बरसो हुए


कल वाले दिन अब परसों हुए
उस जुनू को जिये बरसो हुए

दिन कटता था जिसके दीदार में
उस इश्क़ को किये बरसो हुए

वो भी क्या दिन थे
लगता हैं सब कल परसों हुए

हाथो में हाथ हसीना का साथ
उसे बाँहों में भरे बरसो हुए

जिस मंज़र से की थी इस क़दर चाहत हमने
उस गली से गुजरे बरसो हुए

याद करता हैं वो चौक का चौकीदार हमें
इस मोहल्ले में चोरी हुए बरसो हुए

“ठाकुर” आ जाओ तुम फिर से अपने रंग में
कि तुम्हे भी किसी का दिल चुराये बरसो हुए

आशिकों कि ज़मात में एक तुम्हारा भी नाम हो
जो मिटाए ना मिटे फिर कितने भी बरसो हुए

बम


उस घर पर बम ना गिराना कि वहाँ भी एक बेटा रहता हैं
खटिया पर खांसता हुआ एक बुढा भी लेटा रहता हैं !

एक धमाका खामोश कर देता हैं मुस्कान कई माँऔ की
क्या बम बनाने वाले नहीं जानते कि माँ का भी कलेजा रहता हैं !

जहाँ बम नहीं गिर रहे वहाँ बन्दूके निकल आई हैं
मजहब के नाम पर मौत की संदूके निकल आई हैं !

मैं जानता हूँ मेरे दरवाजे पर किसी धमाके की आवाज़ नहीं आती हैं
देखते हैं कब तक मेरा शहर इस गूंज से महफूज़ रहता हैं !

शान से कह देते हैं हम लोग कि हमें क्या करना हैं
हर कायर इस मुल्क में मासूम बनकर रहता हैं !

हर सुबह “ठाकुर” खुद से ये सवाल पूछता रहता हैं
अख़बार की इन सुर्खियों पर तू कैसे चाय की चुस्किया लेता रहता हैं !

पुल


सपने अपने होते हैं, हकीकत बेगानी होती हैं
जो मिल जाये ये दौनो तो महान जिंदगानी होती हैं !

वैसे ये ज़िन्दगानी भी किसी नदी की तरह होती हैं
इसके एक किनारे पर सपने तो दूजे पे हकीकत होती हैं !

दौ किनारों को मिला सके ये हुनर तो खुदा में भी नहीं
हम इंसानों की कोशिश तो इन किनारों पर पुल बनाने की होती हैं !

मिट्टी सपनो की होती हैं, पत्थर हकीकत के होते हैं
और जो जमा दे इन दोनों को वो पकड़ इरादों की होती हैं !

कमबख्त ये बहाव, उलझाव इरादों को पकड़ बनाने भी नहीं देता
जिस पत्थर को उठाओ उसकी मंशा बह जाने की होती हैं !

बस बहती नहीं हैं तो ये ख्वाहिश पुल बनाने की
इसकी इच्छा तो हरदम वक़्त को मुँह चिड़ाने की होती हैं !

पर ये वक़्त ये बहाव किसी का हमदम नहीं दोस्त
इसकी फितरत भी बस बह जाने की होती हैं !

“ठाकुर” वक़्त रहते अपना ये पुल बना लीजिये
ना जाने कौन सी घड़ी साँसों के बिखर जाने की होती हैं !

 

 

Dream, Dare and Define the Destiny


In this whole world, it’s just you and your integrity are with you
In this whole planet, it’s just you and your integrity are in your control
Believe in you and feel the integrity
Because rest of the world is just shape of this unity.

Close the eyes and see your eternity
Listen your voice and know the almighty
When you break the boundaries and touch the equity
You will know one truth of law of dignity.

You are not here to repeat the heredity
You are here to dream, dare and define your destiny.

(Note – This poem is purely inspired by Rabindranath Tagore’s poem ‘Where the knowledge is free.’)

 
~ Ankit Solanki

 

गीत : वो मंजिल मुझे मिलेगी जरूर …


आसमानों से आगे और क्षितिज से दूर,
वो मंजिल मुझे मिलेगी जरूर …
रब की होगी रजामंदी उसमे,
और किस्मत को भी होगी कुबूल !
वो मंजिल मुझे मिलेगी जरूर …

सामने हैं समंदर मेरे पर कश्ती हैं बहुत दूर
लहरों की गुजारिश हैं संग खेलना हैं जरूर !
लगने दे डर थोडा, होने दे थोड़ी भूल
सैलाबों से लड़ना हैं तो हिम्मत भी दिखानी होगी जरूर !
कश्तियो सी डोलती और किनारों से दूर
वो मंजिल मुझे मिलेगी जरूर …

बचपन में सुनी थी एक कहानी मशहूर
जो रखता हैं धीरज वही जाता हैं दूर !
फूल तो मुरझाकर हो जाता हैं चूर
पर ये खुशबू उसकी हो जाती हैं मशहूर !
उस फूल सी कोमल और खुशबू से भरपूर
वो मंजिल मुझे मिलेगी जरूर …

पानी की खोज में गड्डा खोद रहा एक मजदूर
मिट्टी के ढेलो से पता पूछ रहा एक मजदूर !
जो मिल जायेगा पानी तो जी जायेगा ये मजदूर
वरना अपनी कबर तो खोद रहा ही ये मजदूर !
उस पानी सी बेशकीमती और कब्र सी निष्ठूर
वो मंजिल मुझे मिलेगी जरूर….

