Love Deal

Its a smalll story about love and friendship. There are five characters in this story –

  1. Ronit – Main hero of the story
  2. Mitali – Heroine of the story
  3. Nilesh – He is the best friend of Ronit
  4. Mrs Uma Devi – Mitali’s mother
  5. Mr. RajKamal – Ronit’s father

Ronit, Mitali and Nilesh were friends and they were studying in same college. Ronit and Mitali were in true love with each other. Nilesh was the best friend of Ronit and they were childhood friends. When college completed, Ronit and Mitali decided to get married.

Mrs. Uma Devi, who was the mother of Mitali, came to know about her daughter’s decision to get married. Since Ronit’s financial condition was not good and he has careless attitude toward carrier, Mrs Uma Devi asked Mitali to not marry Ronit. Mitali understand the concern of her mother. She knew about Ronit’s careless attitude but she also knew his determined and fearless nature, so she proposed a deal to Ronit.

Mitali asked Ronit that she would marry him only when he makes decent financial status. She formalized financial status by some condition like Ronit should have his own house, car, and a decent bank balance. Ronit asked Mitali what if he would not make it in given time. Mitali said she would go with her mother’s choice and leave him. But she also said that she is sure he will fulfil her condition. Uma devi also agreed with Mitali for this condition

Ronit left disappointed with this condition and asked his father Mr. Rajkamal what to do. Mr. Rajkamal said he is free to do whatever he wants – He can leave Mitali or he can work hard to fulfil deal. After thinking, he accepted challenge as he was in true love with Mitali. He decided to go Dubai for earning.

At the same time Nilesh’s mother was facing a critical illness and he need money to operate her. Since he also need money, he accompanied Ronit in Dubai so that he could also earn something. At that time Ronit determined that he would create his own business in Dubai, and he need good loyal friend. But he knew that Nilesh is very innocent and emotional guy, sometimes he act very foolish also. So he made a condition to his friend that he would never brake his trust, and Ronit would take all personal and professional decision for Nilesh as well as bussiness. He also made Nilesh swear that he would never leave him once they would achieve something. Nilesh agreed to his condition and they left for Dubai.

Initially they did some small jobs in Dubai but soon they started import-export business. In the span of two years, their business grew rapidly, and they made good profit. Ronit made planning and was primary owner of bussiness. Nilesh handled execution part and like loyal partner he worked hard to execute their planning. Now Ronit was dreaming big and making their business global. Nilesh operated his mother and she was also doing good. At that time, there were no mobiles so communication between Ronit and Mitali was permanently closed.

After two years, Ronit came to India and met Mitali. Ronit had his own house, car and decent bank balance now. Mitali was very happy that now they would marry happily. But this time Ronit refused to marry Mitali. He said that these two years make him understand value of money and work. Now he want to make his business bigger and he has no time for love. Also, Mitali wanted to settle down In India but Ronit wanted to become bigger and settled in abroad. So, their ambitions were not matching and Ronit decided to left her. Mitali was very disappointed, and heartbroken with Ronit’s behavior. She bagged to Ronit many times, but he did not melt. Finally she swear by anger that she would never see Ronit again. Ronit made his father Mr. Raj Kamal aware about his decision, but he respected his son’s decision and stood with him.

Since Nilesh had friendship with both and he knew about their true love, he tried to convince Ronit that do not dump Mitali. But Ronit did not understand, and he was determined at his decision. Nilesh sympathized Mitali and helped her to move out from this sadness. Soon Nilesh and Mitali developed feeling for each other. After some time, they decided to get married. Nilesh knew about Mitali’s swear that she would not want to face Ronit again and he also knew that Ronit would not accept him to get married with Mitali; it become tricky situation for him. He let Ronit knew about his decision; Ronit said if he would ask him, he should not marry Mitali but he is free to take decision on his own. Nilesh knew about Mitali’s dream to settle in India. He knew that he would not continue his life with Ronit and Mitali both so he finally decided to brake his partnership with Ronit. Nilesh and Mitali got married and left In India; Ronit moved to Dubai with his ambition.
Story ends here; but there is one exercise for readers now – Think about everyone’s situation and answer these two questions in comment box –

  1. Who is the most innocent in this story – whatever he did was perfectly fine.
  2. Who is the main culprit in this story – what he did was wrong.

If you specify your reason; it would be icing on the cake. I will share my take also later.


Note – This story is inspired by similar incident I read somewhere.


वो गली के सबसे कोने वाले घर मे रहने वाले मोहन दादा उस दिन बहुत खुश थे क्योंकि दूरदर्शन पर उस दिन तेज़ाब फ़िल्म आने वाली थी । मोहन दादा अपनी प्रौढ़ अवस्था मे थे और घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियों से मुक्त होकर अपना बुढापा एन्जॉय कर रहे थे । गली में रहने वाले मोनू को वो बार-बार तेज़ाब के गाने गाकर सुना रहे थे – “एक,दो,तीन,चार,पाँच, छह……आजा पिया आई बहार” । मोनू को उन्होंने बताया जीवन मे तीन बार इस फ़िल्म को देखने का अवसर आया पर हर बार नही देख पाये । पहली बार जब थियेटर में लगी थी तब देखने गया उस दिन हॉउसफुल हो गया । फिर दो बार टीवी पर आई, पर दोनों बार रात में नींद आ गई और पिक्चर नही देख पाया । आज उन्होंने दिन में अच्छे से नींद निकाल ली और अब रात को इत्मिनान से फ़िल्म देखने का प्लान बनाया हैं ।

