बरसो हुए


कल वाले दिन अब परसों हुए
उस जुनू को जिये बरसो हुए

दिन कटता था जिसके दीदार में
उस इश्क़ को किये बरसो हुए

वो भी क्या दिन थे
लगता हैं सब कल परसों हुए

हाथो में हाथ हसीना का साथ
उसे बाँहों में भरे बरसो हुए

जिस मंज़र से की थी इस क़दर चाहत हमने
उस गली से गुजरे बरसो हुए

याद करता हैं वो चौक का चौकीदार हमें
इस मोहल्ले में चोरी हुए बरसो हुए

“ठाकुर” आ जाओ तुम फिर से अपने रंग में
कि तुम्हे भी किसी का दिल चुराये बरसो हुए

आशिकों कि ज़मात में एक तुम्हारा भी नाम हो
जो मिटाए ना मिटे फिर कितने भी बरसो हुए

रात


हर रात रूआसा कर जाती हैं
आसुओं का काम आसां कर जाती हैं

अखरती हैं अंगड़ाई कुछ इस कदर कि
नरम शैया भी डोलती नैय्या बन जाती हैं

ज़िन्दगी के बिस्तर पर किसी की कमी खल जाती हैं
जब अपनी आह किसी की आहट को तरस जाती हैं

और इस बात पर तबियत और बिगड़ जाती हैं
जब पडौसी के घर में रंगीन रोशनी दिख जाती हैं

वैसे जलने को तो अपनी लालटेन भी जल जाती हैं
पर उसकी रोशनी चाँद के आगे फीकी पड़ जाती हैं

पर क्या करे गिला हम चाँद के चमकने की भी
रात अमावस की उसके नसीब में भी तो आती हैं

ये बात नसीबो की अपनी समझ में नहीं आती हैं
खुद की कमियाँ बड़ी आसानी से इस लफ्ज़ में छिपाई जाती हैं

सुबह होते ही अक्सर ‘ठाकुर’ तुम्हारी आँख लग जाती हैं
वरना एक उजली किरण तो तुम्हारे नसीब में भी आती हैं

 

वो गीतों में मेरे रंग भर देता हैं !!


वो गीतों में मेरे रंग भर देता हैं ,
छेड़कर तारों को तरंग भर देता हैं
मेरे ही ख्वाबो ख्यालो को बुनकर
इन गज़लों को मेरे संग कर देता हैं !

मैं सो भी जाऊ तो वो मेरे संग रहता हैं
बेरंग सपनो को सतरंग कर देता हैं
ये उसका ही हाथ रखा हैं मेरे ऊपर
जो हर मौसम को बदलकर बसंत कर देता हैं !

आवाज़ नहीं उसकी पर सुर निराले हैं
नज़र नहीं उसकी पर नैन मतवाले हैं
सारी दुनिया हमारी पर हम उसके दीवाने हैं
वही हैं जिसे हमसे इतने फ़साने लिखवाने हैं !

वो हर अहसास को मेरे आवाज़ दे देता हैं
शोर को भी साज़ दे देता हैं
ख्यालो को थोड़ी आँच दे देता हैं
और गीतों में मेरे बाँट देता हैं !

वो कविताओ में मेरी कूक भर देता हैं
दिल से निकली हूँक भर देता हैं
मेरे ही मुह से निवाला खाकर
वो मुझमे लिखने की भूख भर देता हैं !

मन को मेरे मलंग कर देता हैं
जोड़कर इरादों को बुलंद कर देता हैं
डर को डिब्बो में बंद कर देता हैं
और ज़ख्मो को इस कदर पैबंद कर देता हैं !

वो गीतों में मेरे रंग भर देता हैं ,
छेड़कर तारों को तरंग भर देता हैं !!