वो मंजिल मुझे मिलेगी जरूर !
रब की होगी रजामंदी उसमे,
और किस्मत को भी होगी कुबूल !
वो मंजिल मुझे मिलेगी जरूर …

करीम और केदार


करीम
मेरा एक दोस्त हैं जिसका नाम करीम हैं,
उसे लगता हैं मेरी हर ग़ज़ल ताज़ातरीन हैं !
ज़िन्दगी जीने का वो बड़ा शौक़ीन हैं
अल्लाह पर भी उसको बहुत यकीन हैं !
अपने मोहल्ले का वो तबलची नामचीन है
और मीठे से ज्यादा उसको पसंद आता नमकीन हैं !
वो कहता हैं कि मज़हब तो बस जज्बाती ज़मीन हैं
वहाँ खड़े हो जाओ जहा अपना-अपना यकीन हैं !
असल मोहब्बत तो इंसानी भाईचारा और ये सरज़मीन हैं
इससे गद्दारी मतलब खुदा की तौहीन हैं !
मैं जानता हूँ इस मुल्क में ऐसे न जाने कितने करीम हैं
पर उनमे न शामिल अब मेरा दोस्त करीम हैं !
क्युकी कल दंगो में मारा गया करीम हैं
और उसके गम में मेरी ग़ज़ल ग़मगीन हैं |

 

केदार
मेरा एक दोस्त हैं जिसका नाम केदार हैं
वो कहता हैं मेरी हर कविता भगवान का चमत्कार हैं !
दिखने का वो सीधा सा और पेशे से लुहार हैं
मेहनत की रोटी खाता वो आदमी होनहार हैं !
वो मानता हैं कि ये धरम-वरम तो बस बारिश की बौछार हैं
कही भी भीग लो सब कुछ कुदरत का उपहार हैं !
असल प्रेम तो ये मिट्टी और मानवीय सदाचार हैं
इससे वफादारी मतलब भगवान की जयकार हैं !
मैं जानता हूँ इस देश में ऐसे ना जाने कितने केदार हैं
पर उनमे अब ना शामिल मेरा मित्र केदार हैं !
क्योकि कल दंगो में मारा गया केदार हैं
और उसकी कमी से मेरी कविता बेकार हैं !

वो गीतों में मेरे रंग भर देता हैं !!


वो गीतों में मेरे रंग भर देता हैं ,
छेड़कर तारों को तरंग भर देता हैं
मेरे ही ख्वाबो ख्यालो को बुनकर
इन गज़लों को मेरे संग कर देता हैं !

मैं सो भी जाऊ तो वो मेरे संग रहता हैं
बेरंग सपनो को सतरंग कर देता हैं
ये उसका ही हाथ रखा हैं मेरे ऊपर
जो हर मौसम को बदलकर बसंत कर देता हैं !

आवाज़ नहीं उसकी पर सुर निराले हैं
नज़र नहीं उसकी पर नैन मतवाले हैं
सारी दुनिया हमारी पर हम उसके दीवाने हैं
वही हैं जिसे हमसे इतने फ़साने लिखवाने हैं !

वो हर अहसास को मेरे आवाज़ दे देता हैं
शोर को भी साज़ दे देता हैं
ख्यालो को थोड़ी आँच दे देता हैं
और गीतों में मेरे बाँट देता हैं !

वो कविताओ में मेरी कूक भर देता हैं
दिल से निकली हूँक भर देता हैं
मेरे ही मुह से निवाला खाकर
वो मुझमे लिखने की भूख भर देता हैं !

मन को मेरे मलंग कर देता हैं
जोड़कर इरादों को बुलंद कर देता हैं
डर को डिब्बो में बंद कर देता हैं
और ज़ख्मो को इस कदर पैबंद कर देता हैं !

वो गीतों में मेरे रंग भर देता हैं ,
छेड़कर तारों को तरंग भर देता हैं !!

सियासत


बात मुझसे जुडी हो तो जानना जरूरी हैं
समस्या कैसी भी हो समझना जरूरी हैं

कितनी भी बात करे हम लोग भलाई की
भला करने के लिए बुराई लेना भी जरूरी हैं

ये लोग जिन्होंने सियासत को खेल बना रखा हैं
जानते नहीं की खेलने के लिए मैदान साफ रखना भी जरूरी हैं

एक अरसा हो गया इस खेल से खिलवाड़ होते देखते
कि अब इस खेल के दर्शको का जागना जरूरी हैं

मैं जानता हूँ कि मेरी एक आवाज़ से कुछ नहीं होगा
मेरी आवाज़ से तेरी आवाज़ का मिलना जरूरी हैं

रोटी के लिए जीने वालो कुछ सोचो मुल्क के बारे में
कि चिराग के जलने के लिए हवा का चलना बहुत जरूरी हैं

– अंकित सोलंकी
२८ जुलाई २०१३, उज्जैन (म.प्र.)

सितम


ज़िन्दगी एक सितम मेरे नाम कर
मुझे नाम दे या बदनाम कर

यु ना मेरी सूरत को गुमनाम कर
इसे पहचान दे या कुरबान कर

आसमाँ को ताकू इस आरज़ू से मैं
कि कोई तो नज़राना मेरे भी नाम कर

लायकी नहीं तो आशिक़ी में बखान कर
नायको में नहीं तो खलनायकों में शुमार कर

बस एक किस्सा मेरे भी नाम कर
कि देखे मुझे लोग सांसो को थामकर

“ठाकुर” मेरी छलांग में इतना फौलाद भर
की एक पैर हो जमी पे और दूजा हो चाँद पर

 

 

ख़ुशी


रुई का गद्दा बेचकर दरी खरीद ली,
ख्वाहिशो को कम किया और ख़ुशी खरीद ली !

कुछ पुरानी पतलून बेचकर चड्डी खरीद ली,
क्रिकेट को छोड़ा और कबड्डी खरीद ली !

सबने ख़रीदा सोना मेने सुई खरीद ली
सपनो को बुनने जितनी डोर खरीद ली !

मेरी एक ख्वाहिश मुझसे मेरे दोस्त ने खरीद ली,
फिर उसकी हँसी से मेने अपनी ख़ुशी खरीद ली !

इस ज़माने से सौदा कर एक ज़िन्दगी खरीद ली,
दिनों को बेचा और शामे खरीद ली !

सपनो के सिनेमा में एक सीट खरीद ली,
चुकाया पूरा बिल और पक्की रसीद ली !

रुई का गद्दा बेचकर दरी खरीद ली,
ख्वाहिशो को कम किया और ख़ुशी खरीद ली !

मेरा गाँव, मेरा देश


 

गाँव वीरान हैं, कसबे बेजुबान हैं
शहरों में रहने चला गया वो जो घर का जवान हैं

आता हैं घर ऐसे जैसे मेहमान हैं
बूढी आँखों को फिर भी इतने में इत्मिनान हैं !