मोहन दादा की बातों ने मोनू की उत्सकता भी फ़िल्म में जगा दी । वैसे भी 12-१३ साल की उम्र में बच्चे फ़िल्म और खेल के प्रति ज़्यादा ही आकर्षित होते हैं । रात 9:30 बजे फ़िल्म शुरू हुई और मोनू को फ़िल्म शुरुआत से ही काफी अच्छी लगी । पर मध्यांतर में फ़िल्म में एक गीत आया – सो गया ये जहाँ, सो गया आसमा…. रात बहुत हो चुकी थी और नितिन मुकेश की मीठी आवाज़ मोनू को लोरी जैसी लगी और वो सो गया । रात भर गहरी नींद में सोया रहा पर सुबह जब उठा तो गली में अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था । बाहर गली में मोहन दादा के घर पर कुछ लोग खड़े थे । मोनू जब उनके घर तक गया तो देखा मोहन दादा अब इस दुनिया मे नही रहे और उनके घर वाले चीख-चीखकर रो रहे थे – रात में तो अच्छे खासे तेज़ाब पिक्चर देखकर सोये थे और सुबह क्या हो गया ।

बात को दो साल बीत चुके थे और दूरदर्शन पर फिर एक दिन तेज़ाब फ़िल्म आने वाली थी । मोहन दादा को मोनू बिल्कुल भूल चुका था । मोनू ने रात में उस दिन फिर तेज़ाब देखना शुरू की । टीवी पर जैसे ही गीत आया – एक,दो,तीन,चार,पाँच, छह……आजा पिया आई बहार…मोनू को मोहन दादा याद आ गए । ये गीत वो मोहिनी से पहले मोहन दादा से सुन चुका था । मोहन दादा की याद आते ही मोनू के मन मे डर बैठ गया । फ़िल्म के बीच मे जब भी वो बाथरूम या पानी पीने जाता वो मोहन दादा को याद करके सहम रहा था । एक बार उसने खिड़की के पर्दे हटाकर गली में देखा तो उसे गली में वही सन्नाटा पसरा हुआ सा लगा । धीरे-धीरे फ़िल्म आगे बढ़ी और फ़िल्म में गीत आया – सो गया ये जहाँ, सो गया आसमा…मोनू को फिर से ये गीत सुनकर नींद आ गयी और वो गहरी नींद में सो गया । उस रात मोनू को सपने में मोहन दादा दिखाई दिये , उनके घर के सामने वाली गली में, अंधेरे से भरे वातावरण में, वो अकेले वही मोहिनी वाला गाना गाते हुए चले जा रहे थे – बताइये कैसे हैं आप….मैं कर रहा था आपका इंतज़ार….एक दो तीन चार पांच छः…. बारह तेरह…तेरह करू गिन गिन… आजा पिया आई बाहर । फिर मोहन दादा ने दूसरा गाना गाया …सो गया ये जहाँ, सो गया आसमा…. सो गए ये सारे गली वाले …सो गए ये रस्ते । गाने के बीच-बीच में मोहन दादा गली में रहने वाले लोगों के नाम भी लेने लगे …सो गए ये शर्माजी… सो गए श्रीवास्तव जी ! गाने के अंत मे उन्होंने ये पंक्तियां गाई — सो गए सारे गली वाले …पर कोई तो देख रहा होगा तेज़ाब ….! सबसे अंत मे मोहन दादा ने डरावनी हंसी हँसते हुए कहा – हा… हा… हा… मोनू बेटा अब मुझे अकेले तेज़ाब नही देखनी पड़ेगी…हा.. हा… हा ।

मोनू मोहन दादा का ये डरावना रूप देखकर नींद में बहुत डर रहा था और उसकी नींद सुबह जल्दी भी खुल गई । सुबह जब उसने बाहर जाकर देखा तो गली में वही सन्नाटा पसरा हुआ था और वो चलकर जब मोहन दादा के घर पहुँचा तो देखा मोहन दादा की पत्नी अब इस दुनिया मे नही रही और घरवाले चीख चीखकर रो रहे थे – कल तो तेज़ाब देखकर अच्छी खासी सोई थी और ये सुबह क्या हो गया !

गाजर का हलवा

ये कहानी तब की नही हैं जब शादी समारोह में पंगत लगती थी और सभी को बड़ी मनुहार करके भोजन कराया जाता था, पर ये कहानी उतनी भी नई नही हैं कि जब छप्पन प्रकार के भोग बनाकर मेहमानों के सामने फूल डेकोरेटिव टेबल पर रख दिये जाते है | ये कहानी तो तब की हैं जब बुफे पार्टी में इतने तरह के व्यंजन नही होते थे, मीठे के नाम पर एक या दो ही आइटम होते थे और समाज इस बात पर आश्चर्य कर रहा था कि दाल-चावल जैसी पूर्णतः घरेलू डिश को भी शादी-पार्टी में परोसा जा रहा है । खाने के स्टाल पर एक जैसी यूनिफार्म में सजे वेटर नही खड़े होते थे, रिश्तेदार और दोस्तो में से ही कुछ कार्यकर्ता चुनकर स्टाल पर खड़े कर दिए जाते थे । इनका मुख्य कार्य डिमांड और सप्पलाई का होता था । जैसे ही स्टाल पर कोई आइटम खत्म होता था, ये पीठे में से लाकर फिर स्टाल पर रख देते थे ।

