अभिनय की चाय


बात ज्यादा पुरानी नहीं हैं, यही कोई जनवरी का महीना था |  मैं चाय बना रहा था और टीवी पर बालीवुड के अभिनेताओ की तुलना करते हुए कोई कार्यक्रम चल रहा था | वो अभिनेताओ को १, २, ३ ऐसे क्रम में बाँट रहे थे | खैर मुझे तो किसी भी कला में नाम कमा रहे लोगो में किसी को पहले नंबर पर रखना, किसी को दुसरे नंबर पर रखना कभी भी पसंद नहीं हैं, क्योकि मैं समझता हूँ कि कला एक साधना हैं कोई प्रतियोगिता नहीं | पर टीवी पर चल रही उस बहस ने मुझे एक कमाल का तुलनात्मक अध्ययन करने को प्रेरित किया | मैंने चाय बनाते हुए अभी के समय में लोकप्रिय ५ अभिनेताओ के अभिनय पर बारीकी से सोचा और ये रोचक निष्कर्ष निकाला –

  • सलमान खान – आप उन्हें पसंद करे या ना करे, पर निस्संदेह वो अभी के समय के सबसे बड़े स्टार हैं | एक अभिनेता के तौर पर लोकप्रिय बनाने वाला हर रसायन उनके व्यक्तित्व में मौजूद हैं | उनका अभिनय चाय की खुशबु के सामान हैं | आप चाहे जितना भी पानी डाले, दूध मिलाये, शक्कर और पत्ती से उकाले पर अंत में पीने वाले का मन तो उस चाय की खुशबु से ही भर जाना हैं | और लोग उस खुशबू के इतने दीवाने हैं कि वो सोचते ही नहीं कि चाय का रंग कैसा हैं, स्वाद कैसा हैं | उन्हें तो बस खुशबू का आनंद लेना हैं और उसी में खो जाना हैं |
  • शाहरुख़ खान – शाहरुख़ खान का अभिनय चाय को आँच पर रखकर दी जाने वाली उकाली जैसा हैं | एक अभिनेता के तौर पर उनकी मौजूदगी इस बात का प्रमाण हैं कि फिल्म रूपी चाय बहुत उकलने वाली हैं | और इतना उकलने के बाद जब दर्शक इस चाय को पीता हैं तो उसे एकदम गहरे रंग की कड़क और झन्नाटेदार चाय का अहसास होता हैं | असल में शाहरुख़ के अभिनय में तीव्रता इतनी अधिक हैं कि फिल्म की दूसरी बाते बहुत पीछे छुट जाती हैं और दर्शक महसूस करते हैं तो उनके द्वारा निभाया गया किरदार | फिर चाहे वो डर/बाज़ीगर का सरफिरा आशिक हो या डीडीएलजे/कुछ कुछ होता हैं का बिंदास प्रेमी, कोच कबीर खान हो या मेजर राम…हर किरदार इतना उकाली लिया हुआ प्रतीत होता हैं कि देखने वाले को बस शाहरुख़ और शाहरुख़ ही याद रहते हैं |
  • आमिर खान – आमिर खान का अभिनय तौल-मौल कर बनायीं गयी उस चाय के जैसा हैं जिसमे सब कुछ बराबर हैं | चाय, शक्कर, दूध, पानी, अदरक और आँच – सब कुछ बराबर मात्रा में मिलाने के बाद जब इस चाय को कोई पीता हैं तो उसे संपूर्ण चाय का अहसास होता हैं | चाय का रंग, कड़कपन, मिठास, गर्माहट सब कुछ एकदम परफेक्ट लगता हैं | एक अभिनेता के तौर पर आमिर अपने आप को तो बहुत पीछे छोड़ देते हैं और कहानी में पूरी तरह रमे दिखाई देते हैं | इसीलिए तो फिल्म देखने के बाद लोगो को याद रहती हैं तो एक कहानी और उससे जुड़ा हर एक किरदार, ना कि आमिर खान | आप देख लीजिये कभी भी लगान, थ्री इडीयट, जो जीता वही सिकंदर या पीके, ये अपने आप में इतनी सम्पूर्णता वाली फिल्मे हैं कि आपको इनसे जुड़े हर एक किरदार, हर एक छोटी सी छोटी बातो से प्यार हो जाता हैं |
  • अक्षय कुमार – अक्षय कुमार का अभिनय पत्ती जैसा हैं | दूध चाहे जितना भी पड़े, पानी कितना भी मिले, शकर हो या ना हो और आँच बराबर लगे या ना लगे, रंग तो पत्ती को ही जमाना हैं | और अगर दूध, पानी और आँच भी बराबर मिल जाये तो इस चाय के क्या कहने | एक अभिनेता के तौर पर अक्षय कुमार में सब कुछ हैं, चालाकी भी तो मासूमियत भी, पौरुषता हैं तो भावुकता भी, अल्हड़ता हैं तो परिपक्वता भी | हर एक किरदार में अक्षय कुमार अपना एक अलग रंग दिखाते हैं और अपनी ऊर्जावान व्यक्तित्व से प्रभावित करते हैं | इसीलिए तो कुछ बेसिर-पैर की फिल्मो में भी अक्षय कुमार गज़ब का रंग जमाते हैं | और जब उन्हें अच्छी पटकथा और निर्देशन मिले तो वो इतना कमाल कर जाते हैं कि हर कोई यही बोलता हैं कि ये किरदार अगर अक्षय कुमार के अलावा के अलावा किसी और ने किया होता तो शायद वो मजा नहीं आता |
  • अजय देवगन – साधारण से दिखने वाले इस अभिनेता का अभिनय अदरक जैसा हैं, जिसे गली-मोहल्ले के कोने में मिट्टी से उखाड़ लिया हो और कूटकर चाय में उकाल दिया हो | और जब इस चाय को कोई पीता हैं तो चाय कि चुस्कियो के साथ गले में वो गज़ब का अहसास होता हैं कि हर कोई उस अदरक का कायल हो जाता हैं | अजय देवगन की खलिश भरी आवाज़ और समंदर से गहरी आँखे गज़ब का प्रभाव उत्पन्न करती हैं | इसीलिए तो ऐश्वर्या राय और सलमान खान की मौजूदगी से सजी रंग-रंगीली फिल्म “हम दिल दे चुके सनम” देखकर निकले दर्शको को कुछ याद नहीं रहता सिवाय अजय देवगन के भाव-प्रणय अभिनय के | गंगाज़ल देखकर निकले दर्शक अपने अन्दर भ्रष्टाचार और अराजकता के प्रति गज़ब का गुस्सा महसूस करते हैं और हाल ही में दृश्यम देखने के बाद तो अजय देवगन हमको भी रटवा कर ही मानते हैं – २ अक्तूबर को हम पणजी गये थे नित्यानंद जी के प्रवचन सुनने |