कहने को नगर हैं, कहने को महानगर हैं
ऊँची इमारतों के नीचे पर एक लम्बी गटर हैं !

आदमी हैं कुत्ता जहाँ और औरत बिल्ली हैं
मुंबई हैं मुसीबत यारो और डरावना दिल्ली हैं !

हैं कुछ नौजवान दोस्त मेरे जो पढ़ न सके
कुछ तो अच्छा किया जो माँ-बाप संग रह सके !

आया जब भी गाँव में मैं अपनों की खोज में
था अकेला में जवान वहाँ बुढ्ढो की फ़ौज में !

कभी कटती थी फसल जिन खेतो और खलिहानों में
आज कालोनिया कट रही थी वहाँ मिटटी के मैदानों में !

कुछ रहे ना रहे मेरा गुरुर जरूर मिट जायेगा
गाँवो का गुलशन एक दिन शमशान में बदल जायेगा !

वो गाँव की गौरी बस तरानों में रहेंगी
वो पनघट वो बोली बस बातों में रहेंगी !

मैं सोचता हु उस समय भी ये आबादी क्या इसी मजे में रहेंगी
भूँख से बिलखती सोसायटी क्या मोबाइल से पेट भरेगी !

शाम होने को हैं यारो, रात भी होकर रहेंगी
सुबह का सूरज क्या सूरत लेकर आये, ये बात डराती रहेंगी !

 

Epilogue – This poem is my concern about our villages that are losing their identity on the map of shining India. Rather than facilitate villages and small towns with basic needs of life, we are destroying them on the name of development and modernization. It’s really pinching me to see the pictures like green farms are converting into colonies and the migration of youngsters from towns to metro cities. I put all such thoughts and emotions on paper with the hope that it makes you feel some hotness of the fire that is burning inside me.

जवान


साल दर साल मेरे ख्याल बदलने लगे,
उमर जो बढ़ी तो बाल पकने लगे !
वो मासूमियत तो बचपन कब का अपने साथ ले गया,
अब तो लड़कपन के मुंहासे भी सूरत से झरने लगे !
वो माँ हैं जो कहती हैं कि मैं अब भी बच्चा हूँ,
वरना कुछ लोग तो मुझे अभी से बूढ़ा भी कहने लगे !
ये आईना ही हैं जो अपने दाम का पूरा हक अदा करता हैं,
दाढ़ी मुछे जो हटाई तो गा्ल गुलाबी चमकने लगे !
हम निकले जब भी ऐसे सज-धजकर शहर के बाजारों से,
हसिनाओ की नजर ना पड़ी पर बुजुर्ग जरूर बातें करने लगे !
कुछ समझाइश देने लगे, कुछ खरीद-फ़रॉख्त करने लगे,
गोयाकी हम इश्क़ खरीदना चाहते थे और वो शहनाई बेचने लगे !
यहाँ सब लोग कहते हैं कि तुम जवान हो गए ठाकुर
पर लोगो के ऐसे जोक मुझे हैरान करने लगे !
कुछ हैं जो बहुत पीछे छोड़ आये हैं हम
याद वो आता नहीं पर हम इंतज़ार करने लगे !

गुदगुदी


कोई तो गुदगुदी करो जोरो से यारो
कि आज मुझे हँसी नहीं आती

वो मुस्कान जो मरती थी कभी सूरत पर मेरी
आजकल चेहरे पर चाहकर भी नहीं आती

वैसे कोई क्यों करे कोशिश हमें हँसाने की आंखिर
गैरो से ये उम्मीद रखी भी नहीं जाती

वो दूर हो गए, भूल गए मेरे चाहने वाले जब से
उनकी आदत ज़िन्दगी से भूली भी नहीं जाती

हम आज भी बैठे हैं कि कोई आएगा साथ मुस्कराने को
पर इंतज़ार के इस आलम में ठिठोली भी नहीं होती

कोई कहे कैसे जमाये इन बिखरे बालो को ए ठाकुर
कि उदास सूरत अब आईने से भी देखी नहीं जाती

“एक दिन दोस्तों के बिन”


कैसे गुजरा वो एक दिन,
एक दिन दोस्तों के बिन !
शुरू हुआ बिना शोर के,
ख़त्म हुआ शरारतो के बिन !
…वो एक दिन दोस्तों के बिन…

याद किया उन यारो को,
यादो को, यारो के बिन !
कुछ गुजरे हुए उजले दिनों की,
बातो को, खुराफातो को, आफतो के बिन !

…कैसे गुजरा वो एक दिन…
…एक दिन दोस्तों के बिन …

 

ऊँचे, नाटे, दुबले, मोटे
हर किस्म के नमूनों को बीन
रंग जमाती थी टोली मेरी
टुएशन हो या टपरी केन्टीन

ना था मैं अलादीन उनका
ना थे वो मेरे जिन्न
फिर क्यों अधूरी हर ख्वाहिश मेरी
उन खुसठ खरगोशो के बिन !

…कैसे गुजरा वो एक दिन…
…एक दिन दोस्तों के बिन …

 

चाल में थी मस्ती उनके
और आँखों में थे दूरबीन
दिल के थे लाख भले वो
पर हरकतों से थे पूरे कमीन

ना था उनमे सलमान कोई
ना ही था कोई उनमे सचिन
फिर क्यू रात अँधेरी मेरी
उन अनजान सितारों के बिन

…कैसे गुजरा वो एक दिन…
…एक दिन दोस्तों के बिन …

 

कोई डूबा कन्या के जाल में
तो कोई था बस किताबो में तल्लीन
हर कोई था कुछ हट के जरा
थोडा सा मीठा तो थोडा नमकीन

ना था कोई शेक्सपीयर उनमे
ना था कोई अलबर्ट आइन्स्टीन
फिर क्यू खाली दुनिया मेरी
उन महा-नालायक महा-पुरुषो के बिन