तो भईया ऐसी ही एक शादी में एक बार गाजर के हलवे के स्टाल की जिम्मेदारी हमें दी गयी । जब भी गाजर के हलवे का भगोना खाली होता, हम पीठे से लाकर फिर भगोना भर देते थे । बाकी समय बस स्टाल पर खड़े रहते और आती जाती जनता को देखते रहते । हमारे स्टाल के पीछे ही स्पीकर का एक बक्सा रखा था जिसमे कहो ना प्यार है फ़िल्म की कैसेट से गाने बजाए जा रहे थे । हर पार्टी में एक समय आता है जब काफी भीड़ हो जाती हैं और लगभग सारे मेहमान पार्टी में पहुच चुके होते हैं । सामन्यतः रात आठ से दस के बीच वाला समय ऐसा ही होता हैं । हम भी ऐसे समय मे स्टाल पर खड़े थे। जनता में से कोई भी हमारी तरफ तभी देखता था जब बर्तन खाली हो जाता था, अन्यथा जनता को हमारे वहां खड़े रहने ना रहने से कोई मतलब नही था ।

उस समय स्पीकर पर ‘ताज़ा-ताज़ा कली खिली है” वाला गाना बज रहा था और हम भी साथ साथ मे ये गीत गुनगुना रहे थे। गाना गुनगुनाते हुए ही हमारी नज़र एक लड़की पर गयी जो गाजर के हलवे के स्टाल के पास ही खड़ी थी और हलवे पर उमड़ी भीड़ को आस भरी नज़रो से देख रही थी । हमे ये समझने में कतई देर नही लगी कि ये लड़की स्टाल पर भीड़ का अंदाजा लगा रही है और सोच रही है कि अभी भीड़ में घुसा जाए या थोडा इंतज़ार किया जाए । लड़की देखने मे हमारी उम्र की ही लग रही थी पर जान-पहचान की नही दिख रही थी । गोल्डन एम्ब्रॉयडरी वाले सफेद कुर्ते और उसी से मैचिंग सलवार और दुपट्टे में वो लड़की बहुत खूबसूरत तो नही पर कम भी नही लग रही थी । तब लडकिया बालो पर स्ट्रेटनर से अत्याचार कर माथे से चिपकाती नही थी, बल्कि उन्हें नेचुरल ही रखती थी। इस लड़की ने भी बालों को साधारण से पोनीटेल में बांधा था, पर आगे के कुछ बालो को गोल घुमाकर सर पर एक पफ भी बनाया हुआ था । ये पफ उसकी खूबसूरती को चार चांद लगा रहा था ।हम ने उस लड़की को देखा तो सोचा क्यों ना हम भगोने से एक प्लेट हलवा लेकर इस लड़की को दे दे, इस मदद के बहाने जान-पहचान भी हो जाएगी । पर फिर सोचा इससे पुरुष समाज की नाक ना कट जाए । लड़की है तो क्या हुआ, इसको भी आम जनता के बीच आकर हलवा लेना चाहिए । हम ये सोच ही रहे थे कि इस बीच वो लड़की वहाँ से चली गयी और हम भी अपने काम मे व्यस्त हो गए।

कुछ देर बाद हमने देखा कि वो लड़की फिर से स्टाल के पास खड़ी थी, वैसे ही भीड़ को देख रही थी । इस बार हमने पुरुष समाज की नाक को गोली मारी और लड़की की मदद करने की ठान ली, वैसे भी पुरुषों की नाक तो महिलाओं पर अत्याचार करके वैसे ही कटी हुई हैं, हम तो महिलाओं की मदद ही कर रहे थे । हमने स्टाल पर से एक एक्स्ट्रा चम्मच निकाला, उससे हलवा प्लेट में भरा और उस लड़की को दे दिया। स्टाल पर खड़ी दो आंटी ने हमे गुस्से से देखा और शायद करमजले-नासपीटे जैसी गालिया मन ही मन दी , पर हम उन्हें कंप्लेटली इग्नोर मार कर आगे बढ़ गए । लड़की को भी शायद हमारे इस कदम का अंदाजा नही था, इसलिए जब हमने उसे हलवे की प्लेट दी वो थोड़ा सा झेंप गयी । फिर खुद को सम्भाला और मुस्कुराई, और फिर हँसते हुए ही थेंक यू कहा और चली गयी । उसके मुस्कुराकर थैंक यू कहने ने पूरे शरीर मे उत्साह और खुशी का ऐसा संचार किया कि उस पर मोटिवेशन की हज़ार किताबे भी कुर्बान जाए । उधर स्पीकर पर भी लकी अली की आवाज़ में कमाल का गाना बज रहा था – क्यो चलती हैं पवन, क्यो मचलता हैं मन…ना तुम जानो ना हम ।

हमारा तो रोम-रोम इस वाकये पर खिला हुआ था पर कोई और भी था जो इस वाकये का दूर से आनंद ले रहा था । हमे हलवा देते हुए पास के ही रायते के स्टाल पर खड़े राहुल ने देख लिया । फिर क्या था, रायते वाले राहुल ने रायता फैला दिया । रसोई वितरण की व्यवस्था देख रहे सभी कार्यकर्ता में हमारे हलवे का हल्ला मच गया । कुछ अति-उत्साही कार्यकत्ताओं ने तो बिना देखे ही हमे अपना भैया और उस लड़की को अपनी भाभी भी मान लिया था । हम बदनाम हो चुके थे और हमारे मजे भी लिए जा रहे थे पर फिर भी हम खुश थे कि किसी लड़की ने तो हमे भाव दिए। ।