खैर मेरी चाय तो इस ख्याल के साथ ही पक चुकी थी | आप भी आनंद लीजियेगा इस चाय का और बताइयेगा कि कैसी लगी ये पेशकश |

 

लघु कथा – आजकल तो बस फौग चल रहा हैं !


यू तो मध्य भारत का इंदौर शहर शुष्क स्थानों की गिनती में आता हैं, पर नवम्बर से जनवरी के बीच यहाँ भी अच्छी खासी ठण्ड का असर देखने को मिलता हैं | दिसम्बर के आखिरी दिनों में तो ये बिलकुल शिमला बन जाता हैं | गजब का कोहरा और सर्दी के आगोश में हर कोई ठिठुर जाता हैं | उस दिन भी कुछ ऐसा ही माहौल था, मुझे कुछ काम से सुबह ७ बजे ही शहर से बाहर जाना था | सुबह इतनी जल्दी उठकर नहाना और मोपेड चलाकर बस स्टेशन पहुचना ही बहुत दुष्कर कार्य था, पर मुझे तो अपनी सरकारी नौकरी का कर्तव्य पूर्ण करना ही था | सुबह उठने और नहाने में जरुर थोड़ी मुश्किल आई, पर बस में बैठकर बाहर का दृष्य देखा तो लगा कि प्रकृति के इस रूप को देखने के लिए इतना करना तो बनता हैं | पुरे साल में केवल २ या ४ दिन ही होते हैं जब शहर में इतना घना कोहरा होता हैं | बस में खिड़की वाली सीट पर बैठकर तो जैसे मन की मुराद पूरी हो गयी | बस में दूसरी सवारी बैठ रही थी कि मेरे पास वाली सीट पर मेरे सहकर्मी मिश्रा जी आकर बैठ गए | वो भी बेचारे मेरी ही तरह इतनी सर्दी में अपनी नौकरी करने जा रहे थे | बस ने शहर की सीमा को पार किया और खिड़की के बाहर का नजारा तो और भी मनोरम होने लगा | हरे भरे पेड़-पौधों और खेतो पर जैसे किसी ने सफ़ेद चादर औढ़ा दी हो | जाने क्यों नींद के चक्कर में प्रकृति के इस रूप को देखने से मैं इतने दिनों तक वंचित रहा |