…कैसे गुजरा वो एक दिन…
…एक दिन दोस्तों के बिन …

एक पाती पिता के नाम


सर्द मौसम में भी मिजाज गरम हैं
जुबाँ हैं उसकी सख्त पर मन नरम हैं

फटकार में भी जिसकी प्यार का मरहम हैं
सूरत हैं संजीदा सी वो पर दिल में रहम हैं

मुसीबत में सबके हिस्से के खाता जखम हैं
खुशियों में खामोश बनकर रखता संयम हैं

प्यार जताने में जैसे उसको आती शरम हैं
जो भी मिला पर ज़िन्दगी में बस उसका करम हैं

जरा पूछो जहाँ में उनसे, जिनके वालिद ख़तम हैं
ये दुनिया बिन बाप के कितनी बेरहम हैं

रूह का आँचल


भला-पूरा पागल हूँ मैं
गिरा-संभला आँचल हूँ मैं

जो ढलका कभी तो जमीं से जुड़ गया मैं
जो उड़ा कभी तो हवाओं में घुल गया मैं

क्या हुआ जो सर से थोडा सरक गया मैं
पागल हवाओ को पहले परख गया मैं

कोई जख्म तो तेरे जिस्म पर नहीं दे गया मैं
मुहब्बत की बादलो से तो बारिशो में बह गया मैं

तेरी तू सोच मुझे अपने हाल पर छोड़ दे
दामन को मेरे अपने काँधे से तोड़ दे

कर कोशिश अपने पैरो को ज़माने की ज़रा
आसमान तक उड़ने में जमीं को न छोड़ दे

में तो हूँ परिंदा ‘ठाकुर’,उड़ता ही चला जाऊंगा
तू देख कोई काफ़िर तेरा घरोंदा न तोड़ दे

फितरत…


क्यों किसी को कुछ बताते नहीं
रोते हैं पर आँसू दिखाते नहीं

कितने किस्से दिल को हैं कहना
लफ्ज़ जुबा तक पर आते नहीं

जबान अपनी, आवाज़ अपनी
अपने ही मन की बात सुनाती नहीं

कैसे करे किसी और का भरोसा हम
जब आहट खुद की ही सुन पाते नहीं

हैं जो मन के भीतर, एक तुफां हैं
उमड़ता हे अकेले में पर भीड़ में खो जाता हे कही

इसे शरमाना कहे या शराफत का नाम दे ..
कि शेर होकर भी शौक शिकार के दिखाते नहीं…

ये कैसी फितरत में ढाला हैं हमको खुदा ने
जाम हे हाथो में पर लबो से लगा पाते नहीं…

कोई कहे कैसे जिए इस कशमकश में अब
डरते हे बहकने से और पिये बिना रह पाते नहीं…

रंग लहू के


रंग लहू के कितने रंगों में बदल जाते हैं
बने तो भारत, ना बने तो पाकिस्तान में बँट जाते हैं !!

मोहब्बत वो बचपन की दिल कुछ यु भूल जाते हैं
रात के सपने सारे सुबह आँखों से धुल जाते हैं !!

संग-संग सगे-सगे ना संग रह पाते हैं
रंग-रंग वो प्यार के जंग में जुट जाते हैं !!

कैसा होता हैं जब दौ भाई भिड़ जाते हैं
हाथो में तलवार लिए माँ का दामन चीर जाते हैं !!

कर्ज दूध का दरिन्दे कुछ यु चुकाते हैं
लहू बहाकर सीने से खूनी खीर पकाते हैं !!

काया को माँ की कुटिल काँटों से कुरेदते हैं
कटा कुछ तो बंगलादेश, ना कटा तो कश्मीर लटक जाते हैं !!

नफरत की इस नहर में नौजवान नंगे नहाते हैं
बैर ये बुजुर्गो का अब भी पाठशाला में पढ़ाते हैं !!

किताबे इतिहास की इंसानियत को इलज़ाम देती हैं
तेरे रक्त के रंगों से मेरी स्याही बदनाम होती हैं !!

कब तक कोई किस्सा कारगिल और कसाब पर लिखे हम
अच्छा हैं कोई कविता पेशाब पर लिखे हम !!

खोज खुदा की


कोई ख़ुशी दिल में खलबली मचा दे,
कोई गम दिल को लहूलुहान कर दे,
या खुदा, कर पैदा कुछ तो हालत ऐसे
जो ताउम्र मुझे तेरा तलबगार कर दे !

तेरी तरह धीरज नहीं धर सकता मैं
मन हे मासूम, कुछ कर नहीं सकता मैं
तू ही हैं जो मुझसे ज्यादा जान सकता हे मुझे
बना ऐसा मुक्क़द्दर जो मुझे तेरा मुरीद कर दे !

दौलत किसी गरीब को बक्श दे
सेहत किसी बीमार को बेच दे
गल नहीं मुझे गर गम परोस दे
बस हो एक हरकत जो तेरे होने की सोच दे !

किस्सों में सुना था तू बड़ा महान हैं
माँ को भी तुझ पर बहुत गुमान हैं
दिल को तेरी शख्सियत पर फिर क्यों सवाल हैं
कौन हैं ये खुदा और उसका क्या योगदान हैं !

तालीम तेरे होने की तरफदारी नहीं करती
कायनात तेरे अकेले की कारीगरी नहीं लगती
जाने क्या देखती हैं ये दुनिया इन पत्थरो-मजारों में
क्या हैं इनमे सूरत कोई जो मुझे दिखाई नहीं देती !

मुझ पर नहीं तो खुद पर रहम कर
तेरे अस्तित्व पर हैं सवाल, कुछ तो शरम कर
देख कभी तू इन बूत-ताबूत से निकलकर
बहा हैं खून बेहिसाब तेरे नामो-निशान पर !

उम्मीद तू देता हैं तो नफरत कौन सिखाता हैं
दोस्त तू बनाता हैं तो दुश्मनी कौन कराता हैं
तू दवा भी देता हैं और दर्द भी बढाता हैं
कितनी दोगली हैं हस्ती तेरी, आग लगाकर पानी भी बरसाता हैं !

सोचता हूँ दुनिया से तेरा नाम ही मिटा दू
ना अल्लाह को कोई जाने, ना राम का नाम हो
न जिये कोई तेरे करम से, ना तेरे नाम पे खाक हो
इंसानियत के हक में बस ये एक गुनाह माफ़ हो !

तेरे जोग में मैं जोगी बन जाऊंगा
या आँखे मूंदकर भोगी बन जाऊंगा
अज्ञान के अंधेरो की कालिख बन जाऊंगा
या नयी इबारत तेरे नाम की लिख जाऊंगा !

