शराब इतनी जरूरी तो नही !


गम में गला गीला हो जरुरी तो नहीं
ख़ुशी में हाथ में प्याला हो जरुरी तो नहीं !

शराब आदत ख़राब हैं, ये जीवन ख़राब ही करेगी
पर ये आदत ही जीने की जरूरत हो जरुरी तो नहीं !

चार दोस्त मिल जाये तो चाय पर भी बात हो सकती हैं
यूँ नशे में बहककर लड़खड़ाना जरुरी तो नहीं !

अरे वो मर्द ही क्या जो होशोहवास में मन की बात न कह सके
दिल हल्का करने के लिए जहर की जरूरत हो जरुरी तो नहीं !

हँसी तो ओकेसनली बोलने वालो पर आती हैं
कोई ओकेज़न हर दूसरे दिन हो जरुरी तो नहीं !

सरकार का काम हैं कमाना, कमाती रहेगी
पर उनकी कमाई के लिए खुद को क़त्ल करना जरुरी तो नहीं !

जरा पूछो उस बेसहारा बच्चें से जिसका बाप कहता था
शराब पीने से लिवर ख़राब ही हो जरुरी तो नहीं !

जरा पूछो उस दुखियारी माँ से जिसके बेटा कहता था
दो पेग लगाकर गाड़ी ना चला सको जरूरी तो नही !

जरा पूछो उस गरीब मज़दूर के परिवार से जो कहता था
देसी दारू पीकर मौत ही हो जाये जरूरी तो नही !

अरे नशा करना ही हैं तो इश्क़-इबादत-मेहनत का करो
यू अनमोल जीवन को मौत को सौपना जरूरी तो नही !

–अंकित सोलंकी, उज्जैन (मप्र)

व्यंग्य : शराब, शबाब, आसाराम और मुकुंदबिहारी


मैं शराब नहीं पीता पर शराबियो से मेरी पूरी सहानुभूति हैं | अक्सर समाज से सताये और दीन-दुनिया के प्रपंचो से प्रताड़ित व्यक्ति ही शराब पीता हैं | दिन भर का थका-हारा मानुस रात में यारो के साथ दौ जाम छलकाकर असीम सुकून पाता हैं | शराब अन्दर जाते ही सारे दुःख-दर्द एक-एक करके बाहर निकलते हैं, और शराबी पूरी ईमानदारी और सच्चाई से अपनी दिल की बात बयाँ करता हैं | यही बात शराब की मुझे सबसे अच्छी लगती है की वो आदमी के शरीर को टाइट और दिल को लाइट कर देती हैं |हिन्दू धर्म में तो इसे काल-भैरव का प्रसाद माना गया हैं | शराब वैसे तो कभी भी पी जा सकती हैं, पर किसी खास मौके पर (विशेषकर गम के मौके पर ) दोस्तों के साथ मिलकर शराब पीने का अलग ही मजा हैं | जैसे दोस्त की नौकरी लगने पर, दोस्त की गर्ल-फ्रेण्ड की किसी और के साथ शादी होने पर, बीबी के मायके चले जाने पर, नौकरी में अप्रेसल ना मिलने पर, पुराने दोस्तों से मिलने पर या बचपन के सपने टूटने पर | शराब व्यक्ति को एक अलग ही मूड में या यु कहे अलग ही मौसम में ले जाती हैं | एक शराबी आपका रोहित शेट्टी की फिल्मो से ज्यादा मनोरंजन कर सकता हैं |शराबी लोगो का प्यार भी निश्छल और सच्चा होता हैं, यकीन ना हो तो आशिकी-२ या राकस्टार फिल्मे देख लीजिये | और अगर आप पुराने ज़माने के हैं तो अमिताभ की शराबी देख लीजिये | शराब का महिमामंडन हर काल, हर युग में हुआ हैं | हरिवंश रॉय बच्चन ने तो बाकायदा पूरा काव्य खंड ‘मधुशाला’ इसी शराब पर रचा हैं | ग़ज़ल गायक पंकज उधास साहब भी बोतल-चखना लेकर पूरी तैयार्री के साथ ही गाने बैठते थे, अपनी ज़िन्दगी की ५० प्रतिशत गज़ले उन्होंने शराब पर ही गाई हैं | हमारी तो सरकारे भी शराब के दम पर चल रही हैं | आपको ये जानकर ताज्जुब होगा कि हमारी सरकार को लोगो के इनकम टेक्स से इतना पैसा नहीं मिलता हैं, जितना शराब के लायसेन्स बेचकर और शराब की बिक्री पर कर लगाकर | मुझे तो लगता हैं पोलिस को शराब पीलाकर ही मुजरिमों का इन्टेरोगेट करना चाहिए, मुजरिम बिना किसी थर्ड डिग्री टार्चर के प्यार-मुहब्बत में ही अपने सारे गुनाह बता देगा | हालाँकि इन्टेरोगेशन का ये तरीका काफी महंगा होगा, पर सफलता की ग्यारंटी शत प्रतिशत हैं |