मैं खिड़की से प्रकृति के इन व्यंजनों का रसस्वादन करने में व्यस्त था की मिश्रा जी की आवाज़ ने मुझे ये अनुभुति कराई कि मैं बस में बैठा हु | मिश्राजी ने जेब से नया स्मार्ट फ़ोन निकाला और मुझे दिखाने लगे | “ये देखिये जी, नया स्मार्ट फ़ोन १३ मेगा-पिक्सेल कैमरे के साथ…पुराना ८ मेगापिक्सेल था अब १३ ले लिया ” | वैसे तो आजकल किसी के पास बढ़िया क्वालिटी का स्मार्ट फ़ोन होना कोई अचरज की बात नहीं हैं पर फिर भी मैं मिश्राजी का मन रखने के लिए उनका फ़ोन देखकर बधाई देने लगा | “ये देखिये व्हाटसैप फेसबुक सब चलता हैं इसमें” | वो मुझे फ़ोन की कार्य प्रणाली के बारे में बताने लगे | मैंने ध्यान से उन्हें सुना और फिर से प्रकृति की और रुख करने के लिए मिश्राजी से कहा – देखिये ना कितनी सर्दी हैं…फोग भी कितना हैं बाहर” | मैं इतना बोलकर फिर से बाहर का नज़ारा देखने ही लगा था कि मिश्राजी तपाक से बोले – “अरे इस पर भी एक बढ़िया जोक आया था व्हाटसेप पर – पत्रकारों ने मोदी जी से पूछा कि काले धन लाने की बात पर क्या चल रहा हैं ? तो मोदीजी बोले – आजकल तो बस फोग चल रहा हैं|” ये जोक ना जाने कितने रूपों में अलग ग्रुप से कई बार मेरे फ़ोन पर आ चुका था पर फिर भी मिश्राजी का मन रखने के लिए मैं मुस्कुरा दिया | इतने अच्छे और असली फोग वाले मौसम को देखने की बजाय फोग पर ऐसे उल-जलूल जोक सुनना मुझे कतई अच्छा विचार नहीं लगा | और मैं फिर से बाहर देखने लगा | पर मिश्राजी इतने में नहीं मानने वाले थे – “ये देखिये इस बन्दर का कितना अच्छा विडियो शेयर किया हैं व्हात्सप्प पर” इतना बोलकर वो मुझे बन्दर का विडियो दिखाने लगे जिसमे बन्दर पेड़ पर कूदा-फांदी कर रहा था | संयोग की बात हैं कि बस किसी गाँव से निकल रही थी और खिड़की से हमें भी कुछ बन्दर दिखाई दिए | मैंने मिश्राजी का ध्यान बाहर के बंदरो की तरफ करने की कोशिश की तो कहने लगे कि ये बन्दर वाला विडियो भारत का नहीं बल्कि अमेरिका का हैं | अब मुझे पता नहीं कि अमेरिका में भी बन्दर पाये जाते हैं कि नहीं, पर मिश्राजी को बन्दर के उस रिकार्डेड विडियो के स्थान पर लाइव प्रसारण देखना कतई मंजूर नहीं था | वो तो विडियो देखकर ऐसे ठहाके लगा रहे थे कि जैसे बंदरो की ऐसी हरकत पहली बार देखी हो | “ये देखिये मेरा एक दोस्त हैं – जहाँ जाता हैं वहाँ की मस्त फोटो फसबुक पर डालता हैं..अभी पिछले हफ्ते ही देहरादून होकर आया, वहाँ के प्राकृतिक द्रश्य के कितने अच्छे फोटो डाले हैं फेसबुक पर…देखिये जरा|” निस्संदेह देहरादून एक बहुत खुबसूरत शहर हैं और फोटो भी बहुत अच्छे थे, पर प्रकृति को 5 इंच में देखने की तुलना में आँखों की पलकों से क्षितिज तक देखना कही अधिक मनोहारी लगता हैं | और तो और, आज तो अपने क्षेत्र में ऐसा मौसम हैं कि वो किसी हिल स्टेशन से कम नहीं लग रहा हैं | पर मिश्राजी को ये कतई मंजूर नहीं था, वो तो मुझे अपने दोस्त की फेसबुक प्रोफाइल पर शेयर किये हुए पुरे 46 फोटो दिखाकर ही माने |