शहर


इस शहर की गलियों में गफलत हैं बहुत,
आवाज़े हे कम पर शोर हे बहुत

हवाए भी रखती हे यहाँ आग का असर
खुशबूये हैं कम जिनमे पर धुआं हे बहुत

तनहा मायूस लगती हर सूरत संजीदा यहाँ
ख्वाहिशे घुटी हैं जिसमे, हसरते सहमी हैं बहुत

डर गुस्से का हर किस्सा होता निगाहों से बयाँ यहाँ
कुछ आँखे रोई हैं बहुत, कुछ गुर्रायी हैं बहुत

मतलबपरस्त हो चूका इमां हर इन्सां का
खुदाई दिखती कम पर खुदगर्जी बिकती हे बहुत

कितनी बेरहम हे दुआये खुदा के दलालों की भी
हमदर्दी हैं गुम जिसमे पर नफरते महकती हैं बहुत

कुछ कारण हैं कि लिख रहे हे ऐसी गजल गाली खाने को
वरना महफ़िल में तारीफे हमने भी बटोरी हैं बहुत

ये किस शहर में आ गए ‘ठाकुर’ तुम अपनी तकदीर तराशने को
पत्थरो कि हैं हुकूमत हर जगह यहाँ और फूलो कि ज़िल्लत हैं बहुत

मत पूछ मेरे हौसलों की हदों के बारे में


मत पूछ मेरे हौसलों की हदों के बारे में,
ये वो पंछी हैं, जो जानते ही नहीं सरहदों के बारे में !
उड़ते रहते हैं ये निरंतर ख्वाहिशो के आसमानों में,
और बाज नहीं आते कभी तकदीर को आजमाने से !

रूठ जाती हैं तकदीरे कभी, बदल जाता हे वक़्त भी
दगा देते हैं इंसा अपने, दिक्क़ते देती उम्र भी
बस ये हौसले ही हैं जो कभी रुठते नहीं
हारती हैं ज़िंदगियाँ पर ये कभी हारते नहीं

मत पूछ क्या हासिल हैं इन हौसलों की वजह से
ये वो पंछी हैं, टिका हैं आसमा जिनकी वजह से
ढूंड लाते हैं ये रोजाना ज़िन्दगी का दाना
और भूलकर सारे गम गाते हैं मस्ती का तराना

आया था इक दिन जब हार गए थे ये हौसले
कट गए थे पर इनके, टूट गए थे घौसले
लग रहा था अब न उड़ सकेगी ये कोपले,
पर अगले दिन फिर निकल पड़े ये तिनको को धुंडने
एक-एक तिनका बीनकर, लगे फिर आशियाना जोड़ने

मत पूछ उस दिन इन हौसलों की हालत के बारे में
कुछ सोच ही नहीं रहे थे ये उस दिन राहत के बारे में
उड़ रहे थे उस दिन ये उम्मीद के आकाश में
आसुओं को पौछ्कर आशियाने की तलाश में

ये हौसले भी किसी हकीम से कम नहीं होते हैं,
हर तकलीफ को ताक़त बना देते हैं,
और दर्द से भी दवा चुरा लेते हैं !
एक ख्वाहिश टूटे तो हज़ार ख्वाब सजा लेते हैं,
और छोटी-छोटी कोशिश से मुक़द्दर बना देते हैं !

मत पूछ क्या हाल होगा इन हौसलों के न होने से
मर जाता हैं पंछी कोई पिंजरों में क़ैद होने से
मोह नहीं रहता उसे न खाने में न जीने में
और मर जाती हैं तमन्ना उड़ने की फडफड़ाकर सीने में

मत पूछ मेरे हौसलों की हदों के बारे में,
ये वो पंछी हैं, जो जानते ही नहीं सरहदों के बारे में !
उड़ते रहते हैं ये निरंतर ख्वाहिशो के आसमानों में,
और बाज नहीं आते कभी तकदीर को आजमाने से !

खुशी


खुश हो तो खुशी दिखना चाहिए
दिल से निकलकर चेहरे से टपकना चाहिए

हँसने के हर मौके को लपकना चाहिए
ठहाके की आवाज़ मंज़र में ठहरना चाहिए

कोई जादूगर नहीं जो मन की बात समझ ले
अहसास को अल्फ़ाज़ में बयां करना चाहिए

आये कोई मिलने तो उसे ये लगना चाहिये
ये आदमी हैं दिलचस्प इससे मिलते रहना चाहिए

वक़्त तो बदलेगा उसे बदलना चाहिए
ये मुस्कान आपके हौठो पर हमेशा ठहरना चाहिए

और कोई मक़सद नही मेरा कुछ लिखने का
बस आपका और हमारा याराना यूँही चलना चाहिए

बचपन


खेल तो वही हैं पर हाथो में अब कंचे नही हैं
इम्तहान तो रोज देते हैं पर अब हाथो में पर्चे नही हैं
दुनिया तो पहले भी झूठी थी, पर अब हम भी उतने सच्चे नही है
ये सच हैं यारो अब हम बच्चे नही हैं !

खिलौने अब उतने अच्छे लगते नही हैं
दोस्त अब आसानी से बनते नही हैं
लोग तो पहले भी कमीने ही थे, पर अब हम भी उतने अच्छे नही हैं
ये सच हैं यारो अब हम बच्चे नही हैं !

डिग्री तो ले ली पर ज्ञान स्कूल के बस्ते में ही है
पैसा तो कमा लिया पर खुशी बचपन के रस्ते में ही है
दर्द तो पहले भी होता था, पर अब कुछ भी जल्दी से भूलते नही है
ये सच हैं यारो अब हम बच्चे नही हैं !

पेंट तो पहन ली पर अंदर से कच्छे में ही हैं
कद तो बढ़ गया पर दिल छुटपन के साँचे में ही हैं
मन हैं फिर से बचपन जीने का, पर वक़्त के पहरे इतने कच्चे नही हैं
ये सच हैं यारो अब हम बच्चे नही हैं !

