जंग


इंसानियत दो हिस्सों में बंट गई
जमीन पर जब सरहद बन गई

करतूत देखो कमीने इंसान की
मुल्क बनाये, मिट्टी बंट गईं

फिर बैठी बिसात सियासत की
फौज बनी, बंदूके तन गई

हुक्मरानों को तो हुकूमतें चलाना था
फरमान निकाला जंग छिड़ गई

कौन सही कौन गलत
सारी दुनिया इसी में लग गई

कौन देखे उन मासूमों को
जिनकी ज़िन्दगी जहन्नुम बन गई

कितनी माँ बेऔलाद हो गई
कितनी बेगमे बेवा बन गई

सारा झगड़ा सिर्फ सरहद का था
एक लकीर से इंसानियत मिट गई

ठाकुर ने इतिहास रो-रोकर ही पढ़ा
हर पन्ने पर जो एक जंग दिख गई

#ukraine #war #peace

खुशी


खुश हो तो खुशी दिखना चाहिए
दिल से निकलकर चेहरे से टपकना चाहिए

हँसने के हर मौके को लपकना चाहिए
ठहाके की आवाज़ मंज़र में ठहरना चाहिए

कोई जादूगर नहीं जो मन की बात समझ ले
अहसास को अल्फ़ाज़ में बयां करना चाहिए

आये कोई मिलने तो उसे ये लगना चाहिये
ये आदमी हैं दिलचस्प इससे मिलते रहना चाहिए

वक़्त तो बदलेगा उसे बदलना चाहिए
ये मुस्कान आपके हौठो पर हमेशा ठहरना चाहिए

और कोई मक़सद नही मेरा कुछ लिखने का
बस आपका और हमारा याराना यूँही चलना चाहिए

जय माता दी


वेद-पुराण में तीन देवताओ का वर्णन विशेष रूप से मिलता हैं, जो इस पुरे ब्रह्माणं की कार्य प्रणाली को संचालित करते हैं, ये देवता हैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश। ब्रह्मा इस सम्पूर्ण ब्रह्माणं के रचियता हैं, विष्णु इस सृष्टि के संचालक या पालनहार हैं और महेश सृष्टि के रक्षक और संहारक है। यहाँ यह बात ध्यान रखना चाहिए कि संसार में जो भी उत्पन्न हुआ हैं वो कभी न कभी नष्ट भी होगा, इसलिए संहारक की भूमिका को नकारात्मक रूप में नहीं देखना चाहिए।

देखा जाये तो सृष्टि की रचना से लेकर जितने भी कार्य हैं, वो इन तीन देवताओ में ही विभाजित हैं, पर इन कार्यो को करने के लिए जिस विशिष्ट गुण की आवश्यकता हैं उनके प्रतीक ये देवता नहीं हैं। सृष्टि की रचना के लिए बुद्धि और ज्ञान की आवश्यकता होती हैं और इसलिए स्वयं ज्ञान और कौशल की देवी सरस्वती ब्रह्माजी के साथ विराजमान हैं। किसी भी व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए संसाधन की आवश्यकता होती हैं, और इसीलिए सृष्टि के संचालक श्री हरी विष्णु जी साथ स्वयं धन-धान्य और सभी प्रकार के संसाधन की देवी लक्ष्मीजी विराजमान हैं। रक्षा हो या संहार, ये कार्य बिना शक्ति, साहस और सामर्थ्य के नहीं किये जा सकते हैं, शायद इसीलिए स्वयं आदिशक्ति माँ पार्वती भोलेनाथ के साथ विराजमान हैं।

तीनो लोको के स्वामी सर्वशक्तिमान भोलेनाथ को जीवन में आदिशक्ति की आवश्यकता क्यों हैं, चतुर-स्मार्ट श्री हरी विष्णु को माता लक्ष्मी का साथ क्यों चाहिए ? मैं नहीं जानता ऐसा क्यों हैं, जिस सर्वशक्तिमान ईश्वर की छवि वेद-पुराण ब्रम्हा-विष्णु-महेश के रूप में गढ़ते हैं, उनके साथ इन गुणों के लिए देवियो को क्यों विराजा गया। क्या ये त्रिदेव इन गुणों या कौशल से परिपूर्ण नहीं हैं? शायद सनातन धर्म ये बताना चाहता था कि पुरूष कितना भी शक्तिशाली क्यों ना हो, वो कोई भी कार्य बिना महिला के नहीं कर सकता हैं। संसार के सभी प्राणियों को इन गुणों को प्राप्त करने के लिए स्त्री की आवश्यकता होगी। विश्व में शायद ही ऐसा कोई धर्म होगा जिसने स्त्री की महत्ता इतने रचनात्मक रूप में सिखाई होगी, शायद ही ऐसा धर्म होगा जिसने ईश्वर को अकेला नहीं वरन पुरुष और महिला के संयोजन में दिखाया।