मिश्राजी मेरे संकोच का पूरा फायदा उठा रहे थे | एक-एक करके व्हात्सप्प-फेसबुक पर आये हुए चुटकुले, सन्देश, फोटो और विडियो मुझे दिखाने लगे | खुद ही दिखाते और खुद ही सबसे ज्यादा खुश होते | मुझे भी उनका साथ देने के लिए फालतू में ही मुस्कुराना पड़ रहा था | पुरे 2 घंटे के रस्ते में फ़ोन से नज़रे उठाकर एक बार भी इतने अच्छे मौसम को निहारना उन्हें अच्छा नहीं लगा | इतना अच्छा फोग, बन्दर और प्राकृतिक द्रश्य – सब कुछ तो बस की खिड़की से नज़र आ रहा था पर मिश्राजी को तो फोग वाले चुटकुले, बन्दर वाले विडियो और प्राकृतिक दृश्य वाली इमेजेस दिखाने की धुन लग गयी थी | खैर पुरे 24 चुटकुले, 61 चित्र, 18 सन्देश और 5 विडियो दिखाने के बाद जब हम अपने गंतव्य पर पहुचे तो दिल मिश्राजी से बस एक ही बात बोलना चाह रहा था – “मिश्राजी व्हात्सप्प-फेसबुक हमारे फ़ोन में भी चलता हैं और दोस्त हमारे भी हैं…इसलिए अब आगे से किसी को अपना फोन दिखाकर ऐसा बोर मत किया करो” |

ये दुनिया बहुत रंगीली हैं !


ये आसमान बहुत ऊचा हैं
ये धरती भी बहुत बड़ी हैं
तू आकर तो देख जरा
ये दुनिया बहुत रंगीली हैं !

सूंड वाला हाथी हैं
धारी वाली गिलहरी हैं !
फूल हैं खुशबु वाले
और हरी भरी तरकारी हैं !
आम हैं रसीला पर
खट्टी मीठी इमली हैं !
कौआ हैं काला कितना पर
रंगबिरंगी तितली हैं !
तू आकर तो देख जरा
कितनी खुबसूरत अपनी ये प्रकृति हैं !

आकाश में उड़ता कैसे कोई पंछी हैं
पानी में कैसे तैरती मछली हैं !
कैसे बादलो से बुँदे निकली हैं
और कैसे जलती ये माचिस की तीली हैं !
क्यों रेगिस्तान हैं सूखा और नदियाँ गीली हैं
क्यों पहाड़ हैं खड़ा और खाई गहरी हैं !
मूछ वाले हैं काका क्यों और
साड़ी वाली कैसे काकी हैं !
तू आकर तो सुलझा जरा
इस दुनिया में कितनी पहेली हैं !

सुबह हैं चमकीली और
शाम सुनहरी हैं !
दिन हैं उजालो वाला
पर रात अंधियारी हैं!
बारिश में निकलता छाता यहाँ
और सर्दियों में स्वेटर पहनना जरुरी हैं !
गर्मी कटे कैसे बिन कूलर के
हर मौसम की अपनी तैयारी हैं !
तू आकर तो देख जरा
हर दिन की यहाँ निराली कहानी हैं !

बादलो का हैं दोस्त तू
या सितारों की तू सहेली हैं !
आयेगा युवराज बनकर
या परी देस की शाहज़ादी हैं !
सूरत हैं कैसी तेरी
और किसने तेरी नज़र उतारी हैं !
पहचानेगा तू कैसे हमको
क्या तुझको हमारी जानकारी हैं !
तू आकर तो बता जरा
इस बात की बड़ी बेकरारी हैं !

ये आसमान बहुत ऊचा हैं
ये धरती भी बहुत बड़ी हैं
तू आकर तो देख जरा
ये दुनिया बहुत रंगीली हैं !