— अंकित सोलंकी, उज्जैन (मप्र)

जय माता दी


वेद-पुराण में तीन देवताओ का वर्णन विशेष रूप से मिलता हैं, जो इस पुरे ब्रह्माणं की कार्य प्रणाली को संचालित करते हैं, ये देवता हैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश। ब्रह्मा इस सम्पूर्ण ब्रह्माणं के रचियता हैं, विष्णु इस सृष्टि के संचालक या पालनहार हैं और महेश सृष्टि के रक्षक और संहारक है। यहाँ यह बात ध्यान रखना चाहिए कि संसार में जो भी उत्पन्न हुआ हैं वो कभी न कभी नष्ट भी होगा, इसलिए संहारक की भूमिका को नकारात्मक रूप में नहीं देखना चाहिए।

देखा जाये तो सृष्टि की रचना से लेकर जितने भी कार्य हैं, वो इन तीन देवताओ में ही विभाजित हैं, पर इन कार्यो को करने के लिए जिस विशिष्ट गुण की आवश्यकता हैं उनके प्रतीक ये देवता नहीं हैं। सृष्टि की रचना के लिए बुद्धि और ज्ञान की आवश्यकता होती हैं और इसलिए स्वयं ज्ञान और कौशल की देवी सरस्वती ब्रह्माजी के साथ विराजमान हैं। किसी भी व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए संसाधन की आवश्यकता होती हैं, और इसीलिए सृष्टि के संचालक श्री हरी विष्णु जी साथ स्वयं धन-धान्य और सभी प्रकार के संसाधन की देवी लक्ष्मीजी विराजमान हैं। रक्षा हो या संहार, ये कार्य बिना शक्ति, साहस और सामर्थ्य के नहीं किये जा सकते हैं, शायद इसीलिए स्वयं आदिशक्ति माँ पार्वती भोलेनाथ के साथ विराजमान हैं।

तीनो लोको के स्वामी सर्वशक्तिमान भोलेनाथ को जीवन में आदिशक्ति की आवश्यकता क्यों हैं, चतुर-स्मार्ट श्री हरी विष्णु को माता लक्ष्मी का साथ क्यों चाहिए ? मैं नहीं जानता ऐसा क्यों हैं, जिस सर्वशक्तिमान ईश्वर की छवि वेद-पुराण ब्रम्हा-विष्णु-महेश के रूप में गढ़ते हैं, उनके साथ इन गुणों के लिए देवियो को क्यों विराजा गया। क्या ये त्रिदेव इन गुणों या कौशल से परिपूर्ण नहीं हैं? शायद सनातन धर्म ये बताना चाहता था कि पुरूष कितना भी शक्तिशाली क्यों ना हो, वो कोई भी कार्य बिना महिला के नहीं कर सकता हैं। संसार के सभी प्राणियों को इन गुणों को प्राप्त करने के लिए स्त्री की आवश्यकता होगी। विश्व में शायद ही ऐसा कोई धर्म होगा जिसने स्त्री की महत्ता इतने रचनात्मक रूप में सिखाई होगी, शायद ही ऐसा धर्म होगा जिसने ईश्वर को अकेला नहीं वरन पुरुष और महिला के संयोजन में दिखाया।

स्त्रीयो को उपभोग या शारीरिक सुंदरता के मापदंड पर तौलने वाले समाज को शायद ये जानकार आश्चर्य होगा कि वेद-पुराण में देवियो का वर्णन अपने विशिष्ट गुणों से ही होता हैं। देवियो के रंग-रूप पर टिप्पणी भी उनके कर्म और गुणों के आधार पर ही की गई हैं। देवी लक्ष्मी धन-धान्य और सुख-सम्पदा को दर्शाती हैं, स्वाभाविक सी बात हैं जो सुख-संपन्न और संसाधन से परिपूर्ण होगा वो सुन्दर ही होगा, इसीलिए लक्ष्मीजी को हमेशा गौरांगी और सुन्दर बताया गया हैं। सरस्वती ज्ञान और बुद्धि की देवी हैं और जो ज्ञान-बुद्धि से परिपूर्ण होगा वो ओजस्वी होगा, इसीलिए सरस्वतीजी का वर्णन ओजस्वी, शांत-चित्त और सौम्य रूप में किया गया हैं। माँ काली शक्ति का प्रतीक हैं, इस संसार की राक्षसों से रक्षा करती हैं। जो साहसी होगा, युद्ध भूमि में रहेगा और निरंतर शारीरिक कार्य करेगा, उसका रंग सावला ही होगा, इसीलिए माँ काली का रंग-रूप काला या नीला बताया गया हैं और उनका स्वरुप भयानक बताया गया हैं।

नवरात्र का ये उत्सव की कल्पना इसलिए की गई कि ये समाज स्त्री की महत्ता समझे। शारीरिक रंगरूप, काम-लोभ के स्थान पर शक्ति-ज्ञान और संसाधन की आराधना करे। नवरात्र का ये पर्व जीवन का सन्देश हैं कि जब तक प्राणियों में शक्ति-ज्ञान और संसाधन के प्रति आस्था का भाव हैं, तब तक ही जीवन संभव हैं। और इन्हे प्राप्त करने के लिए भक्ति-भाव से माँ के चरणों में नतमस्तक होकर आराधना करनी ही होगी।

जय माता दी

Love Deal


Its a smalll story about love and friendship. There are five characters in this story –

  1. Ronit – Main hero of the story
  2. Mitali – Heroine of the story
  3. Nilesh – He is the best friend of Ronit
  4. Mrs Uma Devi – Mitali’s mother
  5. Mr. RajKamal – Ronit’s father

Ronit, Mitali and Nilesh were friends and they were studying in same college. Ronit and Mitali were in true love with each other. Nilesh was the best friend of Ronit and they were childhood friends. When college completed, Ronit and Mitali decided to get married.

Mrs. Uma Devi, who was the mother of Mitali, came to know about her daughter’s decision to get married. Since Ronit’s financial condition was not good and he has careless attitude toward carrier, Mrs Uma Devi asked Mitali to not marry Ronit. Mitali understand the concern of her mother. She knew about Ronit’s careless attitude but she also knew his determined and fearless nature, so she proposed a deal to Ronit.