अब आप ये सोच रहे होंगे कि मुझ जैसे नॉन-अल्कोहलिक और वेजिटेरियन आदमी आज एकदम से शराब का गुणगान क्यों करने लगा हैं | तो साहब हुआ यु कि कल हमारे अजीज दोस्त ‘मुकुंद बिहारी’ का फ़ोन आया और उन्होंने हमें ‘लाइट-हार्ट बार’ में मिलने के लिए बुलाया | अब मुकुंद बिहारी का चैप्टर शुरू करने से पहले मुझे जरा उसकी हिस्ट्री सुनानी होगी | मुकुंद बिहारी ने हमारे स्कूल में नौवी कक्षा में एडमिशन लिया था | वो आठवी तक अपने गाँव के स्कूल में पढ़ा था और फिर शहर आया था | गाँव से आने वाले हर व्यक्ति की तरह वो भी बहुत सीधा-सादा और भोला-भाला था, जिसके शहरी छात्रो ने क्लास में बहुत मजे लिए | वैसे तो उसकी हिट के कई किस्से हैं, पर उनमे कुछ प्रमुख आपको सुनाये देता हु | कक्षा में अपने आप को इंट्रोडुएस करते हुए उसने कहा था की मैं 8th से जस्ट 9th में आ गया (बेचारे को कहना था की में आठवी गाँव में पास करके नौवी में शहर आ गया) | एक बार विज्ञान के पेपर में प्रश्न आया की ट्रेन की दौ पटरियों को जोड़ते वक़्त उनके बीच कुछ खाली जगह क्यों छोड़ दी जाती हैं | ऊष्मा और ऊष्मा से धातुऔ में होने वाले एक्सपांशन के नियम से अनभिज्ञ बेचारे मुकुंद्बिहारी ने इसके उत्तर में लिखा था की ट्रेन आमने से भी आती हैं और सामने से भी | ट्रेन लेफ्ट से भी आती हैं और राइट से भी तो दोनों ट्रेन में टक्कर न हो जाये, इसलिए कुछ जगह खाली छोड़ दी जाती हैं | ताकि ड्राईवर खाली जगह देखकर ट्रेन रोक दे | जब वो शहर आया था तब आमिर खान का एक गाना भी बहुत प्रसिद्ध हुआ था – ‘आती क्या खंडाला’ | खंडाला नाम के किसी भी स्थान से अनभिज्ञ बेचारा मुकुंदबिहारी इस गाने को गाता था – “हाथी का आटा ला” | एक दिन क्लास में नए कपडे पहनकर आया तो सबने उससे कहा कि तू तो शोले पिक्चर का शाहरुख़ खान लग रहा हैं | उसने शोले पिक्चर नहीं देखी थी तो वो भी सबको काफी दिनों तक कहता रहा की क्लास में सभी मुझे शोले पिक्चर का शाहरुख़ खान बोलते हैं | वैसे ऐसा नहीं हैं की उसने हमेशा भोलेपन में ही ऐसे हादसे किये हैं | कभी-कभी जानबूझकर भी शरारत की हैं | जैसे एक बार प्राचार्य को छुट्टी के लिये लिखे जाने वाले प्रार्थना पत्र में उसने लिखा था कि सर मेरा चयन कौन बनेगा करोडपति में हो गया हैं | अमिताभ बच्चन ने फ़ोन करके खुद मुझे आमंत्रित किया हैं | अब ऐसे अवसर को मैं स्कूल की बोरिंग क्लास के लिये कैसे छोड़ सकता हु, अतः मुझे तीन दिन का अवकाश देने की कृपा करे ( और मेरे वापस लौटने पर मेरे सम्मान की भी व्यवस्था करे ) उसके इस प्रार्थना-पत्र को पूरी क्लास में पढ़कर सुनाया गया था |