“बरामदे की धूप” available in book format


bkd_back_pagebkd front pageIts an year and so, I haven’t update anything in blog. But good news is that I was trying to publish the content of blog in the form of book…and result is fruitful. All the poems of this blog are available in the form of book and e-book.You can buy it from online websites.

Hope all my readers love this sunshine of gallery.

And yes…this year I will be active…promise.

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बरसो हुए


कल वाले दिन अब परसों हुए
उस जुनू को जिये बरसो हुए

दिन कटता था जिसके दीदार में
उस इश्क़ को किये बरसो हुए

वो भी क्या दिन थे
लगता हैं सब कल परसों हुए

हाथो में हाथ हसीना का साथ
उसे बाँहों में भरे बरसो हुए

जिस मंज़र से की थी इस क़दर चाहत हमने
उस गली से गुजरे बरसो हुए

याद करता हैं वो चौक का चौकीदार हमें
इस मोहल्ले में चोरी हुए बरसो हुए

“ठाकुर” आ जाओ तुम फिर से अपने रंग में
कि तुम्हे भी किसी का दिल चुराये बरसो हुए

आशिकों कि ज़मात में एक तुम्हारा भी नाम हो
जो मिटाए ना मिटे फिर कितने भी बरसो हुए

चंडी


मुझे नहीं पता कि उसके दर्द की सीमा क्या हैं | हर रोज उसका पति रात को शराब पीकर आता और उसके साथ बुरा व्यवहार करता | उसे गन्दी-गन्दी गालियाँ देता, उसके साथ मारपीट करता, और वो पत्थर के बुत की तरह हर अत्याचार सहन करती | ये सब कुछ सहन करते हुए उसे पांच वर्ष हो गये, पर इन पांच वर्षो में ना उसने कभी पति का साथ छोड़ा और ना कभी किसी से कोई शिकायत की | हाँ, गली-मोहल्ले की औरतो के सामने अपनी किस्मत का रोना वो जरूर रोती रहती थी | भगवान ने दर्द सहने की शक्ति औरतो को मर्दों से ज्यादा दी हैं, पर इतनी ज्यादा दी हैं कि वो हर अत्याचार चुपचाप सहन करती रहे ये मैं नहीं जानता था | पुराने लोग ये भी कहते हैं कि हर औरत के दौ रूप होते हैं, एक सती सावित्री की तरह प्यार लुटाने वाले और दूसरा चंडी की तरह संहार करने वाला | मैं उसका सती सावित्री वाला रूप तो देख चूका था और अब मुझे इंतजार था की कभी तो ये सावित्री इस अत्याचार से तंग आकर चंडी का रूप लेगी | पर मेरा ये इंतज़ार कभी पूरा होने वाला नहीं लगता था और उसके साथ ये सब होते देखना मेरे लिए आम बात हो चुकी थी |

उस दिन उसके घर से दोपहर में ही कुछ लड़ने की आवाज़े आ रही थी | इन आवाजो में उसकी तीव्र गर्ज़ना शामिल थी, पर उसके पति की आवाज़ पूरी तरह से गायब थी | मुझे लगा आज ये सती-सावित्री चंडी का रूप ले चुकी हैं और अपने पति को सबक सीखा रही हैं | अत्याचारी पुरुष समाज को दंड मिलते देखने की उम्मीद से मैं तुरंत अपने घर से निकला और उसकी गली में पहुचा | उसके घर के सामने काफी भीड़ थी | उस भीड़ को हटाते हुए जब मेने उसे देखा तो हमेशा के विपरीत वो आज बहुत गुस्से में दिख रही थी | उसके बाल खुले हुए थे और अपने पति से सीखी गालिया आज वो सुना रही थी | उसके हाथ में एक डंडा था, जिससे वो उस जैसी ही एक औरत को बेतहाशा पीटे जा रही थी | ये देखकर मुझे आश्चर्य हुआ की इस मौके पर उसका पति मौजूद ही नहीं था | आसपास के लोगो से पता चला की वो कोने के मकान में रहने वाली विमला हैं, जिसे वो इस तरह पीट रही थी | कल रात उसने विमला को अपने पति के साथ देख लिया | वैसे आस-पडोस की औरते हमेशा उसके पति और विमला के किस्से उसे सुनाती रहती, पर कल रात के वाकये से उसे उनकी बातो पर पूरा विश्वास हो गया | आज पति के जाने के बाद उसने सीधे विमला को बुलाया और उससे जवाब-तलब किया | बातो-बातो में बात बढ़ गयी और उसने गुस्से में आकर विमला को पीटना शुरू कर दिया | गली की कुछ बुजुर्ग औरतो ने दोनों को अलग किया और मामले को रफा-दफा किया, पर तब तक वो विमला को अच्छा-खासा सबक सीखा चुकी थी |