Mitali asked Ronit that she would marry him only when he makes decent financial status. She formalized financial status by some condition like Ronit should have his own house, car, and a decent bank balance. Ronit asked Mitali what if he would not make it in given time. Mitali said she would go with her mother’s choice and leave him. But she also said that she is sure he will fulfil her condition. Uma devi also agreed with Mitali for this condition

Ronit left disappointed with this condition and asked his father Mr. Rajkamal what to do. Mr. Rajkamal said he is free to do whatever he wants – He can leave Mitali or he can work hard to fulfil deal. After thinking, he accepted challenge as he was in true love with Mitali. He decided to go Dubai for earning.

At the same time Nilesh’s mother was facing a critical illness and he need money to operate her. Since he also need money, he accompanied Ronit in Dubai so that he could also earn something. At that time Ronit determined that he would create his own business in Dubai, and he need good loyal friend. But he knew that Nilesh is very innocent and emotional guy, sometimes he act very foolish also. So he made a condition to his friend that he would never brake his trust, and Ronit would take all personal and professional decision for Nilesh as well as bussiness. He also made Nilesh swear that he would never leave him once they would achieve something. Nilesh agreed to his condition and they left for Dubai.

Initially they did some small jobs in Dubai but soon they started import-export business. In the span of two years, their business grew rapidly, and they made good profit. Ronit made planning and was primary owner of bussiness. Nilesh handled execution part and like loyal partner he worked hard to execute their planning. Now Ronit was dreaming big and making their business global. Nilesh operated his mother and she was also doing good. At that time, there were no mobiles so communication between Ronit and Mitali was permanently closed.

After two years, Ronit came to India and met Mitali. Ronit had his own house, car and decent bank balance now. Mitali was very happy that now they would marry happily. But this time Ronit refused to marry Mitali. He said that these two years make him understand value of money and work. Now he want to make his business bigger and he has no time for love. Also, Mitali wanted to settle down In India but Ronit wanted to become bigger and settled in abroad. So, their ambitions were not matching and Ronit decided to left her. Mitali was very disappointed, and heartbroken with Ronit’s behavior. She bagged to Ronit many times, but he did not melt. Finally she swear by anger that she would never see Ronit again. Ronit made his father Mr. Raj Kamal aware about his decision, but he respected his son’s decision and stood with him.

Since Nilesh had friendship with both and he knew about their true love, he tried to convince Ronit that do not dump Mitali. But Ronit did not understand, and he was determined at his decision. Nilesh sympathized Mitali and helped her to move out from this sadness. Soon Nilesh and Mitali developed feeling for each other. After some time, they decided to get married. Nilesh knew about Mitali’s swear that she would not want to face Ronit again and he also knew that Ronit would not accept him to get married with Mitali; it become tricky situation for him. He let Ronit knew about his decision; Ronit said if he would ask him, he should not marry Mitali but he is free to take decision on his own. Nilesh knew about Mitali’s dream to settle in India. He knew that he would not continue his life with Ronit and Mitali both so he finally decided to brake his partnership with Ronit. Nilesh and Mitali got married and left In India; Ronit moved to Dubai with his ambition.
Story ends here; but there is one exercise for readers now – Think about everyone’s situation and answer these two questions in comment box –

  1. Who is the most innocent in this story – whatever he did was perfectly fine.
  2. Who is the main culprit in this story – what he did was wrong.

If you specify your reason; it would be icing on the cake. I will share my take also later.

Thanks!

Note – This story is inspired by similar incident I read somewhere.

इंजीनियर दिवस


एक इंजीनियर देश के किसी काम का नहीं
ना वो डॉक्टर की तरह लोगों की जान बचाता हैं,
ना वो पोलिस सेना की तरह रक्षा करता हैं,
ना ही नेता की तरह समाज की सेवा करता हैं

एक बिल्डिंग नहीं बनेगी तो काम चल सकता हैं
एक मशीन नहीं बनेगी तो भी काम चल सकता हैं
एक सॉफ्टवेयर नहीं बनेगा तो भी काम चल सकता हैं

पर वो डॉक्टर जिस स्टेथोस्कोप से धड़कन सुनता हैं वो इंजीनियर बनाते हैं
वो सेना जिस हथियार से लड़ती हैं वो इंजीनियर बना सकते हैं
वो किसान जिस ट्रेक्टर से खेती करता हैं वो इंजीनियर ही बना सकते हैं
वो नेता जिस माइक पर भाषण देते हैं वो भी किसी इंजीनियर ने बनाया होगा

इंजीनियर आने वाले तूफ़ान को बता सकते हैं
इंजीनियर माँ के पेट में पल रहे बच्चे को दिखा सकते हैं
इंजीनिअर आपको चाँद तक भी पहुँचा सकते हैं
इंजीनियर ही राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं

डिग्री जरुरी नहीं, हर वो व्यक्ति जो अपने स्तर पर छोटा या बड़ा निर्माण करे, इंजीनियर बन सकता हैं |

इंजीनियर दिवस की शुभकामनाये  

शिव – गृहस्थ, पति और प्रेमी


नोट – ये लेख समर्पित हैं उन सभी स्त्रियों को जो अपने जीवनसाथी में किसी फ़िल्मी हीरो जैसी खूबी तलाशती हैं | ये लेख उन सज्जनो को भी समर्पित हैं को स्त्री को अपना दास समझते है या स्वयं उनके दास बन जाते हैं |


प्रेमी हो तो श्री कृष्ण जैसा !
पति हो तो भोलेनाथ जैसा !

प्रेमी हो तो श्री कृष्ण जैसा जो प्रेमिका को सदैव के लिए ह्रदय में स्थान दे !
पति हो तो भोलेनाथ जैसा जो पत्नी को ह्रदय ही नहीं अपितु तन-मन और जीवन में इस तरह सम्मिलित कर ले कि स्वयं अर्द्ध नारीश्वर बन जाये !