कुछ देर इसी तरह खुशी खुशी में कुछ ग्राम वजन बढ़ाने के बाद अब हमारी नज़रे फिर उस लड़की को ढूंढ रही थी । और मेहरबानी देखिए किस्मत की, वो लड़की फिर से हमारे स्टाल के पास आकर खड़ी थी और भीड़ को निहार रही थी । हमसे उस लड़की की नज़रे मिली तो उसकी नज़रे शरमा के झुक गयी । हमे ये समझते कतई देर नही लगी कि उसे हलवा अच्छा लगा और वो दूसरी प्लेट भी लेना चाहती है । मन ही मन हमने हलवा बनाने वाले मुख्य हलवाई भँवर उस्ताद को धन्यवाद किया, जिन्होंने इतना अच्छा हलवा बनाया कि ये लड़की दूसरी प्लेट लेने से खुद को रोक ही नही पायी । हमने भी अपने पहले प्यार की दूसरी प्लेट तैयार कर दी और फिर से उसे ऑफर कर दी। वो लड़की इस बार थोड़ी सहज दिखी, उसी अंदाज में हमे थेंक यू कहा और चली गयी ।

सर्दी के मौसम में भी हमे उस समय गर्मी का अहसास हो रहा था । स्पीकर पर भी गाना बज रहा था “प्यार की कश्ती में, लहरो की मस्ती में, चले हम……गगन से दूर” । इधर इश्क़ की आंच पर हमारी भी भगोनी चढ़ चुकी थी । हमे अहसास था कि उस लड़की को स्टाल पर खींचने वाला जादू भंवर उस्ताद का ही नही था, बल्कि उसमे हमारा भी हाथ था । रायते वाले राहुल के चेहरे पर हमारे लिए दिखने वाले आश्चर्य ने भी इस बात की पुष्टि कर दी थी । हम ख्याली पुलाव बना रहे थे और इधर हमारे इश्क़ का हलवा मुहल्ले में बटने जा रहा था । इस बार वो लड़की अपनी सहेली को लेकर स्टाल के पास खड़ी थी और वैसे ही भीड़ को निहारे जा रही थी । जैसे हर लड़के का एक कमीना दोस्त होता हैं, जिसे वो अपनी दिल की बात कभी नही बताता है, नही तो वो उसका मजाक बना देता हैं । वैसे ही हर लड़की की बेस्ट फ्रेंड जरूर होती हैं, जिसे वो अपने दिल की बात जरूर बताती हैं, नही तो उस लड़की के पेट मे बात ना बोलने के कारण दर्द हो जाता हैं । ये दूसरी वाली लड़की भी पहली वाली की बेस्ट फ्रेंड लग रही थी, हम समझ गए कि ये लड़की अब अपनी बेस्ट फ्रेंड को हमारे बारे में बता चुकी है और हमे दिखाने लायी हैं ।वैसे दिखने में ये बेस्ट फ्रेंड भी मेहरून लहंगे में बहुत खूबसूरत लग रही थी । हमने भी नहले पर दहला मारते हुए दो प्लेट हलवा तैयार कर दिया और उन दोनो को दे दिया । सहेली ने उस लड़की को खुशी और आश्चर्य से ऐसे देखा जैसे कोई सरकारी दफ्तर में अपनी जान पहचान से हमारा काम जल्दी से करवा देता है । दोनों लड़कियों ने हमे मुस्कुराकर थेंक यू कहा और चली गयी ।

इधर हमारी खुशी बढ़ती जा रही थी पर रायते वाले राहुल का ठंडा रायता अब उबल रहा था और उसमें से जलने की भी बू आ रही थी । डिजाइनर लहंगे वाली लड़कियों के बीच भी हमारा हलवा फेमस हो रहा था । अब तक हम पूरी कार्यकर्ता मंडली के भैया और वो सलवार सूट वाली लड़की भाभी बन चुकी थी । हम भी इतराते-शर्माते इस तमगे पर मन ही मन खुश हो रहे थे । रायते वाला राहुल हमे समझा रहा था कि लडकियो के मामले में जल्दी सेंटी नही होते वो बस लड़को का फायदा उठाती है, पर हम रायते वाले राहुल की इस बात को फूल इग्नोर मार रहे थे । इस बीच वो लड़की दो बार और स्टाल पर आ गयी और हमने भी खुशी-खुशी उसे हलवे की प्लेट लगाकर दी ।स्पीकर पर कहो ना प्यार है का टाइटल ट्रेक भी मौके पर चौका लगाते हुए बज रहा था – “दिलवालो दिल मेरा सुनने को बेकरार हैं – कहो ना प्यार हैं” । हम खुश थे कि लड़की खाने के मामले में बिल्कुल अपनी टक्कर की मिली, आखिर किसी शादी-प्रोग्राम में चार-पाँच प्लेट मीठा नही खाया तो क्या खाया । केलोरी गिन-गिन कर खाने वाले इस ज़माने में कहां मिलती हैं ऐसे डटकर खाने वाली लड़कियां ।