रात में उसका पति घर आया | उसने रोज की तरह फिर उससे मारपीट की और वो हमेशा की ही तरह सहन करती रही | मुझे समझ में नहीं आया कि दिन में अपने प्यार को बचाने के लिए चंडी का अवतार लेने वाली ये औरत अब मूक क्यों हैं | क्या उसका गुस्सा केवल औरतो के लिए था, आदमी के लिये बिलकुल नहीं | उस नाजायज सम्बन्ध में गलती केवल विमला की ही नहीं थी, बल्कि उसका पति भी बराबरी का हिस्सेदार था | तो फिर उसने सजा केवल विमला को ही क्यों दी ? क्या वो पूरी तरह से पुरुषो की गुलामी स्वीकार कर चुकी हैं | दिन में विमला ने पुरुष से रिश्ता रखने के लिए अत्याचार सहा और रात में उसने, पर वो पुरुष अभी भी अपने अत्याचारी होने के अहसास से भी अनजान था | समझ में नहीं आया कि औरत का असली दुश्मन कौन हैं, ये पुरुष समाज या वो खुद |

 

गीत : वो मंजिल मुझे मिलेगी जरूर …


आसमानों से आगे और क्षितिज से दूर,
वो मंजिल मुझे मिलेगी जरूर …
रब की होगी रजामंदी उसमे,
और किस्मत को भी होगी कुबूल !
वो मंजिल मुझे मिलेगी जरूर …

सामने हैं समंदर मेरे पर कश्ती हैं बहुत दूर
लहरों की गुजारिश हैं संग खेलना हैं जरूर !
लगने दे डर थोडा, होने दे थोड़ी भूल
सैलाबों से लड़ना हैं तो हिम्मत भी दिखानी होगी जरूर !
कश्तियो सी डोलती और किनारों से दूर
वो मंजिल मुझे मिलेगी जरूर …

बचपन में सुनी थी एक कहानी मशहूर
जो रखता हैं धीरज वही जाता हैं दूर !
फूल तो मुरझाकर हो जाता हैं चूर
पर ये खुशबू उसकी हो जाती हैं मशहूर !
उस फूल सी कोमल और खुशबू से भरपूर
वो मंजिल मुझे मिलेगी जरूर …

पानी की खोज में गड्डा खोद रहा एक मजदूर
मिट्टी के ढेलो से पता पूछ रहा एक मजदूर !
जो मिल जायेगा पानी तो जी जायेगा ये मजदूर
वरना अपनी कबर तो खोद रहा ही ये मजदूर !
उस पानी सी बेशकीमती और कब्र सी निष्ठूर
वो मंजिल मुझे मिलेगी जरूर….

वो मंजिल मुझे मिलेगी जरूर !
रब की होगी रजामंदी उसमे,
और किस्मत को भी होगी कुबूल !
वो मंजिल मुझे मिलेगी जरूर …

मुसाफिर


आसरा मिला मुझे तो आसमानों से
मुसाफिरों को क्या मोहब्बत मकानों से !

आ जायेंगे हम तेरे एक बुलाने से
कि नाराज ना हो हमारे चले जाने से !

बचपन से ही रहते हैं हम दीवानों से
आजाद, बेखबर दुनियादारी के ख्यालो से !

जो मिला नहीं हमें इस शहर की दुकानों से
वो पाया हैं हमने इन रास्तो के मुकामो से !

आवाज़ आती हैं मंदिर, मस्जिद और मयखानों से
कि होती हैं इबादत भी हुनर के आजमाने से !

‘ठाकुर’ सुना हैं हमने ये अपने कानो से
कि लिखते हो तुम भी ग़ज़ल मस्तानो से !

सुनाते रहना यु ही अपनी दास्ताँ अल्फाजो से
कि ढूंडेंगी दुनिया एक दिन तुम्हे तुम्हारे निशानों से !