स्त्रीयो को उपभोग या शारीरिक सुंदरता के मापदंड पर तौलने वाले समाज को शायद ये जानकार आश्चर्य होगा कि वेद-पुराण में देवियो का वर्णन अपने विशिष्ट गुणों से ही होता हैं। देवियो के रंग-रूप पर टिप्पणी भी उनके कर्म और गुणों के आधार पर ही की गई हैं। देवी लक्ष्मी धन-धान्य और सुख-सम्पदा को दर्शाती हैं, स्वाभाविक सी बात हैं जो सुख-संपन्न और संसाधन से परिपूर्ण होगा वो सुन्दर ही होगा, इसीलिए लक्ष्मीजी को हमेशा गौरांगी और सुन्दर बताया गया हैं। सरस्वती ज्ञान और बुद्धि की देवी हैं और जो ज्ञान-बुद्धि से परिपूर्ण होगा वो ओजस्वी होगा, इसीलिए सरस्वतीजी का वर्णन ओजस्वी, शांत-चित्त और सौम्य रूप में किया गया हैं। माँ काली शक्ति का प्रतीक हैं, इस संसार की राक्षसों से रक्षा करती हैं। जो साहसी होगा, युद्ध भूमि में रहेगा और निरंतर शारीरिक कार्य करेगा, उसका रंग सावला ही होगा, इसीलिए माँ काली का रंग-रूप काला या नीला बताया गया हैं और उनका स्वरुप भयानक बताया गया हैं।

नवरात्र का ये उत्सव की कल्पना इसलिए की गई कि ये समाज स्त्री की महत्ता समझे। शारीरिक रंगरूप, काम-लोभ के स्थान पर शक्ति-ज्ञान और संसाधन की आराधना करे। नवरात्र का ये पर्व जीवन का सन्देश हैं कि जब तक प्राणियों में शक्ति-ज्ञान और संसाधन के प्रति आस्था का भाव हैं, तब तक ही जीवन संभव हैं। और इन्हे प्राप्त करने के लिए भक्ति-भाव से माँ के चरणों में नतमस्तक होकर आराधना करनी ही होगी।

जय माता दी

अभिनय की चाय


बात ज्यादा पुरानी नहीं हैं, यही कोई जनवरी का महीना था |  मैं चाय बना रहा था और टीवी पर बालीवुड के अभिनेताओ की तुलना करते हुए कोई कार्यक्रम चल रहा था | वो अभिनेताओ को १, २, ३ ऐसे क्रम में बाँट रहे थे | खैर मुझे तो किसी भी कला में नाम कमा रहे लोगो में किसी को पहले नंबर पर रखना, किसी को दुसरे नंबर पर रखना कभी भी पसंद नहीं हैं, क्योकि मैं समझता हूँ कि कला एक साधना हैं कोई प्रतियोगिता नहीं | पर टीवी पर चल रही उस बहस ने मुझे एक कमाल का तुलनात्मक अध्ययन करने को प्रेरित किया | मैंने चाय बनाते हुए अभी के समय में लोकप्रिय ५ अभिनेताओ के अभिनय पर बारीकी से सोचा और ये रोचक निष्कर्ष निकाला –