इस सबके बीच रात के लगभग दस बजने को थे । पार्टी में लोग कम हो रहे थे और हमारे हलवे के स्टाल पर भी इक्का-दुक्का लोग ही आ रहे थे। बार-बार भगोना भरकर लाने की अब कोई जरूरत नही थी इसलिए कार्यकर्ता लोग भी स्टाल छोड़कर इधर-उधर बाते करने में लगे थे और कुछ ने तो खाना भी शुरू कर दिया था । हम भी अपने स्टाल से थोड़ी दूर खड़े होकर रायते वाले राहुल से गप्पे लड़ा रहे थे । इसी बीच उस लड़की का फिर से स्टाल पर आगमन हुआ । स्टाल पर कोई भीड़ तो थी नही इसलिए अब उसको हमारी मदद की कोई जरूरत नही थी । पर उसने खड़े होकर स्टाल को देखा और फिर बिना हलवा लिए ही पलटकर जाने लगी । हम समझ गए कि उसने स्टाल पर हमें नही देखा तो हलवा भी नही लिया । हम उसी समय स्टाल के पास आये और उसे टोका – “एक्सक्यूज़ मी …ये लीजिये हलवा”
लड़की पलटी और फिर हमें देखकर मुस्कुरा दी ।
हमने भी मुस्कुराते हुए पूछा – “आपको गाजर का हलवा बहुत पसंद हैं ?”
उस लड़की ने फिर हंसते हुए कहा – “जी हाँ, बहुत…हमारे पापा को भी बहुत पसंद हैं”
हर लड़की अपने पापा की परी होती हैं और पापा से बहुत प्यार करती हैं, ये बात इस लड़की ने सिद्ध कर दी वरना पापा की पसंद से हमे कोई लेना-देना नही था । वैसे उस लड़की की बात से हमे भी थोड़ी देर के लिए याद आया कि हमारे पापा को भी मिर्ची के पकोड़े बहुत पसंद हैं।
“आप यही से है या किसी दूसरे शहर से आई हैं ?” म्हारो-थारो बोलने वाले मालवी शहर से इस लड़की की बोली मेल नही खाती थी तो हमने पूछ लिया ।
“जी, हम भोपाल से आए हैं” ये बात तो लड़की ने इतने प्यार से बोली कि उस पल तो अब हमें बैरागढ़ सहित पूरे भोपाल से इश्क़ हो गया था ।
अब हमें कुछ सूझ नही रहा था क्या पूछे सो कुछ देर खामोशी ही रही ।
“स्वारी, हमारी वजह से आपको परेशानी हुई” कुछ देर की खामोशी के बाद उस लड़की ने बात की शुरूआत की ।
“जी नही इसमे परेशानी क्या” अब हमें हलवे की प्लेट लगाने में क्या दिक्कत थी तो हमने भी कह दिया ।
इसके बाद फिर हम दोनों को कुछ नही सूझा तो कुछ देर शांति ही रही । फिर कुछ देर बाद हमे लगा कि वो लड़की जाने को हैं तो तुरंत बात की शुरुआत करते हुए कहा – “वैसे गाजर का हलवा बहुत पसंद है आपको भी, पूरे पांच प्लेट लिया आपने” ।
शायद हम ये प्लेट काउंटिंग वाली बात नही बोलना थी पर थोड़ी देर पहले ही रायते वाला राहुल हमे गिना रहा था तो बात मुँह से निकल गयी । लड़की भी हमारी बात से बुरी तरह झेंप गयी, पर फिर खुद को संभालते हुए बोली – “नही, वो सब प्लेट हमने नही खाई, कुछ तो दुसरो को भी दे दी….वो हम तो स्टाल पर बार-बार अपने पापा को देखने आ रहे थे, उन्हें भी गाजर का हलवा बहुत पसंद हैं पर उन्हें डाइबिटीज़ हैं, ऐसी शादी-पार्टियों में कोई देखने वाला नही होता हैं तो वो अक्सर खा लेते हैं। पहले भी एक शादी में पापा ने मीठा खा लिया था और फिर तबियत खराब हो गयी थी । हम तो स्टाल पर ये देखने आ रहे थे कि हमसे नज़रे बचाकर पापा यहाँ हलवा ना खा रहे हो और आप हमें हलवे की प्लेट दे देते थे ।” इतना बोलकर वो चली गयी और फिर वापस स्टाल पर नही आई ।
अब झेंपने की बारी हमारी थी । हम तो बेचारी लड़की की मदद कर रहे थे पर इसे तो मदद की जरूरत ही नही थी । हम यहां वेलेन्टाइन डे सेलेब्रेट कर रहे थे पर वो तो फादर्स डे मना रही थी। रायते वाला राहुल जलन के कारण ही सही, पर बात सही कर रहा था कि लड़कियों की बिना बोले मदद करना ही नही चाहिए । कहाँ तो हम सोच रहे थे कि पूड़ी के स्टाल पर खड़ी अपनी मम्मी और पकोड़े के स्टाल पर मिर्ची के पकोड़े खा रहे अपने पापा को बुलाये और इस लड़की से रिश्ते की बात चालू करें पर अब उन्हें पूड़ी और पकोड़े पर ही फोकस करने देते हैं । वैसे भी हमारे यार दोस्तो ने ये बात समझाई थी कि लड़कियों के मामले में जल्दी से सेंटी नही होना चाहिए, ये तो हमारे घूमने-फिरने, ऐश करने के दिन है ।जल्दी से सेंटी होने का अच्छा सिला मिल गया हमे ।
दिल भले ही टूटा था पर पूरे वाकये में एक बात हमे बहुत अच्छी लगी कि लड़कियां लड़को का फायदा उठाती हो या ना हो, पर अपने पापा का बहुत ध्यान रखती हैं । पूरे दिन की मेहनत के बाद अब हमें भूख लगने लगी थी तो हमने भी फिर स्टाल छोड़कर प्लेट लगाई और आराम से एक कुर्सी पर बैठकर भोजन करने लगे । कुछ कार्यकर्ता हमे अभी भी भाभी के बारे में पूछ रहे थे पर हम क्या बताते कि भाभी तो हमारे प्यार का हलवा खाकर चली गयी । हमे खुद पर गुस्सा आ रहा था कि हलवा देने के पहले पूछना तो चाहिए था, पर उससे ज्यादा गुस्सा इस बात का था कि वो लड़की तो सब जानकर भी हलवे की प्लेट पर प्लेट लिए जा रही थी । इतने में रायते वाले राहुल ने हमे रायते का दोना थमा दिया और हमने जाम समझ के पूरा रायता एक सांस में गटक लिया और अपना गम और गुस्सा ठंडा कर लिया । उधर स्पीकर पर किसी ने कहो ना प्यार है की कैसेट निकालकर रेडियो लगा दिया था जिस पर बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसा कोई सरकारी विज्ञापन चल रहा था ।

लघु कथा – आजकल तो बस फौग चल रहा हैं !