खैर वो कितना भी सीधा-सादा था पर गणीत विषय में उसका गज़ब दिमाग चलता था | अंग्रेजी में जरूर कमज़ोर था पर अन्य विषयो पर उसकी अच्छी पकड़ थी, इसी कारण से उसे इंजीनियरिंग में आसानी से दाखिला भी मिल गया | पर जैसे ही वो इंजीनियरिंग कालेज में पंहुचा, उसके तो रंग-ढंग ही बदल गये | कच्छे-बनियान में पुरे बाज़ार घुमने वाला मुकुंद्बिहारी अब केवल स्किन टाइट जीन्स और टी-शर्ट में ही दिखाई देता था | कालेज के पहले ही साल में सिगरेट-दारू सब चालू कर दिया | गाँव की गाज़र-घास अब शहर का चालू-पुर्जा बन चूका था | उसके ऐसे हाल पर मुझे अच्छा नहीं लगा, एक तो वो पुराना वाला मुकुंद्बिहारी नहीं रहा बल्कि कूल डूड ऍमबी बन चूका था | उस पर से पढाई में भी पिछड़ता जा रहा था | उसे कई सारे सब्जेक्ट में बेक लग चुके थे | पर इससे पहले मैं उसे कुछ कहता, उसके साथ कुछ ऐसा हुआ कि वो पूरी तरह से बदल गया | उसके क्लास में एक लड़की थी जो कालेज के पहले दिन से उसकी दोस्त बन गयी थी | कालेज के शुरुआती दिनों में तो मुकुंद्बिहारी बहुत ही सीधा-सादा था और वो लड़की निहायत ही ख़ूबसूरत थी | शुरुआत में तो ये केवल दोस्ती तक सिमित थी पर फाइनल इयर तक प्यार में तब्दील हो चुकी थी | बेचारा मुकुंद्बिहारी उसके लिए बहुत इमोशनल होने लगा था |पर इस प्यार का उसे बहुत फायदा हुआ | पहले तो वो हर आधे घंटे में सिगरेट पीता था, पर प्यार होने के बाद उसे कभी उस लड़की के अलावा किसी चीज़ की जरूरत महसूस ही नहीं हुई | इस तरह से सिगरेट हमेशा के लिये उससे छूट गयी | लड़की के साथ में रहकर वो पढाई पर भी ध्यान देने लग गया था | इसका फायदा ये हुआ की फाइनल इयर में उसने अच्छा स्कोर किया और एक कंपनी में प्लेसमेंट भी हो गया | रही बात शराब पीने की तो वो लड़की एक दिन उसे किसी साधू के प्रवचन में ले गयी, जहा साधू बाबा ने सभी लोगो को शराब ना पीने की शपथ दिलवा दी | और इस तरह से उसने शराब से भी तौबा कर ली |

