like green farms are converting into colonies and the migration of youngsters from towns to metro cities. I put all such thoughts and emotions on paper with the hope that it makes you feel some hotness of the fire that is burning inside me.

जवान


साल दर साल मेरे ख्याल बदलने लगे,
उमर जो बढ़ी तो बाल पकने लगे !
वो मासूमियत तो बचपन कब का अपने साथ ले गया,
अब तो लड़कपन के मुंहासे भी सूरत से झरने लगे !
वो माँ हैं जो कहती हैं कि मैं अब भी बच्चा हूँ,
वरना कुछ लोग तो मुझे अभी से बूढ़ा भी कहने लगे !
ये आईना ही हैं जो अपने दाम का पूरा हक अदा करता हैं,
दाढ़ी मुछे जो हटाई तो गा्ल गुलाबी चमकने लगे !
हम निकले जब भी ऐसे सज-धजकर शहर के बाजारों से,
हसिनाओ की नजर ना पड़ी पर बुजुर्ग जरूर बातें करने लगे !
कुछ समझाइश देने लगे, कुछ खरीद-फ़रॉख्त करने लगे,
गोयाकी हम इश्क़ खरीदना चाहते थे और वो शहनाई बेचने लगे !
यहाँ सब लोग कहते हैं कि तुम जवान हो गए ठाकुर
पर लोगो के ऐसे जोक मुझे हैरान करने लगे !
कुछ हैं जो बहुत पीछे छोड़ आये हैं हम
याद वो आता नहीं पर हम इंतज़ार करने लगे !

अय्याशियाँ


अय्याशियों की आदत निराली होती हैं
मस्ती की ये बोतले ना कभी खाली होती हैं !
खाली होती हैं गलियाँ सूरज की रोशनी देखकर
दिन के उजालो में रंगीनियों को भी परेशानी होती हैं !
वो बंद हो जाते हैं मयखाने दिल को लुभाने वाले
शहर में जब भी जमकर पहरेदारी होती हैं !
चोर फिर भी बाज़ नहीं आते चोरी करने की आदत से
पर मासूमो को रुसवा करना सिपाही की ज़िम्मेदारी होती हैं !
हैं कुछ लोग इस शहर में जो खुद को समझदार कहते हैं
पर उनकी समझदारी बस स्कूलों में पढ़ाने की होती हैं !
वो चौराहे पर फूँकते रहते हैं हर लम्हे को धुएँ में
जिन नौजवानों की उमर कुछ कर दिखाने की होती हैं!
और दिखाई देती हैं वो तस्वीर भी यहाँ के बागीचो में
जो बाते बंद कमरों में बताने की होती हैं !
क्या कहूँ और अब अपने शहर की आदतों के बारे में
ये आदत हैं मेरी ज्यादा बोलने की, इससे ही मेरी बदनामी होती हैं !

रूह का आँचल


भला-पूरा पागल हूँ मैं
गिरा-संभला आँचल हूँ मैं

जो ढलका कभी तो जमीं से जुड़ गया मैं
जो उड़ा कभी तो हवाओं में घुल गया मैं

क्या हुआ जो सर से थोडा सरक गया मैं
पागल हवाओ को पहले परख गया मैं

कोई जख्म तो तेरे जिस्म पर नहीं दे गया मैं
मुहब्बत की बादलो से तो बारिशो में बह गया मैं

तेरी तू सोच मुझे अपने हाल पर छोड़ दे
दामन को मेरे अपने काँधे से तोड़ दे

कर कोशिश अपने पैरो को ज़माने की ज़रा
आसमान तक उड़ने में जमीं को न छोड़ दे

में तो हूँ परिंदा ‘ठाकुर’,उड़ता ही चला जाऊंगा
तू देख कोई काफ़िर तेरा घरोंदा न तोड़ दे

अफवाहों से मुबारको का सफ़र


न वो कुछ बोले, ना हम कुछ बोले
फिजा में अफवाहे फिर कौन घोले

जी भर के हँसे या जरा देर रो ले
बात बनाते लोगो को पर कोई क्या बोले

बोले तो कोई बोले हमें, उन्हें न बोले
कि हम तो हैं बिंदास बहुत, वो हैं जरा भोले

हर सूरत को वो एक नज़र से तौले
बोले जब भी किसी से मुस्कुरा के बोले

क्या खता उनकी जो वो हमसे शरमाये, ना बोले
क्या गलती हमारी जो देखे उन्हें हम, हौले हौले

मजबूर हैं खुद से जो हम उनकी राहों में डोले
ये आवारगी की आदत हैं जिसे जमाना चाहत बोले

ना कभी हम ‘इश्क’ बोले, ना कभी वो ‘कुबूल’ बोले
महफ़िल में मुबारके फिर कौन घोले

फितरत…


क्यों किसी को कुछ बताते नहीं
रोते हैं पर आँसू दिखाते नहीं

कितने किस्से दिल को हैं कहना
लफ्ज़ जुबा तक पर आते नहीं

जबान अपनी, आवाज़ अपनी
अपने ही मन की बात सुनाती नहीं

कैसे करे किसी और का भरोसा हम
जब आहट खुद की ही सुन पाते नहीं

हैं जो मन के भीतर, एक तुफां हैं
उमड़ता हे अकेले में पर भीड़ में खो जाता हे कही

इसे शरमाना कहे या शराफत का नाम दे ..
कि शेर होकर भी शौक शिकार के दिखाते नहीं…

ये कैसी फितरत में ढाला हैं हमको खुदा ने
जाम हे हाथो में पर लबो से लगा पाते नहीं…

कोई कहे कैसे जिए इस कशमकश में अब
डरते हे बहकने से और पिये बिना रह पाते नहीं…