यू तो मध्य भारत का इंदौर शहर शुष्क स्थानों की गिनती में आता हैं, पर नवम्बर से जनवरी के बीच यहाँ भी अच्छी खासी ठण्ड का असर देखने को मिलता हैं | दिसम्बर के आखिरी दिनों में तो ये बिलकुल शिमला बन जाता हैं | गजब का कोहरा और सर्दी के आगोश में हर कोई ठिठुर जाता हैं | उस दिन भी कुछ ऐसा ही माहौल था, मुझे कुछ काम से सुबह ७ बजे ही शहर से बाहर जाना था | सुबह इतनी जल्दी उठकर नहाना और मोपेड चलाकर बस स्टेशन पहुचना ही बहुत दुष्कर कार्य था, पर मुझे तो अपनी सरकारी नौकरी का कर्तव्य पूर्ण करना ही था | सुबह उठने और नहाने में जरुर थोड़ी मुश्किल आई, पर बस में बैठकर बाहर का दृष्य देखा तो लगा कि प्रकृति के इस रूप को देखने के लिए इतना करना तो बनता हैं | पुरे साल में केवल २ या ४ दिन ही होते हैं जब शहर में इतना घना कोहरा होता हैं | बस में खिड़की वाली सीट पर बैठकर तो जैसे मन की मुराद पूरी हो गयी | बस में दूसरी सवारी बैठ रही थी कि मेरे पास वाली सीट पर मेरे सहकर्मी मिश्रा जी आकर बैठ गए | वो भी बेचारे मेरी ही तरह इतनी सर्दी में अपनी नौकरी करने जा रहे थे | बस ने शहर की सीमा को पार किया और खिड़की के बाहर का नजारा तो और भी मनोरम होने लगा | हरे भरे पेड़-पौधों और खेतो पर जैसे किसी ने सफ़ेद चादर औढ़ा दी हो | जाने क्यों नींद के चक्कर में प्रकृति के इस रूप को देखने से मैं इतने दिनों तक वंचित रहा |

मैं खिड़की से प्रकृति के इन व्यंजनों का रसस्वादन करने में व्यस्त था की मिश्रा जी की आवाज़ ने मुझे ये अनुभुति कराई कि मैं बस में बैठा हु | मिश्राजी ने जेब से नया स्मार्ट फ़ोन निकाला और मुझे दिखाने लगे | “ये देखिये जी, नया स्मार्ट फ़ोन १३ मेगा-पिक्सेल कैमरे के साथ…पुराना ८ मेगापिक्सेल था अब १३ ले लिया ” | वैसे तो आजकल किसी के पास बढ़िया क्वालिटी का स्मार्ट फ़ोन होना कोई अचरज की बात नहीं हैं पर फिर भी मैं मिश्राजी का मन रखने के लिए उनका फ़ोन देखकर बधाई देने लगा | “ये देखिये व्हाटसैप फेसबुक सब चलता हैं इसमें” | वो मुझे फ़ोन की कार्य प्रणाली के बारे में बताने लगे | मैंने ध्यान से उन्हें सुना और फिर से प्रकृति की और रुख करने के लिए मिश्राजी से कहा – देखिये ना कितनी सर्दी हैं…फोग भी कितना हैं बाहर” | मैं इतना बोलकर फिर से बाहर का नज़ारा देखने ही लगा था कि मिश्राजी तपाक से बोले – “अरे इस पर भी एक बढ़िया जोक आया था व्हाटसेप पर – पत्रकारों ने मोदी जी से पूछा कि काले धन लाने की बात पर क्या चल रहा हैं ? तो मोदीजी बोले – आजकल तो बस फोग चल रहा हैं|” ये जोक ना जाने कितने रूपों में अलग ग्रुप से कई बार मेरे फ़ोन पर आ चुका था पर फिर भी मिश्राजी का मन रखने के लिए मैं मुस्कुरा दिया | इतने अच्छे और असली फोग वाले मौसम को देखने की बजाय फोग पर ऐसे उल-जलूल जोक सुनना मुझे कतई अच्छा विचार नहीं लगा | और मैं फिर से बाहर देखने लगा | पर मिश्राजी इतने में नहीं मानने वाले थे – “ये देखिये इस बन्दर का कितना अच्छा विडियो शेयर किया हैं व्हात्सप्प पर” इतना बोलकर वो मुझे बन्दर का विडियो दिखाने लगे जिसमे बन्दर पेड़ पर कूदा-फांदी कर रहा था | संयोग की बात हैं कि बस किसी गाँव से निकल रही थी और खिड़की से हमें भी कुछ बन्दर दिखाई दिए | मैंने मिश्राजी का ध्यान बाहर के बंदरो की तरफ करने की कोशिश की तो कहने लगे कि ये बन्दर वाला विडियो भारत का नहीं बल्कि अमेरिका का हैं | अब मुझे पता नहीं कि अमेरिका में भी बन्दर पाये जाते हैं कि नहीं, पर मिश्राजी को बन्दर के उस रिकार्डेड विडियो के स्थान पर लाइव प्रसारण देखना कतई मंजूर नहीं था | वो तो विडियो देखकर ऐसे ठहाके लगा रहे थे कि जैसे बंदरो की ऐसी हरकत पहली बार देखी हो | “ये देखिये मेरा एक दोस्त हैं – जहाँ जाता हैं वहाँ की मस्त फोटो फसबुक पर डालता हैं..अभी पिछले हफ्ते ही देहरादून होकर आया, वहाँ के प्राकृतिक द्रश्य के कितने अच्छे फोटो डाले हैं फेसबुक पर…देखिये जरा|” निस्संदेह देहरादून एक बहुत खुबसूरत शहर हैं और फोटो भी बहुत अच्छे थे, पर प्रकृति को 5 इंच में देखने की तुलना में आँखों की पलकों से क्षितिज तक देखना कही अधिक मनोहारी लगता हैं | और तो और, आज तो अपने क्षेत्र में ऐसा मौसम हैं कि वो किसी हिल स्टेशन से कम नहीं लग रहा हैं | पर मिश्राजी को ये कतई मंजूर नहीं था, वो तो मुझे अपने दोस्त की फेसबुक प्रोफाइल पर शेयर किये हुए पुरे 46 फोटो दिखाकर ही माने |