जो मुकुंद्बिहारी स्कूल में गाज़र घास था, कोलेज में चालू पुर्जा बना, नौकरी लगने के बाद पक्का प्रोफेशनल बन गया था | घर से ऑफिस और ऑफिस से घर, यही उसकी ज़िन्दगी हो चुकी थी | मुझसे भी काफी दिनों में ही मुलाकात हो पाती थी | ऐसे में उसका अचानक फ़ोन आना और मुझे ‘लाइट हार्ट बार’ में बुलाना कुछ समझ में नहीं आ रहा था | खैर मैं जब ‘लाइट हार्ट बार’ में पंहुचा तो मुझे देखते ही बोला ‘मुझे पता था की कोई आये ना आये तू जरूर आएगा, बस तू ही अपना सच्चा दोस्त हैं |’ उसका ऐसा बोलना था कि मैं समझ गया की वो कम से कम दौ पेग डाउन हैं | मेने पूछा क्या हुआ तो वो बोलने लगा ‘आज कुछ नहीं बोलेगा, आज बस सेलेब्रशन होगा | वो डायन मुझसे
झगडा करके मायके गयी हैं |’ अब मुझे समझते देर नहीं लगी कि वो किसे डायन कह रहा हैं | आगे मैं कुछ उससे पूछता उससे पहले उसने ही सब कुछ बता दिया – ‘ क्या नहीं किया उसके लिए मेने…सिगरेट छोड़ दी …दारू छोड़ दी…ये दौ कौड़ी की नौकरी कर ली…यहाँ तक के अपने माँ-बाप के गाँव जाना भी छोड़ दिया | पर उसने क्या किया मेरे लिये…कुछ नहीं…मेरी सेलेरी पर ऐश करती हैं …मेरा बनाया हुआ खाना खाती हैं और मेरा ही कोई ख्याल नहीं रखती साली | मेरे माँ-बाप कभी-कभार यहाँ आते हैं तो उन्हें भी परेशान करके भगा देती हैं | जब से शादी हुई हैं, हंसना भी भूल गया हूँ | दिन भर ऑफिस में मरता रहता हूँ और घर आकर इसके नखरे उठाता रहता हूँ | वीकेंड में भी दिन भर बस मेरी छाती पर ही लौट लगाती हैं | आज उससे बहुत झगडा हुआ और उसको मेने घर से भगा दिया …(फिर थोड़ी देर रुककर)…भगा क्या दिया, खुद ही मुझे छोड़कर चली गयी ‘ (इतना कहना था की उसके चेहरे पे अजीब से ख़ामोशी छा गयी )| मेने उसे समझाया की ऐसा झगडा हर पति-पत्नी में होता हैं, कल जाना, भाभीजी से माफ़ी मांग लेना और वापस घर ले आना | इतना कहना था कि उसका दर्द फिर उभर आया ‘हर पति-पत्नी में ऐसा झगडा तभी होता हैं, जब बेचारा पति कुछ बोलता हैं | वरना जब तक इनके नखरे झेलते रहो, इन्हें कोई परवाह नहीं रहती | जाने दे साली को …अपन अब उसको लेने कभी नहीं जायेंगे …रोज बस ऐसे ही सेलेब्रेट करेंगे | देख…आज कितने सालो बाद दारू पीने को मिली हैं ‘ …(इतना कहने के बाद वो दारू के गिलास को बड़े प्यार से निहारने लगा…जैसे बीवी से ज्यादा उसे शराब प्रिय हो )| मेने उससे कहा की नहीं, तुझे आज के बाद कोई दारू नहीं पीना हैं …बीवी से नहीं तो कम से कम धरम से तो डर …तूने भगवन की कसम खायी थी दारू ना पीने की | मेरा इतना कहना था की वो फिर से भड़क उठा – ‘कौन कम्भखत बीवी से डरता हैं …मैं तो डरता था भगवान से जो शराब नहीं पीता था …वरना बीवी ने तो कोई कसर नहीं छोड़ी थी मेरी ज़िन्दगी नरक बनाने में …वो तो भला हो मध्य-प्रदेश और राजस्थान की पुलिस का जो मैं अब ज़िन्दगी भर बिना किसी डर के दारू पी सकता हूँ|’ अब मेरा दिमाग बिना दारू पीये ही चकराने लगा था, आखिर मध्य-प्रदेश और राजस्थान की पोलिस ने ऐसा क्या किया कि महाराष्ट्र में बैठा मुकुंद बिहारी अब दारू पी सकता हैं | खैर मैं कुछ पूछता उससे पहले उसने ही सब कुछ क्लियर कर दिया – ‘ अरे जिस साधू बाबा ने मुझे दारू ना पीने की कसम दिलवायी थी, वो आसाराम था | अब जब साधू ही नकली तो उसके द्वारा दिलाई कसम क्या घंटा सच्ची होगी | कल ऍमपी और राजस्थान की पोलिस ने उसे गिरफ्तार कर किया और मुझे हर बंधन से मुक्त कर दिया |’ इतना कहने पर उसके चेहरे पर ख़ुशी की ऐसी लहर आयी जैसे आसाराम की गिरफ़्तारी की ख़ुशी उन बलात्कार की शिकार बच्चियों से ज्यादा इस पत्नी प्रताड़ित मुकुंद बिहारी को हो रही हैं |

मुझे समझ में नहीं आ रहा था की मैं आसाराम की गिरफ़्तारी पर खुशिया मनाऊ या उनके अनुयायियों को ऐसी कसमो से मिली आज़ादी का दुःख मनाऊ | खैर जो भी हो अपना दोस्त मुकुंद बिहारी तो ख़ुशी-ख़ुशी दारू पीकर अपने गम हलके कर रहा था | रात कोई एक बजे तक उसका ऐसा ही रिकॉर्ड चलता रहा, फिर मेने उसे उसके घर छोड़ दिया | घर के अन्दर जाते हुए भी वो बोला की कितना सुकून होता हैं जब घर का दरवाजा खोलने पर इतना सन्नाटा मिले और आप चैन से सो सके | उसे घर छोड़कर जाते वक़्त मैं भी मन ही मन शराब का शुक्रिया अदा कर रहा था कि इस दारू के कारण ही पता लगता हैं की बेचारे मर्दों को भी दर्द होता हैं | वरना यु ही चुपचाप हर बात सहना तो आदमियत की पहचान बन चूका हैं | उस रोज रात को सोते वक़्त शायर अंकित की कुछ पंक्तिया याद आ गयी –

“शराबी की तो फितरत में था लडखडाना
पर ज़माने को तो चाहिए था समझना
हो दिल में अगर दर्द तो मर्द सुकून ढूंडता हैं
कोई शबाब ढूंढता हैं तो कोई शराब ढूंढता हैं ”

अब शबाब के चक्करों में पड़कर आसाराम बनने से तो अच्छा ही हैं ना शराब पीना…क्यों ठीक हैं ना | आप सोचिये…मैं जरा आसाराम की खबरे पढ़ लेता हु तब तक अख़बार में …धन्यवाद !!