इसका यह अर्थ कदापि नहीं हैं कि प्रेम किसी और से किया जाये और जीवन साथी किसी और को बनाया जाये | बहुधा प्रेम किया नहीं जाता परन्तु जीवनसाथी का निर्णय हमेशा बहुत सोच-समझकर किया जाता हैं | पुराणों कथाओ में शिव को ऐसे ईश्वर के रूप में दिखाया जाता हैं जो सन्यासी के समान जीवन व्यतीत करते हैं, समाधी में रहते हैं, समस्त ऊर्जा का स्त्रोत हैं और संसार को विनाश से बचाते हैं | परन्तु शिव एक आदर्श पति का उत्तम उदाहरण भी हैं | उन्होने पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार किया तो उसके बाद उनका ध्यान किसी और स्त्री पर नहीं गया | एक आदर्श गृहस्थ की तरह वो अपने कर्म जैसे ध्यान-समाधी में ही लीन रहते हैं और बचा हुआ पूरा समय अपने परिवार और घर (कैलाश पर्वत) की देखभाल करते हैं | शिव कभी अपना समय इधर-उधर भ्रमण करने या अन्य व्यर्थ प्रपंच-मौज-मस्ती करने में व्यतीत नहीं करते | यही गृहस्थ की सर्वकालिक आदर्श परिभाषा हैं कि वो अपना पूरा समय अपने कर्म और परिवार को ही दे |

शिव का रहन-सहन सामान्य हैं, वो सामान्य वस्त्र पहनते हैं, साधारण सा जीवन व्यतीत करते हैं परन्तु अपने बच्चो को ऐसे आदर्श देते हैं कि उनके पुत्र गणेश माता-पिता को सारे संसार से बड़ा समझते हैं | एक गृहस्थ को भी सादे जीवन को अंगीकार करना चाहिए और अपनी पूरी पूंजी अपने परिवार के उच्च पालन-पौषण पर लगानी चाहिए | यहाँ पूंजी केवल रुपये पैसो की ही नहीं वरन आदर्श-संस्कार की भी है | यह एक विचित्र संयोग हैं कि शिव संन्यासी के वेश में विशुद्ध गृहस्थ हैं और कृष्ण एक गृहस्थ के वेश में साधु | एक आदर्श गृहस्थ वही है जिसका रहन-सहन साधारण हो पर कर्म और विचार उच्च |

शिव गृहस्थ के रूप में खरा सोना हैं तो पति के रूप में बहुमूल्य हीरा | उन्होंने पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार किया तो उसे अपने साथ बराबरी से बैठाया, अर्द्ध रूप नारी का जरूर लिया पर अर्द्ध रूप अपना भी अक्षुण्ण बनाये रखा | अर्द्धांगिनी का अर्थ तो शिव ने ही समझाया | यही विडंबना हैं आज पुरुष समाज के साथ कि वो या तो स्त्री को अपने चरणों में स्थान देते है या स्वयं स्त्री के चरणों में बैठकर दास बन जाते हैं | स्त्री ना भोग की वस्तु हैं और ना ही मंदिर की मूर्ति , उसे मनुष्य समझने की जरुरत हैं और बराबरी का स्थान देने की जरुरत हैं – ना इससे ज्यादा ना इससे कम |

शिव का प्रेमी स्वरुप शायद की किसी अवसर पर प्रकट हुआ हो | शिव ने अपना प्रेम सदैव एक गृहस्थ के समान अपने घर की दीवारों के अंदर ही दिखाया | एक अवसर पर ऐसा अवश्य हैं जब शिव प्रेम की उस पराकाष्टा को पार कर गए जहा तक शायद ही कोई प्रेमी पहुँचा होगा | माता सती के लिए शिव का रूदन जितना डराता है उतना ही व्यथित भी कर देता हैं | अपनी भार्या की मृत काया को लेकर संसार में भटकने वाले शिव के दुःख की कोई थाह नहीं | शिव का रूदन दर्शाता हैं कि वो किस कदर अपनी पत्नी को प्रेम करते हैं | संसार का सर्वशक्तिमान ईश्वर भी प्रेम में इतना विवश हैं | प्रेम में दुनिया से पत्थर खाने वाले मजनू इस कथा के सामने बौना हैं , जहर खाने वाले रोमियो तुच्छ हैं |

और अंत में चलते-चलते :: स्त्री का प्रेम इस संसार की सबसे अमूल्य वस्तु हैं, इसलिए हैं स्त्री समाज अपना प्रेम कभी किसी इडियट पर वेस्ट मत करना | यह अकारण नहीं कि सनातन धर्म में हरितालिका का व्रत बनाया तो शिव को पति के प्रतीतात्मक रूप में रखा गया, कृष्ण या राम को भी नहीं | एक पुरुष को कभी उसके बाहरी आडम्बर – वेशभूषा से मत परखना | एक पुरुष की पहचान उसके कर्म और विचारो से होती हैं | अपना प्रेम उसी को समर्पित करना जो तुम्हे बराबरी का स्थान दे, जिसका प्रेम तुम्हारे लिए कभी कम ना हो, जिसका हर कर्म समाज या परिवार के कल्याण के लिए हो, जो कर्म के पश्चात अपना पूरा समय तुम्हे और परिवार को दे, जो न तुम्हे अपना दास समझे और ना ही तुम्हे अपने सर पर बैठाये बल्कि दोस्त मानकर अपने साथ बैठाये, तुम्हारे मन की बात सुने और तुम्हारे विरह में जिसका रूदन समस्त संसार को व्यथित कर दे – वही तुम्हारे प्रेम का अधिकारी हैं |

युवा


युवा हो तो इंक़लाब का ख्याल आना चाहिए
रगों में बहते खून में उबाल होना चाहिए

बर्दाश्त ना करने की आदत होना चाहिये
अन्याय के खिलाफ बुलंद आवाज़ होना चाहिए

दिल्ली में दलदल हैं इस दलदल को साफ होना चाहिए
भोपाल में कुछ हो तो लखनऊ में भी हुंकार होना चाहिए

कदम छोटे भी हो पर सोच विशाल होना चाहिए
मंज़िल मिले न मिले पर कोशिश हर बार होना चाहिए

नौजवान तुम नाचीज़ हो, तुम पर नाज़ होना चाहिए
धड़कन हो देश की, तुम्हे ज़िम्मेदारी का अहसास होना चाहिए

कोई भूखा ना हो, कहीं ज़ुल्म ना हो
हर काम तुम्हारा वतन के नाम होना चाहिए

–अंकित सोलंकी, उज्जैन (मप्र)