मिश्राजी मेरे संकोच का पूरा फायदा उठा रहे थे | एक-एक करके व्हात्सप्प-फेसबुक पर आये हुए चुटकुले, सन्देश, फोटो और विडियो मुझे दिखाने लगे | खुद ही दिखाते और खुद ही सबसे ज्यादा खुश होते | मुझे भी उनका साथ देने के लिए फालतू में ही मुस्कुराना पड़ रहा था | पुरे 2 घंटे के रस्ते में फ़ोन से नज़रे उठाकर एक बार भी इतने अच्छे मौसम को निहारना उन्हें अच्छा नहीं लगा | इतना अच्छा फोग, बन्दर और प्राकृतिक द्रश्य – सब कुछ तो बस की खिड़की से नज़र आ रहा था पर मिश्राजी को तो फोग वाले चुटकुले, बन्दर वाले विडियो और प्राकृतिक दृश्य वाली इमेजेस दिखाने की धुन लग गयी थी | खैर पुरे 24 चुटकुले, 61 चित्र, 18 सन्देश और 5 विडियो दिखाने के बाद जब हम अपने गंतव्य पर पहुचे तो दिल मिश्राजी से बस एक ही बात बोलना चाह रहा था – “मिश्राजी व्हात्सप्प-फेसबुक हमारे फ़ोन में भी चलता हैं और दोस्त हमारे भी हैं…इसलिए अब आगे से किसी को अपना फोन दिखाकर ऐसा बोर मत किया करो” |

दर्द अपना अपना …

(निर्देश :- इंदौर-उज्जैन सड़क मार्ग पर देखी गयी सत्य घटना पर आधारित कहानी)

१००-१२० की रफ़्तार से दौड़ रही गाडियों की गति अचानक ही उस मोड़ पर कम हो रही थी | हर कोई गति धीरे करके उस नज़ारे को निहारता, फिर गाड़ी साइड से निकालते हुए आगे बढ़ जाता | दूर से देखने पर लगता था की कुत्तो के पिल्लो का झुण्ड वहाँ सड़क के बीचोबीच ऐसे ही जमा हो गया हैं | पर पास आने पर दिखाई देता हैं की उनके बीच उन पिल्लो की माँ भी बैठी हुई थी, और उसके नज़दीक ही रखा हुआ था एक नन्हे से पिल्लै का मृत शरीर | वो पिल्ला शायद किसी तेज़ गति की गाड़ी के नीचे आ गया होगा | पेट की आंते बाहर आ गयी थी, सड़क पर कुछ खून भी फ़ैल गया था, शरीर पूरा अकड गया था और वातावरण में भयानक बदबू फैली हुए थी | पर इतने पर भी वो पिल्लो का झुण्ड और उनकी माँ वहाँ से जरा सा भी सरकने को तैयार नहीं थे | वहाँ से निकल रही गाडियों में बैठी संभ्रांत महिलाये अपनी नाक पर रुमाल रखकर बड़ी घृणा से वो द्रश्य देख रही थी | और पुरुष तो ऐसे देख रहे थे जैसे ये उनके लिए रोज की बात हो | कुत्ते के उस छोटे से पिल्लै को सहानुभूति से देखने पर शायद उनकी पौरुषता पर दाग लग जायेगा | पर इस सब से बेखबर इन दुखहारियो पर गाडियों के हार्न से ना कुछ फर्क पड़ रहा था, ना ही तेज़ गति से आ रही गाडियों के नीचे आ जाने जाने का उन्हें कोई भय था | ना वहा कोई भौक रहा था, ना वहाँ कोई रो रहा था | बस माहौल में अजीब सी शांति फैली हुई थी, जो किसी के लिए अचरज का प्रतीक थी तो किसी के लिए दर्द का प्रतीक |

अचानक वहाँ एक बस रुकी और कुछ यात्री उतरे | बस के कंडक्टर ने एक पत्थर उस झुण्ड पर दे मारा | कुछ पिल्लै झुण्ड को छोड़कर इधर-उधर दौड़ाने लगे | बस से उतरे एक यात्री ने दूसरा पत्थर फेककर बाकि झुण्ड को भी वहाँ से हटाने की कोशिश की | अभी सारे पिल्लै वहाँ से भाग चुके थे | पर उन पिल्लो की माँ अभी भी बैठी हुए थी, अकेली उस मृत शरीर को चुपचाप टकटकी लगाकर देखते हुए | शायद शोकाकुल माँ को अभी भी ये उम्मीद थी की सड़क पर फैली ये आँते सिमटकर पेट में चली जायेंगी और पिल्ला फिर से खड़ा हो जायेगा | अभी कंडक्टर ने तीसरा पत्थर मारा जो सीधे कुतिया को लगा | ड्राईवर भी बस उसके सामने लाकर जोर-जोर से हार्न बजाने लगा | अभी कुतिया को भी अपने दिल पर पत्थर रखकर वहाँ से उठकर जाना पड़ा, पर उसकी अत्यंत धीमी चाल और मुड-मुड़कर पीछे देखना ये बता रहा था की वो वहाँ से कही और जाने को कतई तैयार नहीं हैं | कुतिया सड़क के किनारे जाकर खडी हो गयी और वही से पिल्लै को निहारने लगी | बस के गुजर जाने पर उसने वापस अपने स्थान पर आने की कोशिश की, पर पीछे से आ रही निरंतर गाडियों ने ये मुमकिन नही होने दिया | अभी वो किनारे पर खडी होकर पिल्लै के शव की निगरानी करने लगी | एक तेज़ गति की गाड़ी पिल्लै के सीधे पेट पर से गुजरी और उसकी बची कुची आँते भी बाहर आकर बिखर गयी | इसके बाद तो गाड़िया निरंतर उस मृत पिल्लै के चिथड़े उड़ाने लगी | पर वो कुतिया काफी देर तक चिलचिलाती धुप में सड़क के किनारे खडी होकर मृत शरीर को देखती रही की शायद किसी पल तो ये खून और आँते सिमटकर शरीर के अन्दर चली जाये और वो मृत पिल्ला पुनः जी उठे …