सियासत


बात मुझसे जुडी हो तो जानना जरूरी हैं
समस्या कैसी भी हो समझना जरूरी हैं

कितनी भी बात करे हम लोग भलाई की
भला करने के लिए बुराई लेना भी जरूरी हैं

ये लोग जिन्होंने सियासत को खेल बना रखा हैं
जानते नहीं की खेलने के लिए मैदान साफ रखना भी जरूरी हैं

एक अरसा हो गया इस खेल से खिलवाड़ होते देखते
कि अब इस खेल के दर्शको का जागना जरूरी हैं

मैं जानता हूँ कि मेरी एक आवाज़ से कुछ नहीं होगा
मेरी आवाज़ से तेरी आवाज़ का मिलना जरूरी हैं

रोटी के लिए जीने वालो कुछ सोचो मुल्क के बारे में
कि चिराग के जलने के लिए हवा का चलना बहुत जरूरी हैं

– अंकित सोलंकी
२८ जुलाई २०१३, उज्जैन (म.प्र.)

हाल-ए-दिल


तारीफ करू या तकलीफ बताऊ,
हाल-ए-दिल पर कैसे सुनाऊ !
ख्वाब नहीं जो मैं भूल जाऊ,
इस खुशबू को मैं कहाँ छिपाऊ !
तेरे पास आऊ या तुझसे दूर जाऊ,
इस चाहत को मैं कैसे जताऊ !
लड़की नहीं जो मैं शरमाऊ,
शेर दिल हूँ फिर क्यू घबराऊ !
जंग हो तो मैं जीत भी आऊ,
इस जुए में कैसे जी-जान लगाऊ !
तू ही बता दे या मैं जान जाऊ,
गुलाब लाऊ या ग़ज़ल सुनाऊ !
बारिश बुलाऊ या तारे तोड़ लाऊ,
किस अंदाज में तुझे आशिकी दिखाऊ !
उलझन ये दिल की कैसे सुलझाऊ,
प्यास बड़ाऊ या प्यास बुझाऊ !
कौन सी दुआ इस खुदा से कुबुलवाऊ,
तुझ को पाऊ या तुझ में खो जाऊ !
तारीफ करू या तकलीफ बताऊ,
हाल-ए-दिल पर कैसे सुनाऊ !

नशा


Dedicated to all my drinker friends

थोडा खुद को सजा दीजिये
कोई ना कोई नशा कीजिये

कब तक यु सेहत का मज़ा लीजिये
जख्मो को भी तो जगह दीजिये

चाहे जितनी मर्जी चंदा कीजिये
थोडा चखना और एक बोतल पर मंगा लीजिये

बेरहम ज़माने से बेखबर बनिए
बोतलों में बहकर बेशरम बनिए

फालतू की अब फिक्र छोडिये
सुरूर भरा कोई जिक्र छेडिये

आज ना गुनाहों पर पर्दा डालिए
जो बात दिल में हो बोल डालिये

बचपन की वो डायरी खोलिए
जवानी की वो शायरी बोलिए

अल्फाजो को आजाद कीजिये
ख्यालो को खुलेआम छोडिये

नशीली इन रातो में न सोच समझ दिखाइए
बस जाम पीजिये और जश्न मनाइये

गुस्ताखी


किसका भला हुआ हुआ हैं किनारों पर बैठकर,
बेमौसम बारिश की बहारो को देखकर !

कभी देखना किसी माझी से पूछकर,
कितना मजा आया उसे तुफानो से खेलकर !

करते रहिये थोड़ी गुस्ताखी जानबूझकर,
खुदा भी खौफ खाता हैं खामोश चेहरों को देखकर !

वैसे खुश कोई नहीं यहाँ अपना आज देखकर,
रोता हैं हर कोई एक दुसरे का कामकाज देखकर !

में खुश हूँ मेरे यार का बसा घर संसार देखकर,
और मेरा यार खुश हैं मुझे अब तक आजाद देखकर !

खुश होते हैं वैसे लोग यहाँ आँखों को भी सेककर,
ठहरे हुए पानी में पत्थरो को फेंककर !

वो समझे हम भी चले जायेंगे चेहरे को घूरकर,
हम ठहरे ही रहे पर उनके ही दरवाजे पर !

खायी फिर उनकी गलियों में हमने इतनी ठोकर,
बिन पिए ही चलते हैं हम आज तक लड़खड़ाकर !

कहता हैं ये जमाना हमसे थोडा सा सब्र कर,
हम कहते हैं ज़माने से मिलते हे फिर कब्र पर !