  • सलमान खान – आप उन्हें पसंद करे या ना करे, पर निस्संदेह वो अभी के समय के सबसे बड़े स्टार हैं | एक अभिनेता के तौर पर लोकप्रिय बनाने वाला हर रसायन उनके व्यक्तित्व में मौजूद हैं | उनका अभिनय चाय की खुशबु के सामान हैं | आप चाहे जितना भी पानी डाले, दूध मिलाये, शक्कर और पत्ती से उकाले पर अंत में पीने वाले का मन तो उस चाय की खुशबु से ही भर जाना हैं | और लोग उस खुशबू के इतने दीवाने हैं कि वो सोचते ही नहीं कि चाय का रंग कैसा हैं, स्वाद कैसा हैं | उन्हें तो बस खुशबू का आनंद लेना हैं और उसी में खो जाना हैं |
  • शाहरुख़ खान – शाहरुख़ खान का अभिनय चाय को आँच पर रखकर दी जाने वाली उकाली जैसा हैं | एक अभिनेता के तौर पर उनकी मौजूदगी इस बात का प्रमाण हैं कि फिल्म रूपी चाय बहुत उकलने वाली हैं | और इतना उकलने के बाद जब दर्शक इस चाय को पीता हैं तो उसे एकदम गहरे रंग की कड़क और झन्नाटेदार चाय का अहसास होता हैं | असल में शाहरुख़ के अभिनय में तीव्रता इतनी अधिक हैं कि फिल्म की दूसरी बाते बहुत पीछे छुट जाती हैं और दर्शक महसूस करते हैं तो उनके द्वारा निभाया गया किरदार | फिर चाहे वो डर/बाज़ीगर का सरफिरा आशिक हो या डीडीएलजे/कुछ कुछ होता हैं का बिंदास प्रेमी, कोच कबीर खान हो या मेजर राम…हर किरदार इतना उकाली लिया हुआ प्रतीत होता हैं कि देखने वाले को बस शाहरुख़ और शाहरुख़ ही याद रहते हैं |
  • आमिर खान – आमिर खान का अभिनय तौल-मौल कर बनायीं गयी उस चाय के जैसा हैं जिसमे सब कुछ बराबर हैं | चाय, शक्कर, दूध, पानी, अदरक और आँच – सब कुछ बराबर मात्रा में मिलाने के बाद जब इस चाय को कोई पीता हैं तो उसे संपूर्ण चाय का अहसास होता हैं | चाय का रंग, कड़कपन, मिठास, गर्माहट सब कुछ एकदम परफेक्ट लगता हैं | एक अभिनेता के तौर पर आमिर अपने आप को तो बहुत पीछे छोड़ देते हैं और कहानी में पूरी तरह रमे दिखाई देते हैं | इसीलिए तो फिल्म देखने के बाद लोगो को याद रहती हैं तो एक कहानी और उससे जुड़ा हर एक किरदार, ना कि आमिर खान | आप देख लीजिये कभी भी लगान, थ्री इडीयट, जो जीता वही सिकंदर या पीके, ये अपने आप में इतनी सम्पूर्णता वाली फिल्मे हैं कि आपको इनसे जुड़े हर एक किरदार, हर एक छोटी सी छोटी बातो से प्यार हो जाता हैं |
  • अक्षय कुमार – अक्षय कुमार का अभिनय पत्ती जैसा हैं | दूध चाहे जितना भी पड़े, पानी कितना भी मिले, शकर हो या ना हो और आँच बराबर लगे या ना लगे, रंग तो पत्ती को ही जमाना हैं | और अगर दूध, पानी और आँच भी बराबर मिल जाये तो इस चाय के क्या कहने | एक अभिनेता के तौर पर अक्षय कुमार में सब कुछ हैं, चालाकी भी तो मासूमियत भी, पौरुषता हैं तो भावुकता भी, अल्हड़ता हैं तो परिपक्वता भी | हर एक किरदार में अक्षय कुमार अपना एक अलग रंग दिखाते हैं और अपनी ऊर्जावान व्यक्तित्व से प्रभावित करते हैं | इसीलिए तो कुछ बेसिर-पैर की फिल्मो में भी अक्षय कुमार गज़ब का रंग जमाते हैं | और जब उन्हें अच्छी पटकथा और निर्देशन मिले तो वो इतना कमाल कर जाते हैं कि हर कोई यही बोलता हैं कि ये किरदार अगर अक्षय कुमार के अलावा के अलावा किसी और ने किया होता तो शायद वो मजा नहीं आता |
  • अजय देवगन – साधारण से दिखने वाले इस अभिनेता का अभिनय अदरक जैसा हैं, जिसे गली-मोहल्ले के कोने में मिट्टी से उखाड़ लिया हो और कूटकर चाय में उकाल दिया हो | और जब इस चाय को कोई पीता हैं तो चाय कि चुस्कियो के साथ गले में वो गज़ब का अहसास होता हैं कि हर कोई उस अदरक का कायल हो जाता हैं | अजय देवगन की खलिश भरी आवाज़ और समंदर से गहरी आँखे गज़ब का प्रभाव उत्पन्न करती हैं | इसीलिए तो ऐश्वर्या राय और सलमान खान की मौजूदगी से सजी रंग-रंगीली फिल्म “हम दिल दे चुके सनम” देखकर निकले दर्शको को कुछ याद नहीं रहता सिवाय अजय देवगन के भाव-प्रणय अभिनय के | गंगाज़ल देखकर निकले दर्शक अपने अन्दर भ्रष्टाचार और अराजकता के प्रति गज़ब का गुस्सा महसूस करते हैं और हाल ही में दृश्यम देखने के बाद तो अजय देवगन हमको भी रटवा कर ही मानते हैं – २ अक्तूबर को हम पणजी गये थे नित्यानंद जी के प्रवचन सुनने |

खैर मेरी चाय तो इस ख्याल के साथ ही पक चुकी थी | आप भी आनंद लीजियेगा इस चाय का और बताइयेगा कि कैसी लगी ये पेशकश |