मुझे नहीं पता कि उसके दर्द की सीमा क्या हैं | हर रोज उसका पति रात को शराब पीकर आता और उसके साथ बुरा व्यवहार करता | उसे गन्दी-गन्दी गालियाँ देता, उसके साथ मारपीट करता, और वो पत्थर के बुत की तरह हर अत्याचार सहन करती | ये सब कुछ सहन करते हुए उसे पांच वर्ष हो गये, पर इन पांच वर्षो में ना उसने कभी पति का साथ छोड़ा और ना कभी किसी से कोई शिकायत की | हाँ, गली-मोहल्ले की औरतो के सामने अपनी किस्मत का रोना वो जरूर रोती रहती थी | भगवान ने दर्द सहने की शक्ति औरतो को मर्दों से ज्यादा दी हैं, पर इतनी ज्यादा दी हैं कि वो हर अत्याचार चुपचाप सहन करती रहे ये मैं नहीं जानता था | पुराने लोग ये भी कहते हैं कि हर औरत के दौ रूप होते हैं, एक सती सावित्री की तरह प्यार लुटाने वाले और दूसरा चंडी की तरह संहार करने वाला | मैं उसका सती सावित्री वाला रूप तो देख चूका था और अब मुझे इंतजार था की कभी तो ये सावित्री इस अत्याचार से तंग आकर चंडी का रूप लेगी | पर मेरा ये इंतज़ार कभी पूरा होने वाला नहीं लगता था और उसके साथ ये सब होते देखना मेरे लिए आम बात हो चुकी थी |

उस दिन उसके घर से दोपहर में ही कुछ लड़ने की आवाज़े आ रही थी | इन आवाजो में उसकी तीव्र गर्ज़ना शामिल थी, पर उसके पति की आवाज़ पूरी तरह से गायब थी | मुझे लगा आज ये सती-सावित्री चंडी का रूप ले चुकी हैं और अपने पति को सबक सीखा रही हैं | अत्याचारी पुरुष समाज को दंड मिलते देखने की उम्मीद से मैं तुरंत अपने घर से निकला और उसकी गली में पहुचा | उसके घर के सामने काफी भीड़ थी | उस भीड़ को हटाते हुए जब मेने उसे देखा तो हमेशा के विपरीत वो आज बहुत गुस्से में दिख रही थी | उसके बाल खुले हुए थे और अपने पति से सीखी गालिया आज वो सुना रही थी | उसके हाथ में एक डंडा था, जिससे वो उस जैसी ही एक औरत को बेतहाशा पीटे जा रही थी | ये देखकर मुझे आश्चर्य हुआ की इस मौके पर उसका पति मौजूद ही नहीं था | आसपास के लोगो से पता चला की वो कोने के मकान में रहने वाली विमला हैं, जिसे वो इस तरह पीट रही थी | कल रात उसने विमला को अपने पति के साथ देख लिया | वैसे आस-पडोस की औरते हमेशा उसके पति और विमला के किस्से उसे सुनाती रहती, पर कल रात के वाकये से उसे उनकी बातो पर पूरा विश्वास हो गया | आज पति के जाने के बाद उसने सीधे विमला को बुलाया और उससे जवाब-तलब किया | बातो-बातो में बात बढ़ गयी और उसने गुस्से में आकर विमला को पीटना शुरू कर दिया | गली की कुछ बुजुर्ग औरतो ने दोनों को अलग किया और मामले को रफा-दफा किया, पर तब तक वो विमला को अच्छा-खासा सबक सीखा चुकी थी |

रात में उसका पति घर आया | उसने रोज की तरह फिर उससे मारपीट की और वो हमेशा की ही तरह सहन करती रही | मुझे समझ में नहीं आया कि दिन में अपने प्यार को बचाने के लिए चंडी का अवतार लेने वाली ये औरत अब मूक क्यों हैं | क्या उसका गुस्सा केवल औरतो के लिए था, आदमी के लिये बिलकुल नहीं | उस नाजायज सम्बन्ध में गलती केवल विमला की ही नहीं थी, बल्कि उसका पति भी बराबरी का हिस्सेदार था | तो फिर उसने सजा केवल विमला को ही क्यों दी ? क्या वो पूरी तरह से पुरुषो की गुलामी स्वीकार कर चुकी हैं | दिन में विमला ने पुरुष से रिश्ता रखने के लिए अत्याचार सहा और रात में उसने, पर वो पुरुष अभी भी अपने अत्याचारी होने के अहसास से भी अनजान था | समझ में नहीं आया कि औरत का असली दुश्मन कौन हैं, ये पुरुष समाज या वो खुद |